
नई दिल्ली/रवि शंकर सिंह ,17 जून।
कवन बहिनी लावेली गोबरवा काई रे पिड़िया,सोरहिया काई रे पिड़िया,कवन भइया लावे नवरंगिया ए हरि……गोबर-माटी की दीवार जैसी सतह पर हरे रंग की खास आकृति पर दायें हाथ की अंगुलियों से आहिस्ता- आहिस्ता उजले रंग की आकृतियों को उभारने के क्रम में उसके होठ एवं कंठ से अनेकों शब्द प्रस्फुटित होते रहते हैं। शब्दों के साथ-साथ आकृतियाँ अपना स्वरूप धारण करती रहती है। देखते ही देखते एक समय ऐसा आता है जब शब्द और चित्र एकाकार हो जाते हैं। चित्र- सृजन की प्रक्रिया जारी रहती है।

वाकई विनिता कुमारी जब चित्रों का सृजन करती हैं तो सृजन के क्रम में गीत भी गाती रहती हैं। उन गीतों का संबंध उस चित्र से होता है जिसकी रचना वह कर रही होती है। विनिता कुमारी जिस कला स्वरूप का चित्रण करती हैं उसे बिहार के भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में पिड़िया लेखन के नाम से जाना जाता है। विनिता कुमारी रोहतास जिले के डेढ़गाँव गाँव में रहते हुए विगत कई वर्षों से पिड़िया कला का चित्रण कर रहीं हैं।उन्हें पिड़िया लेखन विषय पर उल्लेखनीय कार्य एवं शोध हेतु संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार द्वारा कनिष्ठ अध्येतावृति (जुनियर फेलोशिप) वर्ष (21-22) के लिए दी गयी है। सांस्कृतिक शोध एवं प्रशिक्षण केन्द्र नई दिल्ली के तत्वावधान में अभी पिड़िया लेखन का पुनर्लेखन कर रही है।

विनिता कुमारी द्वारा चित्रित पिड़िया कलाकृतियों की प्रदर्शनी संगीत नाटक अकादेमी, नई दिल्ली द्वारा आयोजित योग पर्व 2019 एवं 2023, हंसराज कालेज, नई दिल्ली, विमला आर्ट फोरम ,गुरुग्राम द्वारा अर्पणा आर्ट गैलरी ,नई दिल्ली में माटी एवं पिंक आयरन शीर्षक से आयोजित प्रदर्शनियों में भागीदारी।

इसके साथ ही राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय, के बाहरी दीवार पर एक बड़ा सा पिड़िया लेखन का चित्रण विनिता ने किया जिसकी चर्चा खूब हुई। राजगीर,बिहार में भी इनकी पिड़िया- कलाकृति संग्रहित है। साथ ही तक्षशीला परिवर्तन, नरेन्द्रपुर ,सिवान में इनकी कलाकृतियां संग्रहित तो है ही वहाँ लोक कलाकारों की कार्यशाला में भी भागीदारी रही है।

विनिता को भोजपुरी एसोसिएशन ऑफ इण्डिया एवं मैथली भोजपुरी अकादमी, नई दिल्ली, जंगल किलोल, नई दिल्ली विमला आर्ट फोरम, गुरुग्राम ,आवर माटी फाउंडेशन, एवं भोजपुरी जन जागरण अभियान ,नई दिल्ली द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। विनिता कुमारी का जन्म बिहार के रोहतास जिले के दिनारा के नजदीक जगदीशपुर गाँव में 20 मार्च 1989 में हुआ। पिता अयोध्या प्रसाद सिंह तथा माता सुशीला देवी की पुत्री विनिता की पिड़िया बनाने की शुरुआत बचपन में ही गयी थी। उनकी माँ स्व० सुशीला देवी गवई कलाकार थी। कलात्मक सोच की थी।

घर में पिड़िया पर्व का अनुष्ठान जब माँ करती थीं तो दीवाल पर पिडिया लेखन करती थी और पिड़िया से संबंधित गीत भी गाती थी। तत्समय विनिता भी अपनी माँ के साथ पिड़िया लेखन को देखती- समझती-बनाती तो थी ही टूटे- फूटे शब्दों में गीत गाने की कोशिश भी करती थी। बचपन को याद करते हुए विनिता पिड़िया गीत को गुनगुनाने लगती हैं।
लावे के त लवनी पीड़ियवा हो राम
छोड़ावही के बेर
कवन पापी भेजले नियरवा हो राम छोड़वही के बेर ………।
घर में कलात्मक माहौल मिलने के कारण है विनीता की रुचि कला की ओर बढ़ती गयी। पर्व, त्यौहारों के समय वह भी पिड़िया लेखन करने लगी। धीरे-धीरे गाँव में साल दर साल अभ्यास चलता रहा। विनिता की शादी डेढ़गाँव गाँव में होगयी।

ससुराल में रहते हुए विनिता ने दीवाल पर पिड़िया लेखन करने के बजाय पेपर और कैनवस पर पिड़िया लेखन करने लगी। हालांकि यह सब बहुत सहज नहीं था। काफी मेहनत एवं अभ्यास के बाद वह इफेक्ट (प्रभाव) आया। इस संदर्भ में विनिता का कहना है कि शुरू-शुरू में मैं सादे पेपर पर काफी रेखांकन करती थी। आड़ी- तिरछी- सीधी रेखाएं खींचने का अभ्यास करती रहती थी। महीनों अभ्यास करने के बाद पेपर पर पिड़िया लेखन करने लगी। गाँव में दीवार पर जिस तरह की पिड़िया बनायी जाती है वैसी छवि बनी रहे इसका ध्यान में रखती हूँ। प्राकृतिक रंगों के बदले में एक्रेलिक रंग का प्रयोग करती हूँ। शुरु शुरू में रंगों की बारीकियो एवं रंग-रोगन को भी समझना काफी कठिन था लेकिन धीरे-धीरे सहज होता गया।
अब सवाल उठता है कि आखिर पिडिया- लेखन है क्या और उसकी उपयोगिता क्या है। तो पिड़िया मुख्य रूप से बिहार के भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में चित्रित होने वाली कला परम्परा है जिसका निवर्वाह वहाँ औरतें- महिलाएं-युवतियां करती हैं।

पिड़िया की लंबी प्रक्रिया है। यह एक महीने तक चलती है। इसकी शुरुआत भैया दूज के दिन जब औरतें गोबर को कूटती हैं तो उसी गोबर को लेकर सारी घर (जिसमें बैल भैंस बंधते हैं) के दीवार पर पांच-पांच पिण्ड लगाती है। पुनः पन्द्रह दिनों के बाद युवती या महिला के जितने भाई हैं उतने सोरहिया यानी एक भाई पर सोलह गोबर का पिंड लगाती है। इसे दोहराना कहते हैं। हर शाम औरतें युवतियां उस घर में बैठ कर गीत गाती है। एक महीने के बाद अगहन महीने के शुक्ल पक्ष एकम् को पिड़िया को उखाड़ती है। पहले अपने आंचल में पिंडों को रखती हैं फिर खचिया में उसे रख देती हैं। उसी दिन महिलाएं युवतियां पिड़िया का व्रत रखती है और दिन भर उपवास रखती है। उसी दिन घर की दीवार को गोबर माटी से लिपती हैं। उसके बाद सेम की पत्ती को सिलवट या खल में पीसकर हरा रंग तैयार करती है तथा हरे रंग से पिड़िया माता की बड़ी आकृति बनाती है। । आकृति की बनावट में मुख्यतया बड़ा चकोरा पेट, सिर पैर हाथ आदि होते हैं। उसके बाद भिगे हुए चावल को पीसकर उजला रंग बनाती है। उसके बाद बांस की पतली बाती को काट कर छोटी सी तुलिका बनाती है । आवश्यकता के अनुसार एक फंकिया या दो कंक्रिया ब्रश बनाकर उजले रंग से रेखांकन प्रारंभ करती हैं । सबसे पहले आकृति के चारो तरफ से डिजाइन बनाती है। उसके बाद बड़ी आफ्रति को कई भागों में विभक्त करतो है तथा हर भाग में अलग अलग आकृतियों का रेखांकन करती है। रेखांकन के रूप में मुख्यतया सूर्य, चाँद, सांप, सीढ़ी, ढेंका, झाड़ू, बिच्छू, कमल, चूल्हा, कड़ाही, स्वास्तिक, सिन्होरा,बतख, कंघी, डोली -कहार, राजा- रानी, मानवाकृति आदि होती है। रेखांकन के पश्चात घी और सिन्दूर से टीकती है। अपनी अंगुली के सहारे ही सिन्दूर लगाती है।
यह कला पूरी तरह रैखिकहोती है। इसमें रंग नहीं भरे जाते।

इस कला की खासियत भी यही है कि हरे रंग की पृष्ठभूमि पर उजले रंग की आकृतियाँ बनायी जाती है। पिड़िया लेखन करते समय युवतियां महिलाएं विभिन्न तरह के गीत गाती रहती हैं। उसके बाद सुबह में उखाड़ी गयी पिड़िया को हर्षोल्लास के साथ अगले रात की सुबह में किसी तलाब, पोखरा या अहरा में दहवाती हैं तथा गाती हैं
जाहूं जाहूं ए पिड़िया माता, अपनी हो देस
अबकी लवटिहऽ ए पिड़िया माता, अगहन मास…..।
इस तरह कला का एक महत्वपूर्ण रूप इस क्षेत्र की औरतों द्वारा चित्रित किया जाता है। चार (4) महीने के लिए चित्रित पिडिया कला को होलिका दहन के पश्चात गोबर माटी से लीप-पोत कर समाप्त कर दिया जाता है। अगले पर्व तक कोई अवशेष नहीं रहता।
