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नौतपा (मृगडाह) अगर न तपे तो क्या होता है ?

रांची/झारखण्ड(डॉ अजय ओझा,वरिष्ठ पत्रकार),28 मई।नौ दिन का वह समय समय जब गर्मी अपने चरम सीमा पर रहती है,नौतपा कहलाता है।इस वर्ष 25 मई से 2 जून तक नौतपा है।
* दो मूसा, दो कातरा, दो तीड़ी, दो ताय।
* दो की बादी जळ हरै, दो विश्वर दो वाय।।

अर्थ:- नौतपा के पहले दो दिन लू न चली तो चूहे बहुत हो जाएंगे। अगले दो दिन न चली तो कातरा (फसल को नुकसान पहुंचाने वाला कीट) बहुत हो जाएंगे। तीसरे दिन से दो दिन लू नही चली तो टिड्डियों के अंडे नष्ट नहीं होंगे। चौथे दिन से दो दिन नहीं तपा तो बुखार लाने वाले जीवाणु नहीं मरेंगे। इसके बाद दो दिन लू न चली तो विश्वर यानी सांप-बिच्छू नियंत्रण से बाहर हो जाएंगे। आखिरी दो दिन भी नहीं चली तो आंधियां अधिक चलेंगी। फसलें चौपट कर देंगी। इसलिए *”लू”* से भयभीत न होवें।
नौतपा को भोजपुरी में मृगडाह भी कहते हैं। भोजपुरी क्षेत्र में जानकार लोग कहते हैं – “मृगडाह तपले के मोल ह।” अगर मृगडाह के दौरान पछुआ हवा चले तो और बढ़िया माना जाता है। मृगडाह जितना अधिक तपता है उतनी ही अच्छी बारिश होती है और कीट-पतंगों से सुरक्षा होती है।
रोहिणी बरसे मृग तपे
कुछ दिन आर्द्रा जाय।
कहे घाघ सुनु घाघिनी
स्वान भात नहीं खाय ।।
अर्थात – घाघ कहते हैं कि रोहिणी में हल्की बूंदाबांदी हो और मृगडाह खूब तपे और आर्द्रा के कुछ दिन बाद खूब वर्षा हो तो इतनी अच्छी फसल होगी कि हे घाघिनी कुत्ते भी भात खाते-खाते उब जायेंगे !
स्वस्थ रहें, मस्त रहें, जीवन में धर्म कार्य में व्यस्त रहें !

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