
RKTV NEWS/अजय गुप्ता अज्ञानी,08 अप्रैल।हमने समाज में ऐसा देखा हैं कि माँ-बाप बेटियों को पढ़ा लिखा कर योग्य बना कर नौकरी या व्यवसाय कराने पर जोड़ ना दे कर एक उचित समय पर पुत्री का ब्याह कर देते है।
चूँकि पुत्री हो या पुत्र माँ-बाप दोनो को समान अवसर दे रहे है पढने के लिए और लड़कियाँ अव्वल भी रह रही है यह बात भी सर्वविदित है। फिर माँ-बाप सही समय देख कर पुत्री का शादी कर देना उचित व जरूरी समझते है और शादी के बाद वो पुत्री चंद दिनो में ही एक बेटी से बहु के रूप में बदल जाती है व जाने पहचाने जाने लगती है और मात्र *सारी* पहन लेने से उस कोमल मन पर एक प्रौढ़ स्त्री जैसा चित्र लोगो के मानस पटल पर आ जाता है। और लोग एक प्रौढ़ औरत जैसा ही रहन सहन की अपेक्षा उस नव विवाहिता से करने लगते है। जो अभी-अभी एक कुँवारी सुकुमारी से नारी के रुप में पदार्पण की है अभी-अभी माँ-बाप भाई-बहन के निश्छल प्रेम से मरहूम हुई है। वो अभी दुनियादारी को नहीं जानती/समझती। मगर अफसोस, यें बात आमतौर पर लोग समझ नहीं पाते कि कल तक तो वो बेटी थी और स्कूल कॉलेज में पढ़ा करती थी। अभी शादी के बाद की जिम्मेदारियाँ समझने में वक्त तो लगेगा। पर ऐसा सोच शायद लोगो के मन में नहीं आता और छोटी-छोटी गलतियों के लिए भी वो बच्ची जोर-जुल्म का शिकार होने लगती है। जो कोमल मन पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
जिसका प्रभाव भी परिवार के लिए दूरगामी होता है।
जिसका प्रभाव हमारा समाज अपनी आँखों से देख भी रहा है।
चूंकि बेटियाँ अब पढी लिखी है वो अच्छा व बुरा में फर्क समझती है। इसलिए अन्याय को सहन नहीं कर पाती व कालकलवित हो जाती है। इसलिए परिवार और समाज बिखर रहा है व दुखी भी हो रहा है। *”नारी धरती पर सृजक है व सृजक अनुकूल हो तो परिवार व समाज अनुकूल विकासनोमुखी होगा।”* इसलिए उचित यह लगता है की बेटी जब *सारी* में नारी बनकर ससुराल को जाए तो उस बहु के साथ भी नीज पुत्री के समान व्यवहार होना चाहिए। गलतियां जीवन का अंग है और प्रेम समझ त्याग माफी मानव का संस्कार। “धरती, परिवार व समाज बहुत ही सुन्दर है।” हाँ हमारा सोच जरूर विकृत हो गई है। अपने सोच व बिचार को सार्थक हितैषी बनाना होगा। यह एक आदमी के प्रयास से प्रचुरता को प्राप्त नहीं कर सकता मगर एक दीपक बन सौ-सौ दीपो को रौशन तो जरूर कर सकता है। ऐसे कार्यो में नारी अगर नारी के प्रति उदार हो जाए बहु को अपने बेटी के नाई मान ले व माफी, समझदारी का उचित प्रयोग करे बहू को मानसिक शारीरिक और उसके मयके को प्रताड़ित ना करे तो शायद कोई घर परिवार ना टूटे और बहू भी बेटी बन सकती है। और एक आदर्श परिवार का संरचना हो सकता है। मैं व्यक्तिगत तौर पर अपने माँ-दादी के बीच का अनुनय प्रेम को देखा है। और मेरी माँ की गोद में दादी के अंतिम सांस लेते हुए भी देखा है। कि मेरी दादी माँ को बार-बार देख रही थी ईसारो से बुला मुँह पोछ रही थी और इसारो में संतावना भी दे रही थी और माँ लगातार रोए जा रही थी यें अंतिम सांस लेते हुए ऐसा अंतिम प्यार देखा था हमने।
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“आँसू ना दो!!”
रहम करना है तो एक रहम जरूर करना,
छोटे-छोटे भूल का सजा आंसुओ का ना देना।
यें बेटियाँ भी माँ-बाप का जिगर के टुकडे है।
इन मुस्कुराते हुए चेहरो गमो का शूल ना देना।
बेटी थी अब तक नाजो नखरो से पली बढी।
कॉपी-कलमो में खपी रही स्कूलो की थी परी।
आरमान भी था इनकी हूनर की ना रही कमी।
पंख ना दिए पापा बेटी बाबुल के घर छोड़ चली।
वही अल्हड़पन वही लापरवाही माँ-बाप की थी दुलारी
आई दुल्हन नई बन कर प्रौढा से अभी नहीं थी यारी।
ना दो कोमल हाथो को वही बड़ो जैसा जिम्मेवारी।
भूल-चूक हो जाए तो अबला पर ना करो व्यभिचारी।
समय आयेगा सीख जायेगी जीवन की जिम्मेवारी।
प्रेम दोगे प्रेम पाओगे संसार का सारस्वत सत्य यही।
दर्द दे कर मुस्कान ना मिलता माफी भी सुकर्म है।
बेटी चाहे किसीका हो आँखों में पानी ना आने दें।
आँखों में पानी——————–।

