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बाल मजदूर!

रचनाकार:जितेंद्र कुमार

बाल मजदूर!

सरकार उन्हें खोजती फिरती है
उनकी खोज पर धन खर्च करती है

वे हर जगह मिलते हैं
दूब घास की तरह
होटलों रेस्तराओं ढाबों में हवेलियों में
नौकरशाहों के भव्य आवासों में
चाय पकौड़ी की फुटपाथी दुकानों में
घरेलू उद्योग-धंधों में
मंत्रियों के बंगलों में
बर्तन धोते हुए
बच्चों को खेलाते हुए
बीवियों की मालिश करते हुए

वे कहां नहीं मिलते?
वे सर्वत्र पाये जाते हैं और
एनजीओ के लोग जब ढूँढ़ लेते हैं
तो समाचार-पत्रों में उनके मिल जाने की खबर छप जाती है।

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