आरा/भोजपुर(कुमार अजय सिंह)अपने भोजपुरीया विरासत और संस्कृति के सम्मान में मातृभाषा की अहम भूमिका सुनते और देखने को मिलते हुएआयी है। अपनी संस्कृति और सभ्यता ही बीते हुए इतिहास का दर्शन कराकर नये पिढ़ियो को अपने सास्वत उतदायित्व का बोध कराता है। परंतु आज कि युवा पिढ़ी चमक दमक की दुनिया में अपने वास्तविक संस्कार और मातृभाषा के सम्मान को भुलाकर नये बाजारवाद के कारण उसमें सिमट कर उलझते जा रही हैं। जिससे हमारी संस्कृतियां तो कोसो दुर होती ही जा रही है। इसके साथ साथ अपना विरासत भी खुन का आंसू बहा रहा है। खासकर पुरानी परंपराऐ बलि की बेदी बनकर चढ़ावा का रुप ले चुकी है। कहां गया अपने गांव का फगुआ?? चैता??,कजरी?लोक गीत?सोहर?,खिलौना?बारहमासा,झुमर जैसे धुनो पर आधारित गीत गाना? कहां विलुप्त हो गया गांव के मंचों पर मंचन होने वाला नाटक?और ड्रामा?कहां गया सांझा ?और पराती कहां खो गया? माताओ के मुख से सुनाई देने वाली लोरी। आखिर हो क्या गया है जमाने को? इसका बस एक ही कारण है। जीस ओर जवानी चलती है,उस तरफ जमाना मुड़ता है। हमारे नौजवान युवक युवतियां मुंबईया और कलकतिया बाजार का हिस्सा और सौदागर बनकर अपनी विरासत और मातृभाषा भोजपुरी को नये रुप में भंजाने के प्रयास में जुट चुके हैं। जो भोजपुरी के लिए घातक साबीत हो रही है। जब तक नई पीढ़ी की चकाचौंध की दुनिया से अलगाव नही होगा,तब तक संस्कार युक्त विरासत भोजपुरी भाषा नये बाजारवाद में उलझी की उलझी ही रहेगी। और इसके वास्तविक मान सम्मान पर खतरा मंडराता ही रहेगा।
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