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ढूंढ रहा है ख़ुद में बचपन।

रचनाकार:माधुरी मिश्रा(वाराणसी)

ढूंढ रहा है ख़ुद में बचपन।

ढूंढ रहा है ख़ुद में बचपन।
बूढ़ा होता है जब ये तन।।

तन की थकन तो बढ़ जाती है।
बूढ़ा कभी नही होता मन।।

मन में होता है एक बच्चा।
उम्र भले हो जाए पचपन।।

है उमंग कुछ मन में बाकी।
तन से हार गया ये जीवन।।

कोई समझ नही पाता है।
मन मे होती कितनी उलझन।।

चेहरा भी झूठा लगता है।
सच दिखलाता जब ये दरपन।

बूढ़ा तन घायल मन करता।
मौत है करती सर पर नरतन।।

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