
मैं किसी बहिश्त का तसव्वुर नहीं करता !
सात महीने ये
या बारह महीने साल आईन्दा के
या फिर खुद की इबारत अराइयाँ करते
दो चार इधर उधर पड़े
गुमनाम मिसरों जैसे कुछ दिन
क्या अजब है कि
इस हुज़ूम-ए-ग़म से
साँसें तो चलती हैं लेकिन
इन सिलों से ना तो
ज़िन्दगी बसर होती है
और ना टिक ही पाता है
कोई मौसम कायदे से यहाँ
मद्धम पड़ता जा रहा है ख़रामा
दिनों से मंसूब उजाला
सूरज अपने आख़री मंज़र में है
एकदम मुख़्तलिफ़ है
इस धूसर जाड़े का नक़्श
पिछली सर्दियों के मुक़ाबिल
मिजाज अलहदा है
अबकी पुरवाई का
न मक़बूल , न मरदूद
न बेगुनाह , न गुनहगार
न मुखबिर , न मुफ़सिद
इस बेज़ार मुसीबत की ताब
छूने को जिगर चाहिये
आखिर कब तक?
पूछता है कोई
धुन्ध के सिवा और क्या है?
मैं देखता हूँ अपनी क़ुव्वत
और कहता हूँ अहल-ए-शहर से
तो आखिर होना भी क्या था!
इन रंजो का तहम्मुल
क्योंकर करूँ फिर सोचता हूँ
मैं तो अब भी
किसी बहिश्त का तसव्वुर नहीं करता।
