
कैकई की पुकार….!
सज़ गई अयोध्या दुल्हन सी,
अब तो आ जाओ दर्शन देने मेरे राम
कब तक तेरी बाट निहारें!
कब तक ख़्वाबों में ही सजाएं!
अब तो आ जाओ तेरी जन्मभूमि भी
सज़ धज कर आॕचल में भरने को बैठी है!
हुई जो भूल अब सब क्षमा करो !
आ जाओ माखन मिश्री लिए
ड्योढ़ी पर बैठी हूॅं!
सज़ गई अयोध्या ….
अब तो आ जाओ मेरे सरताज़!
अॕखियों से आॕंसू सूख गए !
सीने की धड़कन रुकी हुई !
जो भूल हुई अब क्षमा करो!
वर्षों से मिलन को तड़प रही !
सीने से लगाने को …!
आ जाओ मेरे राम !
तेरी ये अयोध्या कब से बुला रही
संग जनक दुलारी ,लक्ष्मण को लेकर
आ जाओ तेरे दर्शन को नज़रे गड़ाए बैठी हूॅं !
सज़ गई अयोध्या दुल्हन सी…!
साभार “शब्दों की सरिता”मंच
