नई दिल्ली/डॉ एम रहमतुल्लाह,29 नवंबर ।‘महिला सशक्तिकरण एवं परिवार व्यवस्था पर मीडिया का प्रभाव’ विषय पर पब्लिक रिलेशन्स सोसाइटी ऑफ इंडिया, जम्मू चैप्टर, इंडियन साइंस राइटर्स एसोशिएसन, फैन्स एवं मघा फाउंडेशन के संयुक्त तत्वधान मीडिया मीट (मीडिया चौपाल) का आयोजन जवाहरलाल विश्वविद्यालय के एसएसएस-1 हाल में किया गया। मीडिया मीट का शुभारंभ दीप प्रज्वलित और अतिथियों को पौधा भेंट कर किया गया।
इस मीडिया मीट में दो सत्रों का आयोजन किया गया जिसके प्रथम सत्र में पूर्व सेंट्रल आरटीआई कमिश्नर एवं लेखक व विचारक उदय माहूरकर, मघा फाउंडेशन में की संस्थापक डिम्पी, वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी, सेंटर ऑर मीडिया स्टडीज, जेएनयू के अध्यक्ष प्रो. मनोकोंडा आर. और आईआईएमसी जम्मू के क्षेत्रीय निदेशक तथा पीआरएसआई जम्मू चैप्टर के अध्यक्ष प्रो. अनिल सौमित्र शामिल रहे। वहीं, सत्र का संचालन नेहा वत्स कक्कड़ ने किया। इस मौके पर मीडिया चौपाल 2023 की समारिका का विमोचन भी किया गया।
दूसरे सत्र में आईआईएमसीए एसोसिएशन की अध्यक्ष सिमरत गुलाटी, लेखक और विचारक डॉ. शैलेंन्द्र सिंह, टीवी9 भारत ग्रुप के कंसल्टिंग एडिटर अमिताभ अग्निहोत्री, एंकर और वरिष्ठ संवाददाता हुमरा आलम एवं मनौविज्ञानिक एवं मेरठ कॉलेज की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अनिता मोरल मौजूद रही। मंच का संचालन वरिष्ठ पत्रकार डॉ. रमा सोलंकी ने किया। मीडिया का संयोजन सेंटर ऑर मीडिया स्टडीज, जेएनयू की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अर्चना कुमारी ने किया।
प्रथम सत्र में वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी ने कहा कि महिलाएं हर प्रयास करके आगे बढ़ रही हैं। समाज में महिलाओं का दर्जा सर्वोपरि है। महिला सशक्तिकरण का अर्थ बस घर से बाहर निकलना, गरिमाओं को भूलना, मेट्रो में रील बनाना नहीं है बल्कि महिलाओं को सशक्त बनने का अर्थ हैं कि वो हर क्षेत्र में अपनी आवाज को बुलंद कर सके। हर उस मुश्किल का सामना करने के लिए तैयार रहें जो उनके आगे बढ़ने में बाधा है। परिवार की जिम्मेदारी केवल एक महिला की नहीं है बल्कि पुरुषों को भी जिम्मेदारियां समझनी होगी।
वहीं पूर्व सेंट्रल आरटीआई कमिश्नर एवं लेखक व विचारक उदय माहूरकर कहा कि एक पुरुष महिला नहीं हो सकता और इसके विपरीत, दोनों की अपनी-अपनी सम्मानीय पहचान होती है। परिवार की अवधारणा भारत ने ही दी है। आधुनिकता के साथ स्वभाव, मूल्य, नैतिकता ही भारत का स्वभाव है। मीडिया को किसी भी स्थान पर लाने से पहले हमें अपने भीतर लाना होगा। इसरो और बैंकिंग तथा कई अन्य क्षेत्रों का नेतृत्व महिलाएं कर रही हैं। महिला सशक्तिकरण का फैसला कौन करेगा। महिलाएं सर्वश्रेष्ठ मल्टी टास्कर होती हैं। महिला सशक्तिकरण के कारण दुनिया भारत की तरफ देख रही है।
मघा फाउंडेशन में की संस्थापक डिम्पी जी ने समाज निर्माण में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करते हुए बताया कि पूज्यनीय होती है क्योंकि वो समाज के निर्माण की क्षमता रखती हैं। हमारी दादी, नानी, मां और बहन का नेतृत्व मजबूती प्रदान करता है। बिना पढे लिखने के बाद भी बुजुर्ग महिलाएं ऐसे ज्ञान देते हैं जो शायद किताबों में भी ना मिले। महिला और पुरुष के भेदभाव से ऊपर उठकर ऐसे समाज के निर्माण की आवश्यकता है, जहां सभी को एक नजरिए से देखा जाएं।
दूसरे सत्र परिचर्चात्मक रहा। इसमें अनिता मोरल ने कहा कि महिलाओं को सशक्त करने में मीडिया की भूमिका अहम है। मीडिया को अपनी सोच और महिलाओं के प्रदर्शित करने में फिर से विचार करना चाहिए। मीडिया स्वंय पूर्वाग्रह से जूझ रहा है, ऐसे में महिलाओं को खासकर मीडिया से जुड़ी महिलाओं को अपने स्तर पर सशक्त होना होगा।
वहीं, डॉ. शैलेन्द्र सिंह ने कहा कि जब महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं तो हमें खुद से सवाल करने चाहिए कि क्या महिला अशक्त है। महिला सशक्तिकरण की बात करना ही महिलाओं के साथ अन्याय है। यह यूरो-सेंटरिक विजन की देन है वरना हमारा भारतीय शास्त्र स्त्री और पुरुष में अलग-अलग करके नहीं देखता। पुरातन समय में महिलाओं को भी उतना ही महत्व दिया गया जितना पुरुष को।
हुमरा आलम ने कहा कि पत्रकारिता के क्षेत्र में महिलाएं कैसे काम करती हैं उसे बयान करना आसान नहीं है। आपको मनोरंजन का जरिया समझा जाता है। जिस उद्देश्य से आप आगे बढ़ने का प्रयास करती हैं उस राह से आपको ऐसे गंभीर और डरावने उदाहरण देकर बाहर निकाला जाता है कि जैसे पुरुष ही क्राइम, राजनीति, विदेशी कवरेज, युद्ध क्षेत्र में सुरक्षित पत्रकारिता कर सकते हैं। मैं छत्तीसगढ़ जैसे संवेदनशील राज्यों में पत्रकारिता करने गई, उस समय डराकर पीछे धकलने का प्रयास किया गया। लेकिन पत्रकारिता के जूनून की वहज से मैंने हर बाधा को पार कर संवेदनशील जगहों पर कवरेज किया।
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