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जसम द्वारा कवि वल्लभ के तीसरे कविता संग्रह “पोतराज” का लोकार्पण।

आरा/भोजपुर 01अक्टूबर।जन संस्कृति मंच की ओर से फूड इंडिया, आरा के मीटिंग हॉल में कवि वल्लभ के तीसरे कविता संग्रह ‘पोतराज’ का लोकार्पण और परिचर्चा का आयोजन किया गया।
सबसे पहले प्रो. निलांबुज सरोज ने आमंत्रित वक्ताओं, श्रोताओं और साहित्यप्रेमियों का स्वागत किया। इसके बाद पूजा, रश्मि, रिंकी, सौरभ, आनंद और जनार्दन मिश्र ने क्रमशः अनिल अनलहातू, प्रभात मिलिंद, उमाशंकर सिंह, आनंद कुमार राय, अजीत प्रियदर्शी और अजय पांडेय का शॉल ओढ़ाकर स्वागत किया। इसके बाद आमंत्रित वक्ताओं ने ही पुस्तक का लोकार्पण किया।
कविता संग्रह पर आयोजित परिचर्चा के दौरान गोरखपुर से आए आलोचक आनंद कुमार राय ने कहा कि वल्लभ नव-प्रस्थान के कवि हैं। उनकी कम से कम 12-14 ऐसी कविताएं हैं, जो सिर्फ संरचना नहीं, बल्कि पूरा एक स्थापत्य है। उनके तीन संग्रहों में प्रेम का स्वरूप बदलता गया है। उनका कवि भूख, संत्रास, अवसाद से मुक्ति चाहता है। उनकी कविताओं में सच का ताप है। स्थितियां कितनी विद्रूप हैं, उनकी कविताओं में देखा जा सकता है। चिता की बची हुई आग से चूल्हा जलाना ऐसी ही स्थिति है। उनकी कविता में और काव्यभाषा में ऐंठन बहुत है। आपदा को अवसर में किसने बदला यह अलग से कहने की जरूरत नहीं है। मुक्तिबोध पूछते थे कि पार्टनर तुम्हारी पोलटिक्स क्या है? वल्लभ की कविताओं की पोलिटिक्स छिपी हुई नहीं है। यह एक सचेत राजनीतिक दृष्टि ही है, जो कहती है- अफवाहों के दिन हैं ये/ अतिवाद का काल है यह। असंगत सूचनाओं की बाढ़ वाले इस समय में वे बचाव की स्मृतियों का उपयोग करते हैं।
कवि-आलोचक और अनुवादक प्रभात मिलिंद का कहना था कि वल्लभ की कविताएं ट्रीटमेंट के स्तर पर फैज ओर साहिर की राजनीतिक कविता के निकट या उनसे प्रभावित दिखती है। रुमान के उत्स से फूटती उनकी कविता भी मनुष्य और मनुष्य के सरोकारों में तब्दील होती दिखती है। वल्लभ अपने भिन्न-भिन्न कविता में पाठकों से भिन्न-भिन्न कविरूप में मिलते हैं। उनकी कविताओं में प्रेम, असंतोष, आक्रोश, वीतराग, असहमति, अस्वीकृति, सामाजिक और मानवीय संबंधों के संत्रास और अंतर्विरोध साथ-साथ अंतर्ध्वनित होते हैं। उनकी कविता में वैचारिक ईमानदारी है। निजी होने के बावजूद उनकी कविताएं समूह की कविताएं हैं। खुरचकर पढ़ने पर उनकी कविताओं में दुख और संत्रास, हताशा और संघर्ष तथा आस्था और व्यवस्था का संकट एक उदास और मद्धिम धुन की तरह लगातार बजती हुई सुनाई देती है।
कवि सुनील श्रीवास्तव ने कहा कि वल्लभ के इस संग्रह की कई कविताएं कोविड के दौरान लिखी गयी हैं। वे इनमें मृत्यु को करीब रखकर जीवन को देखते हैं। प्रेम का जो औदात्य है, वह इनकी कविता को महत्त्वपूर्ण बना देता है। शोषण के विभिन्न प्रकारों के शिनाख्त के लिए भी इनकी कविता की चर्चा होनी चाहिए। समय के साथ फरेब के पैंतरे किस तरह बदलते गए हैं, उनकी कविता उनकी बारीक पहचान करती है। बेरोजगारी और भूख का यथार्थ उन्हें बेचैन करता है। पोतराज का स्वांग भी भूख को मिटाने के लिए ही है। उनकी कविता में बिचौलियों के खिलाफ सर्वाधिक गुस्सा है।
लखनऊ से आए आलोचक अजीत प्रियदर्शी ने कहा कि कवि यर्थाथ का भागीदार तो है ही, वह शास्त्रों और धर्म की अबूझ गांठें भी खोलता है। पोतराज की तरह जिंदगी में निरंतर कोड़े खाते लोग निरंतर दुख, अकेलेपन, तनाव और अवसाद की मनःस्थिति से गुजरते हैं, यह आज के संवेदनहीन समय की सच्चाई है, जिन्हें इनकी कविताओं में देखा जा सकता है। इस संग्रह की कविताएं मुख्य रूप से अकेलेपन, अवसाद, टूटन और विद्रोह की कविताएं हैं। मुक्तिबोध के ‘अंधेरे में’ सत्ता का जैसा आतंक है, वैसा ही आतंक वल्लभ की कविताओं में है।
बलिया से आए अजय पांडेय ने कहा कि प्रेम के बारे में एकनिष्ठा की जो धारणा है, वल्लभ की कविताओं में मौजूद प्रेम उससे परे है। परंतु वह केवल निजी जीवन से संबंधित नहीं है। उनकी कविताओं में ठहराव नहीं है, बल्कि एक गति है। ये जीवन में काम आने वाली कविताएं हैं।
धनबाद, झारखंड से आए कवि अनिल अनलहातू का मानना था कि वल्लभ की कविता मेें पीड़ा की चुप्पी नहीं, अवसाद का शोर है। कवि पालतूपन के खिलाफ है। सजावटी गमले, बोन्साई, नकली अभिजात्य, बुर्जआ की क्रूरता, सुरक्षा में जीने के अभ्यस्त बुद्धिजीवियों और नकली क्रांतिकारियों के खिलाफ है। वह आज के समय की व्यवस्था का बड़े ही निर्वैयक्तिक तरीके से क्रिटिक रचता है। उसकी कविताओं में जीवन का खुरदुरापन और गहरी प्रश्नाकुलता है। वह अपनी आत्मा मेें ताप को संजोए हुए है।
बांदा, उत्तर प्रदेश से आए आलोचक उमाशंकर सिंह परमार ने इससे असहमति जताई कि वल्लभ की कविताएं उम्मीद की कविताएं हैं। उनके अनुसार ये आदमी की असमर्थता और जीवन के लिए उसके आत्मसंघर्ष की कविताएं हैं। यही असली लड़ाई है, बाकी सबकुछ छद्म है। इस संसार में जो भी आदर्श है, वह धोखा है। वल्लभ की कविता में यह दर्ज है कि व्यवस्था के पास भूख का इलाज नहीं है। यहां एक पीड़ा का इलाज दूसरी पीड़ा से किया जाता है। वल्लभ की काव्य-भाषा पर उठे सवालों की प्रतिक्र्रिया में उन्होंने कहा कि कोई भी कवि भाषा अर्जित करता है। उसकी पीड़ा, उसकी सोच और उसका लेखन उसी अर्जित भाषा में होता है। संस्कृत, उर्दू और लोकभाषा वल्लभ ने अर्जित की हुई है, जिसका सहज प्रभाव उनकी कविताओं पर नजर आता है।
वरिष्ठ कवि जनार्दन मिश्र ने वल्लभ को भोगे हुए यथार्थ कोे व्यक्त करने वाला कवि बताया।
इस मौके पर वल्लभ ने ‘वृक्षों से झांकती है तन्हाई’ कविता का पाठ किया।
संचालक सुधीर सुमन ने कहा कि वल्लभ की कविताओं में असंतोष और अतृप्ति का स्वर बहुत तीव्र और व्यापक है। उनकी कविताओं में सामाजिक संबंधों, प्रेम, राजनीति, अर्थव्यवस्था, बौद्धिकता और व्यवस्था के पूरे ढांचे के प्रति गहरा क्षोभ है। लेकिन इस कवि के भीतर गहरा सामाजिक दायित्वबोध भी है, जिसे संग्रह की शीर्षक कविता ‘पोतराज’ के अतिरिक्त ज्यादातर कविताओं में देखा जा सकता है। कवि के पास अपने मूल्य और आदर्श हैं, जिनका निरंतर सर्वव्यापी पाखंड, बनावटीपन और संवेदनहीनता से टकराव है।
जसम के बिहार राज्य अध्यक्ष कवि-आलोचक जितेंद्र कुमार ने कहा कि आज रचनाकारों के बीच अंतविर्रोध और इगो बहुत है, जन संस्कृति मंच की कोशिश यह है कि रचनाकार एकजुट होकर अपने समय के राजनीतिक यथार्थ को समझें, अपनी सामाजिक भूमिका निभाएं। यह आयोजन भी उसी की एक कड़ी था। उन्होंने कहा कि आज जिस तरह की धर्म की राजनीति हो रही है, उसके लिए वल्लभ की कविता की एक ही पंक्ति काफी है कि मैं किसी बहिश्त का तसव्वुर नहीं करता, क्योंकि बहिश्त की परिकल्पना न हो तो धर्म का सारा शिराजा ही बिखर जाएगा।
कार्यक्रम में कवि कुमार मुकुल, किरण कुमारी, ओमप्रकाश मिश्र, संतोष श्रेयांश, रविशंकर सिंह, राजमणि मिश्र, सुजीत कुमार, विक्रांत, अमित मेहता, सूर्यप्रकाश, अशोक मानव, चित्रकार संजीव सिन्हा, पत्रकार प्रशांत, धनंजय कटकैरा, सुभाषचंद्र बसु, वेद प्रकाश साम्वेदी, पंकज कुमार, डॉ. अलख शरण, जेपी सिंह, रवि मिश्रा, निकिता सिंह, राजवीर सिंह, सौरभ कुमार, राकेश कुमार ओझा, सारणधारी आजाद, अनिल कुमार सिंह आदि भी मौजूद थे।

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