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कृषि विज्ञान केंद्र में जैविक खेती पर प्रशिक्षण आयोजित।

आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा) 15 सितंबर।कृषि विज्ञान केंद्र भोजपुर आरा के द्वारा कृषि विभाग भोजपुर और जिले के प्रगतिशील किसानों के लिए प्राकृतिक एवं जैविक खेती पर आधारित प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जानकारी देते हुए केंद्र के हेड डॉक्टर प्रवीण कुमार द्विवेदी ने बताया की आज से 60 से 70 साल पूर्व हमारे गांव में जो खेती प्रचलित थी जिसमें कि किसी भी प्रकार के रसायनों का प्रयोग नहीं किया जाता था
लेकिन लगातार रसायनों का प्रयोग और उर्वरकों का प्रयोग असंतुलित मात्रा में कर दिया जिसके कारण जमीन का दोहन ज्यादा हुआ और भूमि की उर्वरा शक्ति में बहुत ज्यादा कमी आ गयी।
भूजल में प्रदूषण और पर्यावरण पर प्रभाव देखने को मिल रहे हैं।जितनी सामान्य वर्ष होनी चाहिए थी उसमें लगभग 30 से 40% की कमी इस बार देखने को मिली और इसके साथ ही लगातार जलवायु परिवर्तन होने के कारण पहले की तुलना में ज्यादा गर्मी हमें झेलना पड रहा है। इसका प्रभाव पशुओं पर भी देखने को मिल रहा है। स्वस्थ भोजन पैदा करें और इसके लिए हमें जैविक खेती करनी ही होगी।अब फसलों के बजाय सब्जियों की खेती से करेंगे और इस खेती के मुझे मुख्य घटक हैं वह है गोबर की खाद तिलहन की खलि चुनाव हरी खाद हमारे जो कृषि अवशेष हैं उनका पुनर्चक्रण करके उनसे बनी हुई पत्तों और डंठल की खाद तथा खेतों में जो कई तरह के हमारे पौधे निकलते हैं उनसे बने हुए कीटनाशक फफूंद नाशक जिनमें मुख्य रूप से नीम करंज मेहंदी जलकुंभी जैसे पौधे हैं इसके साथ ही सामान्य रूप से जो हमारे जो गोबर का गोइठा है और उसकी जो राख है साथ में चूड़ा और धान के मिलन से भी जो रख हमें प्राप्त होती है इनका इस खेती में बहुत बड़ा योगदान है अगर इन चीजों को हम समग्रता के साथ ले और सबसे बड़ी चीज की अगर हम अपने खेतों से निकले हुए सभी अवशेषों को पुनर्चक्रीट करके गोबर के साथ थोड़ी मात्रा में पतला करके मिलकर के अगर उसको हम उसकी खाद बना दे तो न्यूनतम 40 से 50% उर्वरकों का फिर से हमारे खेतों में वापसी हो जाता है और हमारे खेतों की ताकत पहले से ज्यादा बेहतर होती जाएगी।
इस अवसर पर सहायक निदेशक डॉ बृजेश कुमार ने जानकारी दी कि जिले में गंगा के तटीय इलाकों के अलावे अन्य क्षेत्रों में भी जैविक खेती को बिहार सरकार बड़े पैमाने पर प्रोत्साहन दे रही है।इसका उद्देश्य है कि जिले में जब बड़ी संख्या में इसके उत्पादन कर्ता सामने आएंगे तो उसका बाजार ढूंढने में उनको किसी प्रकार की चुनौती नहीं रहेगी ।
डॉक्टर सच्चिदानंद सिंह ने प्राकृतिक खेती के बारे में जानकारी देते हुए कहा यह एक ऐसी खेती है जिसमें की पूरी तरह से सूक्ष्मजीवों के माध्यम से ही खेती को सुनियोजित किया जाता है और इस खेती में हम किसी भी प्रकार के बाहरी तत्वों का प्रयोग नहीं करते हैं केवल गोबर दाल का बेसन नीम का पत्ता जैसे संसाधनों का प्रयोग करके ही हम अपने खेती को शुरुआत करते हैं कृषि विज्ञान केंद्र में इस खेती का मॉडल भी बना करके रखा गया है जिसे की किसानों ने देखा और फसल के विकास को देखकर के उन्हें काफी प्रसन्नता भी है और उन्होंने संतोष व्यक्त किया और यह आश्वासन दिया कि यह खेती निश्चित रूप से करने लायक है और यह सभी लोग इस खेती को आने वाले समय में निश्चित रूप से शुरू करेंगे।

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