
आरा/भोजपुर (सुमन कुमार सिंह) 05 सितंबर।’लोर इस्कूल’ उर्फ ‘लोअर प्राइमरी स्कूल’ , भटौली । नहीं , कौन कहता है? छउवाँ क्लास तक पढ़ाई होने लगी, अब ‘अपर प्राइमरी स्कूल’ लिखो !” मस्टरवा बाबूजी (मझले पिताजी) डपट देते थे। घर से पाँच मिनट की दूरी थी। अब भी है। तब माटी का खपड़पोस था, अब ईंट के कमरोंवाला , चहारदीवारी युक्त। आजी और माँ की किस्सागोई , बड़की माई के मातृभाषाई मोहाबरों – कहावतों तथा भइया के सिखाये अक्षर ज्ञान के बाद पहलीबार दीदी के साथ स्कूल जाना शुरु किया। दीदी के संबंध में सब कहते थे ,पढ़ने में तेज है। एकबार वह किसी कारणवश एक-दो माह तक पढ़ने नहीं जा पाई। और जब गई तो मास्साब ने पिटाई कर दी। दूसरे दिन से मैं अकेले स्कूल जाने लगा। दीदी ने सदा के लिए स्कूल छोड़ दी। पाँचवीं के बाद उसने अपना सारा हुनर सिलाई-कटाई-बुनाई में झोंक दिया। मोहल्ले में नाम रहा। घर में भी। पर किसी को चिंता न रही कि आगे भी पढ़ना चाहिए।
भइया, पहले हीं मिडिल स्कूल , नवानगर में पहुँच गये थे। तब उनकी भी तेजई की खूब चर्चा थी। बाद में छोटा भाई भी उसी लोअर प्राइमरी उर्फ अपर प्राइमरी स्कूल का छात्र बना। इसी स्कूल में थे ‘लाल मोहर मास्साहेब’ उर्फ लालमोहर सिंह । वे हेडमास्टर भी थे। वहाँ सिपाही मास्साब भी थे। गणित पढ़ाते थे। कुटाई के प्राचीन स्रोत । गाँव में हीं जूटी चा के दलान में रहते थे। शनिवार को अपने गाँव जाते। लाल मोहर मास्साब बगल के गाँव ‘धेनुवा डीह’ से दस दुनी बीस किलोमीटर पैंडिल मार कर रोज आते-जाते। सिपाही मास्साब या लालमोहर मास्साब में से कोई एक जिस दिन अनुपस्थित होता , दूसरा सब विषय , सब क्लास में पढ़ाता। मिट्टी के खपरैले स्कूल के चारों ओर से बरामदे थे और बीच में एक बड़ा-सा चौरस हॉल। सबसे बड़ी क्लास हॉल में और चारों ओर से- बच्चा क्लास, दूसरी , तीसरी ,चौथी और पाँचवीं क्लास। सबकी बोरियाँ बिछतीं और मनोयोग से रट्टा मारते– ‘सै ..सै सइया एकक होतरा’..। पर जिस दिन लालमोहर मास्साब नहीं आते , सिपाही मास्साब हर क्लास में घूम कर मोर्चा लेते। चूं की आवाज न आती। पढ़ने का अभिनय तेज हो जाता। कुछ हीं देर में खर्राटे सुनाई पड़ते। ईंटे के सहारे लगे इकलौते अर्धांग बेंच पर सिपाही मास्सब लेटे होते और भिखारी भाई पैर दबा रहे होते। भिखारी हमसबों में देहिगर थे। बगल में उनका घर था। पढ़ने से अधिक मास्साब के लिए अच्छी-अच्छी ‘छाकुन’ जोगाड़ते। गाहे ब गाहे आलू और ईख भी। वे उतने हीं हमारे काम के भी थे। कभी गोल वाली दुधिया पिंसिन, कभी पंडी जी के खेत से स्लेट साफ करने के लिए कोबी की डाँटी तो कभी गेंदा खेलने के लिए कदम जोगाड़ते। भुतहिया ईमली के पेंड़ से ईमली वहीं ला सकते थे। भूतों के दोस्त थे इसलिए हमारे भी गहरे दोस्त थे। बाकी मित्र भी थे। उपेंद्र सिंह, जीतेंद्र सिंह, दुखीलाल पाल, सरोज पांडे़ आदि। मनोज पाड़ें , देवनारायण सिंह ई सब सिनियर थे। सबकी अपनी खूबी, अपनी खासियत थी। सड़क के किनारे का अपना इस्कूल तब भरा रहता था। यह इस्कूल तब और इस्कूल हो उठता जब लालमोहर मास्साब रौ में होते। हम सबों को अलग-अलग रिस्तों से संबोधित करते। मेरे (पिताजी) छोटके बाबूजी उर्फ शिवजी बाबूजी से उनकी खूब पटती। ठठ्ठा करते। मौसा कहा करते। सबसे बड़के बाबूजी भूवनेश्वर सिंह उर्फ बाघ सिंह की बहादुरी के किस्से भी घर से अधिक मास्साब की हीं जुबानी सुनने को मिले थे। मझले पिताजी यानी मस्टरवा बाबूजी को वे भी गुरुजी कहते। नहीं लगता था कि वे आनगाँव के हैं। गाँव के हर घर से संभवत: परिचित। सबके ‘उरिया-खुरिया’ से वाकिफ। तो लालमोहर मास्साब थे कि मेरे जैसे बहुतों को घर से रोते हुए टाँगकर ले जाया जाता और हँसा देते। पेट टो कर अँदाजते कि मतारी खायक दी है कि नहीं।
खुली सड़क के किनारे के इस स्कूल में तब न कोई सौचालय था न अहाता। सरकारी चापाकल बहुत बाद में नजर आया। जहाँ पानी पीने से अधिक झुल्हुआ झूला जाता। मलइयावाला टिफिन से पहले आ बैठता। बहुत रोने पर मास्सब कभी पाँच-दस पैसेवाला मलाई-बरफ खरीदवा देते। नाक सुड़ुकनी तब बंद हो जाती। कभी-कभी चवनिया गोल्डेन मलाई-बरफ भी गुरु कृपा से मिल जाया करती। कभी बहिरा का मलाई-बरफ सेतिहे खाने का प्लान होता तो भिखारी भाई काम आते। घर से भर मूठा नमक लाते और बहिरा की पेटी में डालकर भाग चलते। पहले देवनारायण सिंह भी यहीं उपक्रम करते थे। मैं उतना वैसा न था। इसका मलाल भी था। लालमोहर मास्सब जबतक रहे अपना यह इस्कूल जमा रहा। चौथी के बाद मैं भी एक दिन नवानगर की ओर मुड़ गया। संस्कृत विद्यालय में। वहाँ भी एक साल खूब मजे किये। इस क्रम में अनेक गुरु भये। अब भी हैं। पर सबसे अधिक लालमोहर मास्साब याद आते हैं। उनकी दहाड़ हमारे अभिभावकों की बोलती भी बंद कर दिया करती थी। उनकी ऐंठी हुई मूँछों की नोक में मेरे गाँव के हर अभिभावक का मोम था। शुक्रवार को स्कूल की लिपाई के लिए होड़ मची रहती। लिपने के बाद बड़की नहर में कूद-कूद कर नहाने की बारी होती थी। शनिवार को पूजा के बाद हम सबों द्वारा लाये हुए शनिचरा के चावल और गुड़ का प्रसाद बँटवाते। उसी चावल में से कभी-कभी शिवजी बाबूजी की खैनी खरीदने भर के लिए हिस्सेदारी भी बँट जाती। यह सबकुछ हँसते-हँसाते हुआ करता। हमारे लिए लालमोहर मास्सब के कारण यह स्कूल रोने का नहीं, हँसने और पढ़ने का स्कूल था। याद नहीं कि हम कुर्ता पहन के स्कूल कब गये? तब चप्पल – उप्पल भी कभी काम के नहीं लगे। घर से स्कूल के लिए तैयार करनेवाली माँओं की सुबह तब कुटौनी-पिसौनी में व्यस्त हुआ करती थी। उनसे हाफटाइम में घर जाने के बाद हीं ठीक से भेंट हुआ करती। पिता को भी इस सब के लिए बहुत समय नहीं होता था। कुछ गिरहस्ती में तो कुछ गाँव के चौक में जमी ‘तसपिटनी’ में नधे होते। वैसे में हमारा जो भी जितना भी था लालमोहर मास्साब और सिपाही मास्साब के भरोसे। हम छुट्टी की घंटी से अधिक मुँह से ‘छु…ट्ट..ई.. चिल्लाते और अपनी बोरियाँ स्कूल की दीवार पर पटक झाड़ते। सिपाही मास्साब से आँख बचाकर कभी – कभी एक दूसरे पर भी बोरियाँ झाड़ी जाती। भूख लग गई हो और मास्साब झपक रहे हों कि कोई चिल्ला पड़ता..सुइयावाला..रे..। और बस, बिन छुट्टी सब फरार । तब चेचक का टीका स्कूल में लगाया जाता था। उसका खूब आतंक था।
एकबार जब लालमोहर मास्सब हिंदी में ‘धनुष यज्ञ’ से जुड़ा कोई पाठ पढ़ा रहे थे या किस्सा सुना रहे थे।हिंदी और मातृभाषा की पुट के सहारे वे बिलकुल रौ में थे। अपने हाथ की छड़ी को उन्होंने दीवार के सहारे टिकाकर जमीन पर रख दिया था। यह राजा जनक का धनुष था। प्रसंग में सीता आँगन लिप रही थीं। जनक जी का धनुष मास्सब की छड़ी में साफ-साफ झलक रहा था। यह वहीं धनुष था जिसको बड़े-बड़े योद्धा भी नहीं उठा पाये। बचपन में सीता मइया उसे बाँये हाथ से इधर से उधर उठा रखती थी। मास्सब ने सीता की उस शक्ति का जो बिंब दिखाया , आज भी नहीं भूल पाया हूँ। उनकी प्रेरक व प्रभावी वर्णन क्षमता में हमारा लोवर प्राइमरी उर्फ अपर प्राइमरी इस्कूल गोते लगा रहा था। तभी बरामदे की दूसरी ओर से किसी ने टेर लगाई …’भाग रे ..भाग …सुइयावाला.’..! और बस इतना कहना था कि सिक्सटी परसेंट फरार! हम जैसे कुछ भाग न पाये। मजबूरन हमारी भी छुट्टी हो गई।
अगले दिन लालमोहर मास्साब ने सिपाही मास्साब को सबहरिये सँवारने का आदेश दे दिया। मजा आ रहा था। आह…उई..माई..रे..की मधुर रागिनी कानों में कुनमुना रही थी। लालमोहर मास्साब सड़क की ओर मुँह फेर कर मूँछें ऐंठ रहे थे। मैं उस दिन थोड़ी देर से स्कूल पहुँचा था। इसलिए परनाम करने गया । एकबार ..परनाम मास्साब,..दूसरी बार..परनाम मास्साब..! तब भी न सुन पाये शायद…लगा गुस्साये हैं। लीजिए.. जोर से बोलता हूँ..प..र..ना..म….मास्साहेब…! मास्साहेब.. प्रणाम स्वीकारिये ..अब तो!
अपने माई-बाबूजी, भइया , दीदी व सभी गुरुजनों को पुन:-पुन: प्रणाम!

