आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा) 04 सितंबर।जगजीवन कॉलेज आरा के संस्कृत विभाग द्वारा आयोजित त्रिदिवसीय संस्कृत सम्भाषण कार्यशाला का समापन प्राचार्या प्रो आभा सिंह की अध्यक्षता में हुई ।कार्यक्रम की दीप प्रज्जवलन ,माँ सरस्वती के चित्र एवं बाबू जगजीवन राम की प्रतिमा पर माल्यार्पण के साथ हुआ। इस अवसर पर श्री सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय के भूतपूर्व कुलपति एवं काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर गोपबन्धु मिश्र एवं एच. डी. जैन कॉलेज के संस्कृत विभाग के सहायक आचार्य डॉ संजय कुमार चौबे उपस्थित रहे।
डॉ गोपबन्धु मिश्र ने अपने वक्तव्य में विदेशों में संस्कृत भाषा एवं उसके विद्वानों की बढती माँग को रेखांकित किया।प्रो मिश्रा ने बताया कि अपनी योग्यता संस्कृत को पढ़ने में लगाने पर बल दिया। इन्होंने निवेदन किया कि साधन तो हर जगह बढ रहें हैं लेकिन अध्ययन–अध्यापन की साधना में जबरदस्त गिरावट आ रही है जिस पर ध्यान देना होगा।उन्होने विस्मिल्लाह खान के शहनाई साधना का जिक्र करके साधना की उत्कृष्टता को दर्शाया। इन्होंने कहा कि मेरी कर्मभूमि आरा रही है और मैं जो भी हूं आरा की देन है। इससे मिट्टी का सदा कृतज्ञ रहूंगा।
डॉ संजय कु. चौबे ने संस्कृत सूक्ति ‘अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः’ कहकर बताया कि योग्यता सबमें होती है किन्तु सही समय पर उसका नियोजन करने वाला मिल जाय तो व्यक्ति बडा से बडा कार्य कर सकता है। सच्चे समर्पण भाव से जिस भी विषय को पढा जाय वह उसे सफलता अवश्य दिलायेगी।
अध्यक्षीय भाषण में प्राचार्या डॉ आभा सिंह ने संस्कृत के श्रवण एवं उच्चारण के महत्त्व को रेखांकित किया और बताया की संस्कृत भाषा में 18 प्रकार से अ के उच्चारण पद्धति है।इसके बाद कार्यशाला में भाग लेने वाले छात्र/छात्राओं को प्रमाणपत्र प्रदान किया गया। कार्यक्रम का सञ्चालन एवं अतिथियों का परिचय सह स्वागत संस्कृत विभागाध्यक्ष डॉ सत्येन्द्र पाण्डेय ने किया एवं धन्यवाद ज्ञापन मनोविज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अजय कुमार ने किया।
समापन सत्र के पश्चात् महाविद्यालय परिसर में स्थित वृक्षों पर शिक्षकों एवं छात्र/छात्राओं द्वारा संस्कृत नाम पट्टिका लगाया गया।
