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स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर आकाशवाणी जी-२० के तत्त्वावधान में आयोजित हुआ ‘साहित्य समागम’, देर संध्या तक साहित्य सम्मेलन में काव्य-रस की गंगा बहती रही, डूबते उतराते, खिलखिलाते रहे श्रोता।

पटना/बिहार 14अगस्त। “जो खद के लिए जिए वो इंसान क्या जिया/ जो देश पर मिटे उसे सौ-सौ सलाम कहना।”– “पिया बनिता तू सेना के सिपाही, त हमहु गुमान करती”—- “होते हरिश्चचन्द्र टेरेते पुकार फिर, नींद टूट जाती इस देश के निवासी की” —– “हमारे इश्क़ का हरेक निशान रौशन है/ तिरंगा शान है हिंदुस्तान रौशन है”— “जो शख़्स सब से टूट के मिलता है हर घड़ी/ वह शख़्स इत्तेफ़ाक से मेरा कभी तो हो”– ऐसी ही देश भक्ति और दिल में कसक पैदा करने वाली पंक्तियों के साथ कवियों और कवयित्रियों के कंठ-स्वर से निकली रस-गंगा में बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन देर संध्या तक डूबता उतराता रहा। अवसर था, स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर, जी-२० के अंतर्गत प्रसार भारती और आकाशवाणी, पटना द्वारा आहूत ‘साहित्य-समागम’ का, जिसमें हिन्दी, ऊर्दू, मैथली, भोजपुरी, अंगिका और बज्जिका के वरिष्ठ कवियों और कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं का हृदय-ग्राही पाठ किया।
सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ की अध्यक्षता में आयोजित इस बहुभाषाकवि-सम्मेलन की रस-गंगा की गंगोत्री बनी डा अर्चना त्रिपाठी ने अपनी लम्बी कविता में स्त्री-मन की समस्त वेदनाओं को बाहर निकालती हुई अंत में यह कहती हैं कि “नारी को देवी न बनाओ/ उसकी पूजा भी मत करो/ उसे स्त्री ही रहने दो!”
ऊर्दू और हिन्दी के मशहूर शायर डा क़ासिम खुरशीद ने जब अपना यह शेर पढ़ा कि ” हामारे इश्क़ का हरेक निशान रौशन है/ तिरंगा शान है,हिंदुस्तान रौशन है”, तो पूरा सभागार तालियों से गूंज उठा। वरिष्ठ कवि मृत्युंजय मिश्र ‘करुणेश’ की इन पंक्तियों को भी श्रोताओं की ख़ूब सराहना मिली कि “हैं आप क़द्रदां तो फिर चुप रहूँ मैं कैसे? कहने को कुछ ग़ज़ल क्यूँ यह मन मचल रहा है/ गिरने से मुझे हरदम ये कौन बचा लेता/ साया की तरह कोई मेरे साथ चल रहा है।
सीतामढ़ी से आए बज्जिका के वरिष्ठ रचनाकार राम किशोर सिंह ‘चकवा’ ने एक स्त्री की आकांक्षा को प्रकट करते हुए कहा कि “पिया बनिता तू सेना के सिपाही, त हमहु गुमान करती/ करिता सीमा के रखवारी त हमहु गुमान करती।”
वरिष्ठ कवि और भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी डा उपेंद्र नाथ पाण्डेय ने भारतीय नागरिकों की निद्रा तोड़ने की नीयत से ये पंक्तियाँ पढ़ीं कि ” होते हरिश्चचन्द्र टेरते पुकार फिर/ नींद टूट जाती इस देश के निवासी की/ पंत औ प्रसाद, गुप्त, महादेवी, दिनकर के / काव्य-पुष्प-वृन्तों की अर्चना अमर होती/ गाते रसखान, सूर, मीरा अमर होती।”
शायरा तलत परवीन ने अपना इजहारे-ख़्याल यों किया कि “दिल को सुकूं मिला है तुझे देखने के बाद/ ख़ुशियों का सिलसिला है तुझे देखने के बाद/ अब लुत्फ़ क्या मिलेगा किसी शैय की दीद से/ जो लुत्फ़ मिल रहा है तुझे देखने के बाद!” उनकी इन पंक्तियों ने भी ख़ूब तालियाँ बटोरीं कि ” हस्ती में मेरी ऐसा सवेरा कभी तो हो/ रहमत का एक साया घनेरा कभी तो हो/ जो शख़्स सब से टूट के मिलता है हर घड़ी/ वह श्ख्श इत्तेफ़ाक से मेरा कभी तो हो!”
कवि सुनील कुमार दूबे ने ‘सैनिक पुत्र के नाम बूढ़ी माँ का पत्र” नामक अपनी रचना में देह के लिए लड़ रहे बलिदानी सिपाहियों की मार्मिक कथा का करूण वर्णन किया। मगही के सुख्यात कवि और मगही अकादमी के पूर्व अध्यक्ष उदय शंकर शर्मा ‘कवि जी’ मगही में अपनी रचना पढ़ कर श्रोताओं को गाँव की ओर ले गए और उसके प्राणवंत-सौंदर्य से अवगत कराया। सस्वर पढ़ी गयी इन पंक्तियों, “दुनिया हे मस्त जहां, अपन अपन काम में/ लगे ही चौपाल, आज भी हमर गाँव में/ होली, दसहरा, ईद गाँव के सिंगार/ एक दोसरा घर भेजे उपहार/ १५ अगस्त मनल जा हे धूमधाम में/ लगे हे चौपाल आज भी हमर गाँव में” का दर्शकों ने हाथ-खोल कर स्वागत किया।
भोजपुरी में अपनी रचना पढ़ती हुईं कवयित्री डा पूनम आनंद ने कहा कि “पनरह अगस्त सैंतालिस के दिनवा, सपनवा भइल साकार हो/ लहराए लागल आपन तिरंगा, धरती आऊर आकाश हो!” युवा कवि एवं पत्रकार चंदन द्विवेदी ने भी अपनी इन पंक्तियों से श्रोताओं पर गहर असर डाला कि ” हृदय जब अल्पमत में था तो बहुमत बन गई कविता/ समर में कारगिल में अटल बनकर धान गई कविता/ लिखा इतिहास में है आज भी सब जानते हैं कि धनानंद सामने चाणक्य बनकर तं गई कविता!” मैथिली की कवयित्री स्वयंप्रभा झा, अंगिका के कवि त्रिलोकी नाथ दिवाकर, शायरा श्वेता ग़ज़ल तथा कुमार अनुपम ने भी अपनी रचनाओं से दर्शकों का मन रंजित किया।
अपने अध्यक्षीय काव्य-पाठ में डा सुलभ ने अपनी इस ग़ज़ल को देश के बलिदानियों को समर्पित करते हुए सस्वर पढ़ा कि ” ऐ दिल तु उनसे जाकर मेरा सलाम कहना/उनको ही पेशे-ख़िदमत है मेरा कलाम कहना/ जो खद के लिए जिए, वो इंसान क्या जिया/ जो देश पर मिटे उसे सौ-सौ सलाम कहना”। उन्होंने अपने गीत “हम मंजता के प्रतिमान/ आदि सभ्यता हमारी है/ कोई भूखण्ड नहीं अपना/ समस्त वसुधा हमारी है!” के माध्यम से भारत की गौरव-गाथा और वसुधैव-कुटुम्बकम की महान अवधारणा को स्वर दिया।
कवि-सम्मेलन का उद्घाटन दीप-प्रज्वलित कर, आकाशवाणी, पटना के केंद्र अधीक्षक वेद प्रकाश ने किया। उन्होंने सभी कवियों और कवयित्रियों का, वंदन-वस्त्र और पुष्प-गुच्छ प्रदान कर अभिनन्दन किया। अतिथियों का स्वागत दूरदर्शन, बिहार के कार्यक्रम प्रमुख डा राज कुमार नाहर ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन आकाशवाणी, पटना के कार्यक्रम अधिशासी अनिल कुमार तिवारी ने किया। मंच का संचालन आकाशवाणी-दूरदर्शन की उद्घोषिका अनुपमा सिंह ने किया।
इस अवसर पर, सम्मेलन की उपाध्यक्ष डा कल्याणी कुसुम सिंह, वरिष्ठ कवि बच्चा ठाकुर,डॉ पुष्पा जमुआर, शमा कौसर, मंजू प्रकाश, सुनील कुमार उपाध्याय,ओम् प्रकाश पाण्डेय ‘प्रकाश’, जय प्रकाश पुजारी, डा अमनोज गोवर्द्धनपुरी, अनिल कुमार, डा सीमा यादव, शुभ चंद्र सिन्हा, रेखा भारती,डौली बगड़िया, सागरिका राय, डा शालिनी पाण्डेय, डा विद्या रानी, कमल प्रसाद ‘कमल’ , डा कुंदन लोहानी, अर्जुन प्रसाद सिंह, नेहाल कुमार सिंह ‘निर्मल’ आदि सैकड़ों की संख्या में कविगण और सुधी श्रोता उपस्थित थे।

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