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सुरेश पटवा की पुस्तक “हिंदू प्रतिरोध गाथा” लोकार्पित ।

भोपाल/मधयप्रदेश 10 अगस्त।मानस भवन में पूर्व सांसद एवम मानस भवन के अध्यक्ष रघुनन्दन शर्मा की अध्यक्षता, मध्यभारत के संघचालक, पूर्व न्यायाधीश माननीय अशोक पांडे के मुख्य आतिथ्य और साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश, के निदेशक डॉ विकास दवे के सारस्वत आतिथ्य में सुरेश पटवा की पुस्तक “हिंदू प्रतिरोध गाथा” का लोकार्पण हुआ।
संचालन करते हुए साहित्यकार गोकुल सोनी ने भूमिका बांधते हुए पुस्तक की विषय वस्तु पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यदि महान पुरुषों का सार्थक प्रतिरोध न होता तो इतने सारे आक्रमणों के पश्चात भी हिंदू सभ्यता का अक्षुण्ण रहना मुश्किल था।
सीमा हरि शर्मा ने सरस्वती वंदना से कार्यक्रम का शुभारंभ किया। महेश सक्सेना ने स्वागत उद्बोधन दिया। उपस्थित मेहमानों और साहित्यकारों का स्वागत गौरीशंकर शर्मा गौरीश, डा राजेश श्रीवास्तव, महेश सक्सेना, डा मोहन तिवारी आनंद, अरुण डनायक ने किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए रघुनन्दन शर्मा ने कहा कि यह पुस्तक प्रामाणिक रूप से सिद्ध करती है कि “हिंदू चेतना” छह हज़ार सालों से भारतीयता की संवाहक शक्ति है। जिसके बग़ैर भारतीय समाज की एवम समरसता की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
मुख्य अतिथि की आसंदी से बोलते हुए माननीय अशोक पांडे ने पुस्तक को अत्यंत महत्वपूर्ण निरूपित करते हुए कहा कि हिंदू चेतना भारतीय जीवन प्रणाली की आत्मा है। जिस तरह जीवन स्फुरण में आत्मा का महत्व है, उसी तरह भारत के अस्तित्व में हिंदू चेतना सन्निहित है।
लाजपत आहूजा ने भी पुस्तक पर अपने विचार प्रकट करते हुए उसे अदभुत एवम समाजोपयोगी बताया।
डॉ विकास दवे ने कहा कि जब तक हिंदू संस्कृति है तब तक भारतीयता ज़िंदा है, लोकतंत्र ज़िंदा है, विमर्श की पद्धति ज़िंदा है। हिंदू चेतना को संरक्षित रखना प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है।
साहित्यकार देवेंद्र रावत ने पुस्तक की समीक्षा प्रस्तुत करते हुए, पुस्तक को नागरिकों, साहित्यकारों और मनीषियों हेतु अत्यंत उपयोगी निरूपित करते हुए कहा- यह किताब भारतीयता में हिंदू चेतना की पक्षधर है ताकि विमर्श की परम्परा, परम स्वतंत्र लोकतांत्रिक जीवन दर्शन का आधार बने रहे।
लेखक सुरेश पटवा ने पुस्तक के सृजन से जुड़ी यादों को साझा करते हुए कहा कि यह किताब पिछले बारह सौ सालों में भारतीयता की रक्षार्थ आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक स्तर पर किए गए संघर्षों की लंबी दास्तान है। जिसे शुरू से अंत तक पढ़कर ही समझा जा सकता है।
कार्यक्रम के अंत में घनश्याम मैथिल ने पुस्तक को शास्त्र और शस्त्र से भारतीयता की रक्षार्थ बारह सौ सालों के दौरान किए गए सतत संघर्ष की गीता निरूपित करते हुए सभी साहित्य रसिकों का आभार प्रदर्शन किया।

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