RK TV News
खबरें
Breaking Newsपर्यावरण

भोपाल का गो-काष्ठ अन्य राज्यों का भी बचा रहा वन एवं पर्यावरण।

भोपाल/मध्यप्रदेश 30 जुलाई।पृथ्वी पर प्राणी मात्र के अस्तित्व के आधार जंगल और स्वच्छ पर्यावरण को बचाने की एक अनूठी अलख जगी है, मध्यप्रदेश के भोपाल से। गो-काष्ठ मेन ऑफ इंडिया कहे जाने वाले सेंट्रल पॉल्यूशन बोर्ड के वैज्ञानिक डॉ. योगेन्द्र कुमार सक्सेना द्वारा 5 साल पहले भोपाल में शुरू की गई मुहीम से अब तक 5 लाख 10 हजार क्विंटल लकड़ी और तकरीबन 3400 एकड़ का वन क्षेत्र बच सका है। वहीं गोबर के आय परक होने से गो-शालाओं में बेसहारा, वृद्ध और अनुपयोगी गायों की पूछ-परख बढ़ गई है। शव दहन, होलिका दहन, औद्योगिक बायलर, होटल के तंदूर एवं अलाव आदि में लकड़ी का स्थान गो-काष्ठ लेने लगा है।
डॉ. सक्सेना ने बताया कि गो-काष्ठ के जलने से 24.80 प्रतिशत कार्बन डाई ऑक्साइन का उत्सर्जन कम होता है। नमी कम होने के कारण गो-काष्ठ जल्दी जल जाता है और आम की लकड़ी देर तक जलती रहती है। सामान्य लकड़ी से शव दहन को 8 से 9 घंटे लगते हैं, जबकि गो-काष्ठ से यह प्रक्रिया 4-5 घंटे में पूरी हो जाती है। सामान्य लकड़ी की खपत 4 से 5 क्विंटल के विरूद्ध गो-काष्ठ केवल ढ़ाई से 3 क्विंटल ही लगता है। हिन्दु मान्यता के अनुसार यह पवित्र होने के साथ सस्ता भी पड़ता है।
भोपाल के 10 श्मशान घाट में आमजन गो-काष्ठ का प्रयोग स्वेच्छा से करने लगे हैं। भोपाल ही नहीं दिल्ली, बनारस, कानपुर, नागपुर, मुम्बई, जयपुर, अमरावती, रोहतक, रायपुर, इंदौर, कटनी, छिंदवाड़ा, नासिक, प्रयागराज आदि शहरों में भी भोपाल के गो-काष्ठ का प्रयोग अंतिम संस्कार के लिये किया जा चुका है।
भोपाल गो-काष्ठ पूरे देश में एक मॉडल के रूप में स्थापित हो चुका है। केन्द्र शासन द्वारा राज्यों को राष्ट्रीय स्तर पर भोपाल मॉडल को आधार बनाते हुए गो-काष्ठ निर्माण और उपयोग के लिये दिशा-निर्देश जारी किये गये हैं।
भोपाल में साढ़े 3 लाख क्विंटल गौ-काष्ठ का उपयोग हो चुका है। इसमें से 80 हजार क्विंटल गो-काष्ठ होलिका दहन में उपयोग हुआ। गो-काष्ठ के एवज में लगभग 85 हजार पेड़ कटने से बचे हैं।
डॉ. सक्सेना की देख-रेख में बुधनी की वर्धमान इंडस्ट्रीज में केप्टिव पॉवर प्लांट में फेबरिक के निर्माण में ईंधन के रूप में गो-काष्ठ का प्रयोग हुआ। इससे 19 मेगावॉट की बिजली बनाई गई, जो बिल्कुल कोयले की तरह जली। गो-काष्ठ के उपयोग से 30 प्रतिशत प्रदूषण भी कम होता है। केप्टिव पॉवर प्लांट मं 135 टन प्रति घंटे क्षमता का बायलर है, जिससे अधिकतम 115 टन प्रति घंटे भाप का उत्पादन किया जाता है और 24 मेगावॉट के प्लांट में अधिकतम 19 मेगावॉट बिजली बनती है, जिसके लिये रोज 360 टन कोयला इस्तेमाल होता है। डॉ. सक्सेना द्वारा किये गये ट्रायल में मात्र 36 टन गो-काष्ठ का उपयोग किया गया। इससे भाप, बिजली और फेबरिक के उत्पादन में कोई अन्तर नहीं देखा गया। कंपनी 100 प्रतिशत तक गो-काष्ठ उपयोग पर विचार कर रही है।

Related posts

चतरा:मंत्री संजय प्रसाद यादव का चतरा आगमन।

rktvnews

दैनिक पञ्चांग: 10 जुलाई 24

rktvnews

भोजपुर:देव सूर्य मंदिर परिसर के विकास एवं सौंदर्यीकरण कार्य का भूमिपूजन सम्पन्न।

rktvnews

तापमान में वृद्धि को देखते हुए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने राज्यों के साथ भीषण गर्मी से जुड़ी तैयारियों तथा गर्मी के महीनों में अस्पतालों में आग लगने की घटनाओं को रोकने संबंधी उपायों पर समीक्षा बैठक की।

rktvnews

भोजपुर: 09 मार्च के राष्ट्रीय लोक अदालत हेतु 21 बेचों का किया गया गठन।

rktvnews

गढ़वा:मंडल डैम एवं काण्डी वितरणी परियोजना के कार्यों में आएगी तेजी, उपायुक्त ने तय की समय-सीमा।

rktvnews

Leave a Comment