प्रो. महताब आलम रिज़वी के पक्ष में छात्र हुए एकजुट , कहा—आरोपों की सच्चाई कानूनी प्रक्रिया से हो तय।
नई दिल्ली/डॉ एम रहमतुल्लाह 03 सितंबर।जामिया मिल्लिया इस्लामिया के बड़ी संख्या में छात्रों ने जामिया नगर थाने पहुंचकर विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार प्रो. महताब आलम रिजवी के खिलाफ कथित रूप से प्रसारित किए जा रहे आपत्तिजनक और मानहानिकारक आरोपों को लेकर शिकायत दर्ज करने तथा पूरे मामले की जांच की मांग की। छात्रों ने भूपेंद्र पाल सिंह चौहान और हारिस उल हक के खिलाफ शिकायत देते हुए प्रसारित सामग्री की सत्यता और उसके स्रोत की जांच की मांग की।
छात्रों का आरोप है कि सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से रजिस्ट्रार के संबंध में ऐसी सामग्री प्रसारित की जा रही है, जिसमें पर्याप्त तथ्यों और संदर्भ का अभाव है। उन्होंने पुलिस से यह पता लगाने की मांग की कि सामग्री कहां से प्रसारित हुई, उसमें किए गए दावे कितने सत्य हैं और क्या इस प्रक्रिया में किसी कानून का उल्लंघन हुआ है।
छात्रों ने यह भी कहा कि रजिस्ट्रार के पक्ष में पहले ही एक सिविल अदालत का आदेश आ चुका है। उनके अनुसार, अदालत ने विवादित आरोपों से संबंधित सामग्री के प्रसार पर रोक लगाई है तथा रजिस्ट्रार की नियुक्ति और पदोन्नति को विश्वविद्यालय की निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया के तहत किए जाने का उल्लेख किया है। आदेश में रोक के बावजूद संबंधित सामग्री के आगे प्रसार पर अवमानना की कार्रवाई की बात भी कही गई है।
आलोचना पर रोक नहीं, लेकिन आरोपों की सत्यता जरूरी
प्रदर्शन में शामिल छात्रों ने स्पष्ट किया कि उनका उद्देश्य वैध आलोचना को रोकना नहीं, बल्कि गंभीर आरोपों को तथ्य के रूप में प्रस्तुत किए जाने से पहले उनकी सत्यता की जांच सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि नियुक्ति, पदोन्नति और प्रशासनिक निर्णय जैसे विषय विश्वविद्यालय के निर्धारित नियमों और वैधानिक प्रक्रियाओं के अंतर्गत आते हैं और इनके संबंध में शिकायत के लिए उचित संस्थागत मंच उपलब्ध हैं।
छात्रों ने सोशल मीडिया पर अधूरी अथवा अपुष्ट सूचनाओं के तेजी से प्रसार पर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि डिजिटल माध्यमों के जरिए कोई भी आरोप कुछ ही समय में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकता है, जबकि उसकी तथ्यात्मक जांच में समय लग सकता है। छात्रों के मुताबिक, रजिस्ट्रार से संबंधित प्रसारित सामग्री में कई बातों को उनके मूल संदर्भ से अलग करके पेश किया गया है।
छात्रों ने कहा कि किसी वरिष्ठ अधिकारी पर लगाए गए अप्रमाणित आरोप केवल संबंधित व्यक्ति की प्रतिष्ठा को प्रभावित नहीं करते, बल्कि पूरे संस्थान की छवि पर भी असर डालते हैं। उन्होंने विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा की रक्षा को छात्रों और विश्वविद्यालय समुदाय की साझा जिम्मेदारी बताया।
पुलिस से छात्रों की मुख्य मांग है कि रजिस्ट्रार के खिलाफ लगाए गए आरोपों और उन्हें प्रसारित करने में इस्तेमाल सामग्री की कानूनी दायरे में जांच की जाए। यदि जांच में किसी कानूनी प्रावधान के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो संबंधित लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
छात्रों ने कहा कि विश्वविद्यालय और उसके अधिकारियों से जुड़े विवादों का समाधान आरोप-प्रत्यारोप के बजाय तथ्यों, प्रमाणों, निष्पक्ष जांच और निर्धारित कानूनी एवं संस्थागत प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए। उनका कहना है कि सोशल मीडिया महत्वपूर्ण मंच है, लेकिन इसकी व्यापक पहुंच के कारण अपुष्ट जानकारी के तेजी से फैलने का खतरा भी बढ़ गया है। इसलिए किसी भी आरोप को साझा करने से पहले उसकी सत्यता की जांच आवश्यक है।

