कुन्ती-कर्ण सोपान
शान्ति के गपचे काल
भयंकर आ गइल;
धरती पर उगले आग,
ऊहे दिन आ गइल।
नियति के खाका अबे
पूरा खींचाइल बा,
बिहने से संग्राम होइहें,
दिन रखाइल बा।
पूरब भोरे में जसहीं,
ललकी फूटी किरिनिया,
समर में बाण चढ़,
मृत्यु छूटे लागी।
धुआ आकाश भर जाई,
मुंड छीलन संहार होखे लागी;
अइसन छाई अन्हरिया,
कुछ ना लउके लागी।
हर लोग के नाता हित तक,
यम से बड़ लागे लागी;
गोतिया भाई, भाई के,
यमराज अस दुश्मन लागी।
भाई के जान भाई,
काल्हे से लेबे लगिहें;
लोगन के खून में,
लोग नेहाये लगिहें।
भौचक डूबल चिन्ता में, कोठी में,
व्याकुल कुन्ती मन सोचे लगले।
हे प्रभु, ई संयोग का टरी ना ?
साँचे कुन्ती हिरदा फाटी ना ?
एके कोख के जामल,
एके गोद के भाई;
का साँचे हो दु तरफा
लड़िहन ऊहो लड़ाई ?
का साँचे अर्जुन के
जान कर्ण ले लिहन ?
कि अर्जुन हाथे
ई मारल जइहें।
दूनों में जेकर छाती टूटे,
कुन्ती सहजे में फटिहें;
चाहे जेकर गरदन कटे,
हमरे काटल जइहें।
चाहे पार्थ के मारस कर्ण,
भा पार्थ, कर्ण के मारस;
हमरा छोड़ के करा पर,
आग के गोला बरसी।
मन से, दुखे फिकिर में डूवल,
कुन्ती डेग बिदुर भवन से बाहर बढ़ल।
सूरज पर नजर पर उठवते,
कुछ लाजे घबड़ाते;
पाकल केश के बेरिया,
चलली हलचल में घबड़ाते।
अवते याद कुँआरी पन के,
बड़ चोट प्राण पर सहे लगली;
पतंग अस चिन्ता के डोरी से,
उभ-चुभ होके उड़े लगली।
डरत भुलात डगर पर, मिली,
केहू से आसरा मन में बन्हली;
कसहूँ-कसहूँ कुन्ती,
गंगा घाट पहुँचली।
धरती आकाश के जहँवा योग,
सूरज पश्चिम ओर झाँकत रहलें;
झाँकहिं बेरिया सोना भरल गगरा,
धरती पर पसरावत रहलें।
रवि किरण पड़ते देहिया पर,
फिर से निखार आ गोइल;
उनके अंजोर पड़ते लिलार,
सूरज अस सुबरण हो गोइल।
लागल दू सोना के जोड़ी,
जड़ एक, दू चोटी, एके साथ मिलल हो;
रात अवहीं के बेरी सट के,
लागल दूनों बइठल हो।
लागल कि अरूण देव के बिन्दी,
लिलार कोई सटले होई;
गंगा तीर फड़कावत गरुड़ पाँख,
सूरज से कोई ढँकल होई।
लागल कि हवन आग से,
दूगो बड़ लौ निकलत होखे;
ओही लौ से सूरज के शोभा के,
आरती केहू उतारत होई।
अइसनो लागल कि कतहीं
सोना के सागर में डूब नहा के;
मैनाक पर्वत्त होखो खाड़,
सामने दुनों हाथ फैलाके।
आपन बेटा के रूप निरख,
बहुते गद्गद् कुन्ती भइली;
लागल तनिका देर ऊ,
सारा दुख-दरद भुलइली।
छाती से दूध छलके लागल,
उठल पपनी त उठले रहल;
खड़ा तीर, ममता जल से,
तन-तनय धोवत रहली।
केहू के पाँव के खटका सुनते,
कर्ण के ध्यान बँटाइल;
सामने देख देवी के,
कुछ शब्द विनय के आइल।
दिल में अनुराग जे बड्वे,
तोहरे चरणन में राख्ात बानी,
हे देवी, हम राधा सुत,
तोहरा के नमन करत बानी।
के बानी रउवा बतलाई,
काहे खातिर इहँवा आइल बानी; कवन हुकुम बा हमरा खातिर,
जे रउवा ले आइल बानी।
ई त कुरूक्षेत्र के धरती ह,
युद्ध केई जगहा ह;
सांझ के ईबेला ह,
सूरज ढले के बेला ह।
ई सूनसान नदी के तीर,
बड़ा डरवावन बा;
ओह में रउवा नारी अकेले बानी, उमिरो राउर ढलल बा।
देवी बोलीं, के बानी ?
बतलायी, कवन काम हमरा से बा; बोलीं, कवन सेवा हमरा,
रउरा पाँव धरे के बा।
जब कडुआ बात काने पड़ल,
कुन्ती के धीरज टूट पड़ल
भीतर के दुख संजोवल,
आंसू बन के फूट पड़ल।
होके शिथिल बिलबिलाइल,
कुपित स्वर मे कहली;
रे कर्ण, अइसन कठोर बात के,
बरछा मत भोंक, ऊ कहली।
तू राधा के बेटा ना,
हमरे कोखी के जामल हव;
जवने वंश के धर्मराज,
ओही वंश के जामल हव।
तू ना हव सूत के पुत,
राज वंश के बेटा हव;
जइसन पार्थ ओइसने तू,
कुरुकुल के पटीदार हव।
तीन-तीन लाल जवना जोगाड़ से,
हमरा गोदी में अइलें;
आइल बाड़ ऽ ओसहीं तू,
कोखी में पहिल पहिले।
गोदी में पा तोहरा के,
हमरो मन गदराइल रहे,
हम कुन्ती जननी तोहार
पर अभागिन अस भाग्य बहे।
तोहरा आवे के बेरी,
हम बिन व्याही कुँआरी रही;
तोहरा अस अनमोल लाल के,
असमय में पवले रहीं।
ई कथा बड़ा दारुण बा,
दूध मुँहा अपना तन के जमला के;
लाज-डर के मारे भागे पड़ल,
छोड़ तोहरा के एहु समाज से।
धरती पर नारी बड़का,
दुखियारी हो ले बेटा;
नारी होली सबसे बलहीन,
यदि माँ कुँआरी बने बेटा।
समाज के कइल मुँह बन्द,
बड़ा काम कठिन होला;
आपन सुख खातिर,
नीच के माथ ना ऊपर होला।
अतने ना, हम रहीं बालिका भोली,
हर बात के बुझले ना रहीं;
कतना नीचे गिर जाइब एह से,
एकरा के जँचले ना रहीं।
छाती पर पत्थर रख अपना,
तोहरा के बक्सा बीच रख देनी;
आपन हिरदा के लाल के,
जलधारा के बीचे छोड़ देनी।
अइसन संयोग बनल कि,
सूत पत्नी राधा हाथ पलइलऽ;
ओह दयगर राधा पर हमरा,
ना तनिको खटगर बुझाइल।
ओह देवी के पास ले चलऽ,
उनकर दूनों पाँव हम धरब;
बड़की दीदी मान के उनका,
भर अँकवारी हम धरब।
बाकी एगो बात के सुनऽ बेटा,
जवना खातिर हम आइल बानी;
नइखे कवनो आदेश हमार,
बस प्रार्थना करे आइल बानी।
बिहने से जवन संग्राम,
कुरूक्षेत्र में छिड़े वाला बा;
काल्हे से क्षत्रिय समाज पर,
जे महाविनाश घेरे वाला बा।
ओह में पांडव विरोध में,
मत लड़िह सुत तुहूँ,
ओह सब के मत मरिह,
ना उनका हाथे मरिह तुहूँ।
हमरे एक बेटा हमरे बेटवन के,
भला खीस में मारस;
खीसी अपने में एक दुसरा से,
आपन क्रोध उतारस।
अइसन दुखदायी घटना,
हमरा से सहले ना जाई;
ना अब आउर हमरा से,
चुप-चाप बइठलो जाई।
अब तक त मुँह सिअले सिअल, मनवे में हम खुरचत रहीं;
जग के अब बतला के रहब,
जवन दुख दुनिया में सहत रहीं।
जवना डर-लाज से कबहूँ,
तोहरा के छोड़ भागल रही;
लेकिन सपनों में ना,
तोहरा के कबहूँ भूलल रहीं।
ओह जड़ समाज के माथा पर,
बे हिचके अब लात लगाइब;
बहुत डेरइलीं अब तक दुनिया से, अब ना अधिक डेराइब।
हम त बहुत पीछा से,
आपन बाजी हारल बानी;
पता ना बडुवें ब्रह्मा भी,
कतना निष्ठुर बनल बानी।
ना देलख तोहरा जनम के
छिपल राज बतावे हमरा;
ना तोहरा तक आवे देलस,
चहलो पर कबहुँ हमरा।
पर बेटा कुछ अउरी बात मत,
मन में तनिको सोचिह;
कबहूँ-कबहूँ अइसन घटना,
घट जाला जीवन में जनिह।
अबहू दौड़ के आवऽ बेटा,
जल्दी गोदी में हमरा;
अब संहार नियरे बा,
मत करऽ देर आवे में गोदी हमरा ।
अबहूँ त जहर के बैर समेटबऽ,
रोष के लहर रोक के रखबऽ;
बोल कर्ण समर में अब,
तू केकरा के संघरबऽ।
पाँचो पांडव छोट भाई हवन,
तूहीं बड़का भैया हवऽ;
बड़ होखला से ओह लोगन के,
रक्षा के भार तोहरे हवऽ।
लेलऽ लगाम समर के अपना हाथे, ओह सबन के नेता बन जा;
सब छोट भाई पर आपन,
बड़ छाया, भुजा के फैला जा।
लड़कर के इहो रण जीतऽ,
विजय के बड़ माला पेन्हऽ;
जय के मुकुट माथा पर रख,
संउसे धन के भोगऽ।
एह में ना कवनो छल के,
हिसाब बइठावल बा;
बेटा जतना कहलीं,
तनिको नाहिं बनावल बा।
ना करबऽ विश्वास, बोलऽ,
कवन किरिया हम खायीं,
केकरा के अपना पास बुला,
आज गवाह बनायीं।
पश्चिम और ऊपर नभ में’,
नजर उठा के तनिका देखाऽ;
पीत वस्त्र पेन्हले जे चमकत,
ओह देवता के देखअ ।
उनके बल से किरण में,
अतना ज्योति चमकत बा;
ओही सूरज के सुत हव,
ओसहीं तेजी चमकत बा।
थथम के कुन्ती अँचरा से,
पोंछे लगली आपन लोर;
अतने में नभ में चमकल बिजली, भइल शब्द घनघोर।
जतना सुनलऽ कुन्ती से,
सब ही सांचे जनिह;
माँ हई, रवि कहलन बेटा से,
इनकर बात के मनिह।
अतना कहते कहत सूरज,
झटके अम्बर के नीचे गइलन;
कुन्ती के लगते लहर,
लाल-लाल हो गइलन।
जइसे कि कुन्ती के बोझ,
उनका डरवावन लागल;
मत पड़े बोझ सम्हाले के,
भगलन हड़बड़ में लागल।
साँझ सूरज के अरघ चढ़ा के,
कुन्ती पद रज शीश चढ़ा के;
बोललन राधेय बड़ा दुख से,
बेटा कहलू कवना मुँह से,
तोहरा बा कवन काम सुत कर्ण से, मैला एह अपूत से।
तू बड़ कुल के बेटी ठकुरानी बाडू, अर्जुन के माई, पांडु कुल के रानी बाडू
हम नीच गोत्र दुखित छोटा बानी, एक्कावान अधिरथ के बेटा बानी।
बोल ठकुरानी, का करबू हमरा के लेके,
का करबू मैला, धवल गोदी में लेकें।
जनम के बात सब जानत बानी,
बात मत आउर तुहूँ बढ़ावऽ,
मत आउर कोड़ कोड़ के,
हमरो भूलल दुख हरिआवऽ।
खूब नीके से मालूम बा,
केकरा कोख से जामल बानी;
केकरा जान के आफत रहीं,
ई खूबे हम जानत बानीं।
ढेरका दुख भोगला के बाद,
मानव योनि में केहू जन्मेला;
धरती पर बालक त,
भूखा, प्यासा जनमे ला।
व्याकुल अकुलाइल माँ तब,
सहजे प्यार छलकावे ले;
छाती साट अपना बच्चा के,
आपन दूध पिलावे ले।
गाल चूम के थाकल आपन,
देह के दरद भुलावे ले;
किलकत अंग देखा-देख,
ऊहो अमृत बरसावे ले।
लेकिन का हमरा के अपना कबहुँ गोदी में तू लेलू ?
दूध के घूँट पहिलको,
का हमरा के देलू ?
बिना आह आलम के उल्टे,
नदी धार के बीचे छोड़लू,
ईज्जत के बड़ कोठी में तुरंते तुहू घुसलू ।
बचलीं हम त जनिह देवी,
अपना जिनगी के बल पर;
छोड़ले रहू का तनिको,
कवनो भी कोर कसर।
सजगे जिनगी के बदले,
मार देले रहू तू ततले ।
पत्थर अस भइल रहे,
बोलऽ करेजा जब तोहरो;
किस्मत एगो माई के,
भेजले रहे तब दोसरो।
बस खतमे जनिह,
जान के खोल तनिका में,
दाँव पर लागल बा,
बस जिनगी तनिका में।
आँचल में प्यार छलकावत,
अब का आइल बाड़ू;
मरघट में खोजते कवनो,
खजाना बड़ आइल बाडू ।
जवना के भुलवइले बाडू,
ऊ दुनिया नाहिं तू पइबू;
राधा जइसन माँ के ओहदा,
ना कबहूँ तू पइबू ।
राधा के हक मारे खातिर,
अब इहँवा तू आइल बाडू;
बाकिर का कबहुँ मन में,
ईहो बात का लवले बाडू ?
ऊ हई माई सेवा के,
तू यश, मान अपनवले बाडू;
ऊ एक नारी अइसन,
तू खाली ठकुरानी बाडू ।
कोख से काढ़ फेकलू तू जब,
हिरदा से साट सहारा देली ऊहो तब।
अवते हमरा तू, डरे निष्ठुर भइलू,
ना तनिका उमड़ल प्यार देखलवलू।
ओने राधा जवने दिन हमरा के पवले रही,
पवते उनकर छाती में दूध उमड़ल रहे।
तू ना हमरा के बेटा जनलू,
चाहे जनमइलू फिर राधा भी;
राधा त पाके जमला अस,
आपन तन अस पलली फिर भी।
बोलऽ कइसे अब हम,
आपन आत्मा के मारीं;
राधा के छोड़ कइसे,
तोहरा के कहीं मातारी।
दम नइखे तोहरा मे देवी,
कोशिश के बादो हमरा पइबू;
लौट के कुल में मिल जायीं,
अब ई ना कबहू पइबू ।
संउसे जिनगी हमार,
कुलहीन कहावत बीतल;
का मिली ओह वंश में,
आज जइला पर, जे बितल
मानत बानी संउसे जिनगी,
बडुवे कलंक से भरल;
हमरा भीरी अबहूँ,
नइखे नया कुछ पड़ल।
दुख से कथा जे,
हमरा के तुहूँ सुनवलू;
केशव के मुँहे सुनले रहीं,
ऊ हे आज सुनवलू।
मालूम ना अचके में
तोहरा लोग के का मिलल बा;
ना मालूम काहे हमरा पर,
अतना प्यार उमड़ल बा।
आज तक का केहू
प्यार से खोजले रहे ?
बड़ा किस्मत बा आज प्यार,
तोहरा में जागल हवे।
कवन चाल बा एह में;
खूबे बूझत बानी;
बे मौसम एह प्यार के उपजल,
खूबे जानत बानी।
बिछुड़ल भाई गोतिया से,
मेल करावे ना आइल बाडू;
दुर्योधन से फूट करावे,
अबे तू आइल बाडू।
आज युद्ध के बदरी जब,
माथ मंडराइल बा;
संग्राम के फल सोचते,
तोहरो माथा चकराइल बा।
अपना गोदी में अँकवारी,
बान्हे ना आइल बाडू;
कुरुपति कुछ खोवस,
कमजोर करे आइल बाडू।
काहे ना पहिले प्रेम के,
उमड़ल धार बहवले रहू ?
काहे बाँह बढ़ा ना के,
हमरा पंजरा में आइल रहू ?
पहिले काहे हमरा के,
आशिष देबे ना आइल रहू ?
केशव के कान्हे तोप रख,
अर्जुन निरभय बनल बाड़न;
बड़ का किस्मत वाला,
आज ऊ बनल बाड़न।
अर्जुन के बाप मांग के,
कवच-कुण्डल ले गइलन;
उनकर बैरी के बल भोथर करे,
देवी, तोहरो चरण रोपइलन।
लेकिन जा देवी,
जे चहलू ऊ ना होइहे कबहूँ;
जाके उनकर किस्मत गोहराव,
आपन सुत जे बाड़े अबहूँ।
केशव भले छोड्स अर्जुन के,
हम ना छोड़ सकी दुर्योधन के।
हमरा रोवाँ रोवाँ पर कुरुपति के करजा बा,
ना बडुवे आसान उतारल जे करजा बा।
भला छल करब जब उनका से,
कइसन अपयश होइहें;
जान दे ना सकब उनका खातिर,
कइसे में चुकता होइहें।
धरमे के ऊपर आज,
नेछावर भइल बानी;
जनिहऽ दुर्योधन अस देवता पर,
प्रसाद चढ़ावल बानी।
देवता पर जे फूल चढ़ल बा,
ओकरा के ललचावऽ मत;
पूजा के बेदी से खींचे फूल,
तनिको हाथ बढ़ावऽ मत।
दुख आपन कह कुन्ती से,
राधा सुत गुम-सूम लगवले;
आंसू अँखियन से झरना अस,
आज ऊहो ढरकवलें।
बे मतलब कुन्ती के जीभ,
मुँह में लट-पट करे लागल;
का कहस बात कर्ण से कवनो,
ऊ शब्द ना मिल पावल।
गगन के झोंटा में,
मोती के माल गूथ गइले;
काजल के कजरवटा उलटल,
ओही में सारा नभ नेहा गइले।
अनगिनत तरइन अस लगले में,
अम्बर के चुनरी टँक गइले;
अंधकार अंचरा खोलले,
रात के बिछल सेज पसर गइले।
गूंग भइल संउसे दुनिया,
बहिरा होगइलन सब ओरिया;
चुप्पी साध लेलख सबके सब,
गाँछी पर के बइठल चिड़िया।
बाकिर झींगुर जब-तब,
आपन बोल सुनावत रहे;
पानी में जब-तब मछली के,
छप-छप आवाज आवत रहे।
अइसन सुनसान घड़ी में,
नदी तीर दुनों लोग बस खाड़ रहन;
पत्थर अस पथराइल मुँह सिअले,
भाग्य भरोसे खाड़ रहन।
सिसकत मन में रहन कर्ण,
जब ऊहो सब सोचत रहलन;
बेअवसर खीसी में आके,
काहे बोली में कडुवा जहर भरलन।
कुन्ती के कठेआ अब मरलख,
कुछवो सोंच ना पावत रही;
लाज आउर चिन्ता से दुखित,
कुन्ती अब बस मरत रही।
मन में भाव बटोरले कुन्ती,
आखिर में ऊ कहली;
कवनो चढ़ल बेदीके,
फूल ना लेबे अइलीं।
ना दोसरा के संपति खातिर,
ना दोसरा के फुलवे ख़ातिरः
खोजत हम आइल रहीं,
बस आपन बेटा के खातिर।
गोइल बुझाय कि अब,
ऊ ना हमरा के मिली;
झड़ल डाल के फूल जवन,
फिर ना डाली पर खिली।
जात अब हम बानी,
का कुछ कर सकते बानी;
कवनो जबाब ना बडुवे,
जे आज दे सकत बानी।
जे भूल भंयकर जिनगी में कइलीं,
कइसे कवन बात से ओकरा धोवब;
असहीं पड़ल रहब लागत बा
अब चुपके सुसकत रोवत।
लगन लगा के बड़का इहँवा,
हमहूं आइल रहीं।
रहे भरोसा एके कि,
तू बड़ का दानी हवऽ;
दया भंडारी, दुख दूर
करे वाला तू हवऽ।
जनले रहीं बडुवे तोहरा में,
दानी के अद्भुत यश भारी;
केहू ना लौटे दरवाजा से,
तोहरा कबहुँवो खाली।
अंचरा फलवली लेकिन,
फूटल करम हमरो बा;
खाली हाथे लौटत बानी,
बेटा से ना भीख मिलल बा।
जियत रहऽ तू बबुआ,
यश तोहरो ना कबहुँ घटे;
कवनो दिन ई दुनिया,
तोहरा के हमरे बेटा कह रटे।
अबहू तनिका आव बेटा,
अँकवारी में बान्हीं बेटा;
जाये के आखिरी बेला में,
तोहरा के चूमीं बेटा।
कहते कहत जसहीं कुन्ती,
बेटा के गलबाहीं धइली,
गद्-गद् होते कर्ण के देख,
रोमांचित देहिया से भइली।
लागल कवनो संजीवनी बूटी,
देहिया के ही छुवलख ;
दिल भइल मुलायम कर्ण के,
झरना अस झरे लगलख ।
जइसे अषाढ बरसते,
धरती जाये जल से भींगत;
कर्ण रहले कुछ देरी तक,
अंसुवन से ओसहीं भींगत।
गलबांही छोड़ के कर्ण,
पांव पकड़ के बोललन;
धन्य आज हो गइली,
बिछुडल गोद पाकर बोललन।
अफसोस ई अधिकार,
ठीक समय ना दिहलू;
हे माता, बड़ा देर कर,
हमरा पास में अइलू ।
एही से अबहीं अंचरा के,
हम थाती लेबे ना सकब;
लेकिन खाली-खाली भी,
तोहरा के जाते ना देखब ।
जे मंगलस जवन चीज,
उनका के पुरहर देनी;
जाये अब कइसे देब कहत,
की खाली हाथ कुछवो ना पवलीं ।
पाँव पड़त बानी हे माता,
अबहू त हठ के छोड़ी;
बन निष्ठुर हमरा से,
हमरे के मांगल छोड़ी ।
दुर्योधन त रण के खाली,
धूहा बस बाड़े;
साँचे असल लड़ाई,
कर्ण-अर्जुन के बीचे बाड़े।
गोद में धर एह अवसर के,
मत हमरा के तुहूँ छीनऽ;
यश, मुकुट, मान, कुल, जाति, प्रतिष्ठा दे,
मत हमरा के अबहीं छीनऽ ।
जब लड़ले अर्जुन से छोड़व,
तब कइसे यश के पाइब;
अपने आप के पता नइखे,
फिर कवन जबाब दे पाइब।
हमरो सुभाव का बड्वे,
कइसे के हु समझी;
सउसे जिनगी तब त,
उल्टा पुलटा हो जाई बूझी।
दान-दान बस रटत बाड,
काहे खातिर हे माई,
का बेटा ही खाली दीही,
दुनिया के, बोलऽ हे माई ।
दुनिया त हरदम खाली,
पुत्रन से पावल चाहे ला;
लेकिन का माता से,
कुछ ना मांग मिलेला।
एही से बस एक कर्ण,
तोहरा से माँगत बानी;
बदला में तोहरा पासे,
चार कर्ण के छोड़त बानी ।
अर्जुन के जान हम,
कबहू ना छोड़ब;
आपन कइल पुरान प्रण,
ना कबहूँ हम तोड़ब।
लेकिन एक छोड़ बाकी पांडव पर,
दया दिखलाइब हमहू;
कहीं भेंटइलन ऊहो सब त,
उनहन के जान ना लिहब हमहूँ।
मन में खूब खुश होके,
माता सोचते अब चल जा;
कहलीं जे हम पालब रण में,
अब तू चल जा, चल जा।
रोक ना पावे सकली कुन्ती,
कहली, हठी कर्ण का देलऽ;
अपना के रख सब ले लिहलऽ,
बाँचल, का जे देलऽ ।
पाँच के माता के बदला में,
छव के बने आइल रहीं;
विधि बाम रहलन छोटहीं से,
अबहूँ तक ना भइल सही।
पहिल मिललका जाते नइखे,
बाकी से एक मारल जइहें;
चार लाल के रह जाइब माई,
जब ना इहो साथे जइहें।
चार-छव के गिनती छोड़ ऽ,
कहलन कर्ण सुना के;
खुश हो खऽ हे माता,
बोललन ठानल बात सुना के।
मारत-मरत केहू जीतस,
कुरूक्षेत्र के एह समर में:
माँ तोहरे त होई,
आखिर जीत समर में।
कट मर के केहू भी,
चाहे रण में बचिहें;
पांडव गोल में तबहू,
पाँच के पाँचे रहिहें।
कहीं हार भइल दुर्योधन के,
छीड़ ल एह रण में;
भा कसहूँ पार्थ हाथ से,
मारल गोइलीं एहु रण में।
अतनो पर गोद तोहार त,
भरले के भरले रही;
तोहरा पास में हरदम,
लाल पाँच के पाँचे रही।
कहीं काल सनक के
अर्जुन के माथ पर चढलें;
उनकर जान ना बाँचल,
जीत के गोटी दुर्योधन में पड़लें।
तब हम एगो नयका खेल,
दिखलाइब आगे जग के;
जीतला बाद पास आइब तोहरा,
हमहूँ छोड़ दुर्योधन के।
दुनिया में चाहे जे गरीब,
गोइल सतावल हो इहें;
जे धनहीन, हीन अंग
रोजे गाली खाते होइहें।
ओकरे से यारी करिहें कर्ण,
ओही भाई के साथे रहिहें;
ब्रह्मा तक सोझा आवस उल्टा,
उनको से ई लड़ि हें।
नइखे झूठ तनिका,
राज-सुख पांडवन के ना मिलल;
पर कवन दुख बा उनका,
साथ केशव के रहते ना बुझल।
केशव से बढ़ हमहूँ,
भलाई कर सकब;
कवन दुख वा जवना के,
दोसर ना केहू, खाली हमहीं हरब।
एक बात यदि समर में,
पांडवन के चल ना पाई तनिको;
कवनो कारण से ऊ सब,
भइलन उदास जीवन में तनिको।
मानी माता, तब राधा सुत,
कुरुपति के साथ ना रहिहें;
ओही गरीब कुचलाइल,
पांडवन के साथे रहिहें।
अबहीं पांडव चढ़ती पर बाड़े,
नीमन संयोग दिखत बा;
चारों ओर पाण्डु सुत सब के,
यश के झंडा फहरत बा।
जब घोर अन्हरिया छाई,
भा हमरो किस्मत हरिआई;
हम अपने आ जाइब,
जब रात तिमिर गहराई।
यश, मान, प्रतिष्ठा, मुकुट,
हम लेबे ना आइब;
आइब त वंश के खाली,
डर भगावे खातिर आइब ।
भाई सब के दुख में
बाँह लगावे आइब;
हार के आग के हरे,
संदेह मिटावे आइब ।
माँ, हम घोर आफत में,
भाई लोग के साट के रहब;
कलेजा से साट के अपना,
दुख बाँट के हमहूँ रहब।
ओह लोगन के देह में,
नया जोश भरे हम आइब;
किस्मत पलटे खातिर,
घाव भरे हम आइब।
लेकिन जहवाँ पर,
केशव के छाया बड़ले बा;
माधव के बाँह जहाँ
रक्षा में बस फैलल बा।
तब ओह भाग्यशाली के,
करम कइसे फुटिहें;
अन्हरिया ओकरा आगे में,
फिर कइसे पास में छइहें।
कुरुक्षेत्र के समर भूमि,
हमरा सोझे अब लउकत बा;
यम नाच रहल बा लोगन पर,
ऊहे अब सोझे लउकत बा।
खून से भींजल बा.
लथ-पथ संउसे धरती बा;
केवल बे रोक-टोक,
अर्जुन के रथ दउड़त बा।
अन्धकार के बन्धन त,
केवल केशव काटत बाड़न;
अर्जुन बचल रहस सोजहगे,
युद्ध के हवा उलटल बाड़न।
दुश्मन त बेमतलब बाण के,
जाल बिछावत बाड़न;
काट जाल, घेरा के तोड़ते,
बार-बार निकलत बाड़न।
माई, का होइहें बिहने,
ईहो सोझे लउकत बा;
का होई फलाफल युद्ध के,
ईहो सब लउकत बा।
बाकिर अतनो पर,
मन तनिको घबड़ाते नइखे;
साहस दुगुना बढ़ते जाता,
तनिको सा घटते नइखे।
काल के बज उठल नगाड़ा बा,
बेरा बड़ा डरवावन बा;
सर्व नाश खातिर यमराज के,
नेवता सबके बँटल बा।
कतनो बड़का होइहें शेर,
उनकर छाती के बाती टूटिहें;
बाण उगलत आग के लपट,
ऊपर से नीचे हो उल्टा गीरिहें।
कुछुवो बाँच ना पायी,
अन्त काल तक लड़ के;
जीतलो पर कइसन संतोष,
जब कुछ ना रही शेष पावे के।
युद्ध के राह पर जवने,
गत कौरव के होई;
ओह से तनिको ना भिन्न,
सब पांडव के होई।
एके बडुवे बस राह,
चाहे केहू जीते भा हारे;
चाहे अपने मरस भा,
दुश्मन के रण में मारे।
मरला पर दुनों के,
एके नगरी जाये के पड़ी;
जान बँचा के भागे खातिर,
कवनो बहाना बन ना पड़ी।
बैर कइल खाली,
बाँचल, फेंकल आँठी, रण ह;
बेमतलब के हमरो भा,
अर्जुन के प्राण लिहल ह।
तब हूँ दो काहे दो
केहू रूकते नइखे;
जनिह आइल चाहत बा काल,
बढ़ल आवत बा, मानत नइखे।
बाकिर एह झूठ-मुठ के,
जंजाल में पड़ के नइखे;
कि कसहूँ युद्ध के रोकल जाय,
कल सुबह रूके के नइखे।
केनहू के सेना के बादल,
अबहुवो तक फाटल नइखे;
अमावस के पहिले के,
रात अंधेरा घटल नइखे।
चाँद-सूरज घोर अन्हरिया में,
कहीं लुका के बइठल रहस;
किरण के अंजोर खोजे में,
जब लोगवा अकुलाइल रहस।
तब पुच्छल तारा केनहुँ से,
आसमान पर निकले ला;
मरघट में आपन ऊहो,
सगरो अंजोर फैलावेला।
पकड़त पाँव कुन्ती के,
राधा सुत कंठ ना खुलल;
नयनन से आँसू के,
दू बून्द पाँव पर गीरल।
दुखित मन से कुन्ती,
बेटा के माथा चुमली;
उनको मुँह ना खुलल,
चुपचाप लौट घर गइली।


