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देश बढ़ती के रोकलख

देश बढ़ती के रोकलख

कवन-कवन रोड़ा अटकवले बा रहिआ में,
धाका दे के देशवा के पिछवा ढकेले ला।

वंशवा बढ़ा के, बेटा-बेटी के जमात करे,
इहे नाही सब कुछ होला, देखी आउर का का होला।

तड़-तड़ रहिआ में गोलिआ से भूजे जेही,
दुबकल घरवा में सांझ से बिहान होला।

रोजी- रोजगार, खेती- बारी ओ ना होखे देला,
हमरे साथे देशवा के किस्मत भी फोरेला ।

बजट के रोपेआ के बंदरबाट करे उहो,
बालू के बांध, बीच नदिआ में बान्हें उहो ।

बने ला चालाक अपने, शेष के गँवार जाने,
लूटवे के माल से त ओकरो दीवाल बने।

खाकी वाला ओसही बा, टोपी वाला ओसही बा,
ठेहुना से नीचे ओकर, कुर्त्ता के किनारे बने।

माई बेटी, बहिना के इज्जत ना जाने उहो।
पानिये में पानी, खींच रहिआ में डाले उहो ।

रोज अपहरण करे, लइका बुढ़वो के चोरी करे,
छोड़े खातिर दामबाके, भेजे धमक चिट्ठी उहो,
बाबा देलन छोटहीं में, शादी आपन गुड़िया के,
उहवा दहेज खातिर, सेजिओ पर काँटा गड़े।

पानी ना नहाये के देला, तेल टीन भर के राखे,
गुड़िया के जार-खोर, स्टोव फाटे के काथा गढ़े।

पोथिओ ना छुए देला, सानी-पानी के कहे करे,
मंचवा से वालश्रम भाषण पीआवे ला।

जंगल के काटे उहो, जंगली के काटे ला,
उँचा बांध बान्हीं, बीच बांध में डूबावे ला।

गछवा से चिपकी त खंजर घुसावेला, हमरे साथे मेहरी पर बरछा चलावे ला।

धरती पर गोड़ ना धरे, मोटरे में घूमेला,
दम घोटू धुंआ, दोसरा के नाकवा पो छोड़ेला।

दुषित करे हवा, पर्यावरण के बिगाड़े ला,
लागेला कि ओकरा मारे, बरसा भी भागेला।

चीकन-चीकन सड़क के सपना देखावेला,
गड़हा बना के राखे, हिचकोलवा से मुफ्ते प्रसव करावे ला।
संतुलित आहार के गोहार, झूठे करे ला।

इहाँ त कुपोषणों से, धून देही लागेला।

आटा-चावल, दाल-दूध, अंडा, पालक गजरा बतावेला,
ठनठन गोपाल ठठपाल के त माथा चकरिआवेला।

कंठ में घुसावे उहो सुचना टेकनालउजी के,
बाकी कंठवा झुराइल राखे, राजस्थानी भइया-भौजी के।

माल मिलावट के राखेला, का लोगन के ठगी ना ?
काकरी सूचना तकनिकी का लोगन के ठगी ना ?
केहू के कुत्ता दूध पीयेला, केहू रसगुल्ला छील के खाला,
केहू नाली के छानल खाला,
केहू जाँत, आंत के सुतभी जाला, मखमल पर केहू पाँव रखेला,
केहू कांटवे पर हरदम पाँव राखेला, एयरकंडीशन में केहू होला,
केहू के जेठ के धूप, सावन के झड़ी झोपड़ी में होला।

धन जे उपजायी, कम ही पायी, केहुके कोठी सुखले भर जाई,
केहू ठठपाल, केहू भूपाल, कइसन बेल बटवारा ए भाई।

इ ना रूकी बेमेल बँटवारा,
त देश का आगे जाई ?
देश बढ़ती रूकल रही,
नाहीं त पीछे हीं ढकेलाई।

पढ़, लिख पर मिली ना काम,
बाबु, भैया के छंटनी होई, इन्टरनेट के खेला देख,
केकर हाथ ना काटल जाई।

डाउन साइजिंग रोजे होई, डिसइनभेस्टमेंट रोजे होई,
का होई करोड़ नौकरी के वादा के, जब रोज बेकारी बढ़ते जाई

डंकल-अंकल चुपके घुसलन,
विश्व बाजार के बात अब आइल, सुरत के सूरत बिगड़ेला,
सूति के बदला में जींस भर जाई
बाल्को बेचाइल, दुअरा-दालान वेचाई,
खेती भी पट्टा पर जाई, मत बोलऽ पूंजी विनिवेश जे होता,
का दो एक दिन इहे दीही मलाई।

डेढ़ के बदले, साढ़े आठ के भाव, दाभोल के बिजली यहाँ बिचाई, इनरोन के गिरवी में बंबई के साथे देशवा राखल जाई।

तेरह दिन के पहिला ठीका, ई ना कभी भुलाई, एनरोन दिवाला भले होखस, हमार दिवाला अभी ना होई।

यू. टी. आई अइसन ही,
आई. डी. बी. आई का आपन माथा का ठेठाई, निजीकरण के ह इहे नमूना, चेतल रहिह ए भाई।

नियम के गहना गढ़े वाला, भले ना गपचे, पूँजीवाला पूरा गपची हे भाई।

अब त हाई-ब्रीड के बीआ आइल, सालो-साल पलटाइल;
जमते खाद, जड़ से फुनगी पर, रोजे जहर छीटकाइल।

पैदा कइनी फिर भी, हल्दी नीम, बबूल, ब्रासमतिओ झपटाइल;
पेटेंट कह के दाम वसुलिहे, हमरो मति भोथराइल।

शातीर अपराधी कन्धार तक,
मेहमाने अस ढोवाइल; भारी भूल भइल ढोलवा के,
कहला से बात गइल अझुराइल।

मतिभ्रम भइल राजनीति के
अइसन, देशबढ़ती न हो पाइल; भइल पड़ोसी राजनीति के अइसन, देशबढ़ती ना हो पाइल;
भइल पड़ोसी से झगड़ा के खतरा, ढीवरी के तेलवा मँहगाइल।

पंचायत से संसद तक,
सब बड़का तोंद बडुए बटोराइल;
मुख अइसन जब बनल ना मुखिया, जनता बा छपटाइल।

प्रतिभा पलायन होते रही, चाँद पर जाये खातिर मन रही तरसाइल;
राजनीति के चक्कर में पेरब प्रतिभा, तव रस मधुर ना लागी, चाहे जीभ गृहे पुनी अइल,
खूब पहचनली,
देश बढ़ती रोकलख।

खूब पहचेनली देश बढती के रोकलख,
अब आउर ना रोके पाई,
अब हर बाधा के दूर हटाके, देश के आगे तक ले जाई।

रचनाकार डॉ कृष्ण दयाल सिंह
(उक्त कविता डॉ कृष्ण दयाल सिंह रचित नाटक और कविता संग्रह यथावत से ली गई है,लेखक वर्तमान में आरा के वरिष्ठपुरी में निवास करते है,संपर्क:9570805395)

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