दलित दुलीना के (झज्जर)
शर्मा जी की गाय
दरवाजे पर खड़ी मरी,
सुखने लगा,
स्वादिष्ट दूध का,
गुलाबी होठ ।
समाया डर,
सडांध के बदबू का,
दलित के ठेला पर,
चढ़ाया वही गाय,
फिर भी समझा उन्हें पूरा छोट ।
गाय मेरी माता,
पर कफन नहीं,
दफन नहीं,
अर्पा नहीं, तर्पया नहीं,
घंट नहीं,
सात नहान नहीं,
दरिद्र भोजन नहीं,
रोऔं के देव को मनाया नहीं;
आत्मा रोयी नहीं।
देवता का कोप सिर चढ़ा,
वुद्धि विपरित बढ़ा,
नया षड्यंत्र गढ़ा,
भड़काउ भावना का मंत्र पढ़ा,
मिथ्या दोष दलितों पर दे मढ़ा ।
अफवाहों का अम्बार फैलाया,
मरी को जिन्दा का भ्रम फैलाया,
मरी की चमड़ी के बदले,
पाँच दलितों को स्वाहा चढ़ाया शास्त्रों का शस्त्र संधान किया।
नरो वा कुंजरों भ्रामक था,
कहा, फिर भी ठीक था,
काश न नरो दलित था,
न कुंजरों ही गाय,
तब कुंजरों का मूल्य नरो तुल्य,
आज मरी गाय, पाँच दलित बराबर।
तब का कुरूक्षेत्र भी हरियाणा में, अबका दुलीना भी हरियाणा में,
लड़े होंगे वीर अन्यायों से
लड़ रहे हैं छदमबीर न्याय से,
नफरत नाच रहा है,
इंसानियत के लाशों पर,
राष्ट्र प्रहरी, जागो,
प्रपंचों को पहचानो,
समानता और भाईचारा को
मत मरने दो,
फिर कोई झज्जर मत होने दो।
प्रभु पुत्र, अल्लाह के बन्दे,
रविदास के संतान,
माँ मरियम के लाल,
नानक सुत,
सभी तो एक हीं है,
फिर ये कैसा गबर घीचोर ?


