
RKTV NEWS/आरा ( भोजपुर)13 मई। लेखक डॉ कृष्ण दयाल सिंह रचित कहानी और नाटक संग्रह “अनायास” पर रेल डाक सेवा के कवि हीरा प्रसाद ठाकुर ( दिवंगत) जिन्हें दो बार स्वर्ण पदक सहित कई पुरस्कारों और सम्मानों से नवाजा गया ने लेखक की अनायास रचना पर अपनी टिप्पणी लिखी है।
सिकता की रेत पर
आप जानते हैं कि मनुष्य सिकता की रेत पर कभी जाना नहीं चाहता है किन्तु परिस्थिति वश कभी न कभी वह पहुँच ही जाता है और वही हाल हुआ मेरा भी । कौन जानता है कि उस बलुआही नंग-धडंग तलफत भभरी के ऊपर खिले हुए, उसमें भी रंग-बिरंग के फूल मिलेंगे और देखने को मिला भी मुझे डाक-तार विभाग के साहब डॉ० कृष्ण दयाल सिंह की स्वयंभूत रचनाये जो ‘अनायास’ अनेक तरह की पंखुड़ियों से सजी-धजी बिखेरती हुई सुगंध –
१. गुलसितां यह एक लघु नाटिका होते हुये भी देखन में छोटन लगे, घाव करे बड गोय’ वाली सार्थकता सिद्ध करती है। इसमें लेखकी कमजोरी भी मुझे देखने को मिली। परिस्थिति से समझौता कर लेना अच्छी बात है कि किन्तु कलम से समझौता मैं नहीं कबूल करता। जैसे लेखक के शब्दों में-दवा आती है और डाक्टर की बात मानकर भय से नर्स सभी अनुपलब्ध दवाइयों को उसके ब्रीफकेस में रख देती है। दूसरी तरफ नर्स का कहना-कि बच्चे की क्यों जान लेती हो ? यदि दवा अनुपलब्ध है तो डा० के निजी प्रैक्टिस दवाखाना में चली जाओ। यहाँ लेखक बाध्य हो जाता है अपनी अन्तर्वेदनाओ को कहने के लिये। वह छिपाता नहीं है और सारी सच्चाई अपने पात्र कमला द्वारा कहवा देता है।
सरकारी अस्पताल और निजी चिकित्सा केन्द्र में सलाह के तरीके अलग-अलग होते हैं क्या ?
पुनः कमला द्वारा यह कहना-ठीक दवा। यह क्या ? मुझे तो बीमारी ठीक होने की दवा चाहिये। इस बात पर पाठक भी सहज अनुमान लगा सकते हैं कि ठीक डाक्टर, ठीक दवा, कितनी लाज की बात ! जहाँ जीवन और मौत का सवाल है वहाँ ठीक दवाइयाँ बड़ी ही अनहोनी और खिलवाड़ जैसी लगती है। सेल्समैन यानी पैसेवालों के पास हृदय नहीं होता यह कहकर लेखक ने सराहनीय कार्य किया है।
ठीक ही कहा गया है कि एक भोला-भाला आदमी जितना मदद कर सकता है उतना पढ़ा-लिखा धनी व्यक्ति नहीं कर सकता। तभी तो सूक्ति है-अज्ञः सुखमाराध्यः । सईदा अपने निकाह पर याकूब की दी हुई अंगूठी बन्धक रखकर इस सूक्ति को सार्थक करती है। बेटा चंगा हो जाता है और कमला कह पड़ती है-गरीब का सहारा गरीब ही होता है। धनी तो उससे दूर हटना चाहते हैं यहीं तक नहीं उसकी बात भी नहीं सुनना चाहते। हे प्रभु ! धरती फटने में अब कितनी देर !
२. नेतागिरी-इसमें लेखक का तेवर पहले ही झलकता है। सही नेता वही हो सकता है जो दुर्दिन में साथ दे। लेखक कामना करता है सर्वे भवन्तु सुखिनः की। लेखक का सहज-स्वभाव साफ परिलक्षित होता है। गलतफहमी अनायास घटित हो जाती है जिसको लेखक दफन कर देना ठीक समझता है। यूनियनबाजी करना, दल का नेता बनना, बुरी बात नहीं। यहाँ लेखक सचिव से कहवाता है कि भवन का स्थानान्तरण कर्मचारियों के हित में ठीक नहीं, उसे रद्द कर देना चाहिये। इस शब्द में लेखक ने अपनी कलम से समझौता नहीं किया। कर्मचारियों का भला-बुरा देखना साहबों का कर्त्तव्य होना चाहिये । सचिव बनने से कुछ नहीं होगा विमलेश। सदस्यों की राय के बिना संघ नहीं चल सकता। नेता तो वही हो सकता है जिसे सभी स्वीकार करे। इस पंक्ति में कितनी अहमियत है लेखक की। व्यवस्थापक को भी दक्ष, निपुण, चतुर्मुखी होना चाहिये। इससे कर्मचारीगण खुश रहते हैं। इन सभी भावनाओं को दिखाकर लेखक स्वयं एक व्यावस्थापक होकर भी श्लाधनीय कार्य किया है इस नाटक में ।
३. नव वर्ष (एक संकल्प)- हमने पढ़ा और खूब पढ़ा। श्रुति पढ़ी लिखी लड़की है। वह दुनियाँ के हाव-भाव को अच्छी तरह जानती है। सपनों में कंगूरे बनते हैं, अट्टालिकायें दाब पर लगा दी जाती हैं। पिता और बेटी के व्यंग्यात्मक तथ्य अच्छे तो लगे जरूर किन्तु अफसोस के साथ मुझे लिखना पड़ा कि कहीं-कहीं लेखक अपनी भारतीय संस्कृति को भूलकर पश्चिमी सभ्यता के रंग में डुबकी लगा रहा है जो हमारे समझ से ठीक नहीं है। जैसे पिता के मुख से बेटी के सामने अगर उन्हें चोली के पीछे और चुनरी के नीचे से फुर्सत हो तब न ? नव वर्ष क्या आया गत वर्ष से भी अनैतिकतायें बढ़ती गई, मानसिकतायें कुंठित होती गई। यहाँ लेखक अपनी पहचान बनाने में बिल्कुल सक्षम है।
४. पहिल रोपना-पहिल रोपना एक बोधगम्य शब्द है। इसको पढ़ने से मुझे ऐसा लगा कि लेखक पूरा का पूरा ग्रामीण हो और ग्रामीण परिवेश को तह से पिरोया हो। तभी लखुआ अपनी गरम गाय को-हे हा हा करते-करते कहाँ से कहाँ चला गया। गरीबों का डरना तो जन्मजात संस्कार है उसको डर था कि हमारे मालिक के यहाँ पहिल रोपना है। समय पर पहुँचना चाहिये। लखुआ की पत्नी एक मुठा भूजा, एक मुठ घुघनी एवं महुआ के लिये तरसती है और उसके बच्चे बिहारी को मिलेगा इसके लिये लालाईत है। गरीबी और अमीरी में कितना फर्क है। लेखक सच्चाई से डरता नहीं और कह ही देता है कि अमीरों की बोली में ऐंठन होती है, आदमीयत से दूर रहती है। गरीबी का एक निशाना-बुधिया ने आँचल के खूंट में बांधा उसकी आँखे स्नेह से छलछला गई और दुआयें भरती रहीं और बच्चा बिहारी जुड़ा गया। पहिल रोपना यथार्थ का पूरक है। पंडित जी को मालपूआ और बुधिया को नमक रोटी बेतुकी सी लगती है और समाज को आगे बढ़ाने में पाहन का काम करती है।
अंत में थैला और पैसा की कविता बहुत ही हास्यमय और अच्छी लगी।किसी से किसी का महत्व कम नहीं। लेखक साधुवाद के पात्र हैं। इनकी रचनाओं में बनावटीपन और कसाव नहीं है। भाषा और अलंकार की दृष्टि से मैं नहीं आंक सकता इसलिये कि मैं यथार्थवादी हूँ, अभिधाबादी हूँ, यथार्थ को देखता हूँ और वही गुनता हूँ जिसका मैं स्वयं भुक्तभोगी भी हूँ। अतः इनकी रचना तीव्र तेज पुंज से प्रकाशित करती रहेगी ऐसा मेरा विश्वास है।
हीरा प्रसाद ठाकुर
गोल्ड मेडेल प्राप्त (दो बार)
भोजपुरी काव्यश्री सम्मान प्राप्त
भिखारी ठाकुर पुरस्कार से सम्मानित आर० एम० एस०, आरा, बिहार

