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पढ़ाई बढ़ी… लेकिन स्किल क्यों नहीं बढ़ी?

RKTV NEWS/डॉ. सत्यवान सौरभ,08 मई।आज का समाज एक अजीब विरोधाभास के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ शिक्षा का स्तर पहले से कहीं अधिक ऊँचा दिखाई देता है—हर घर में बच्चे पढ़ रहे हैं, कोचिंग, ऑनलाइन क्लासेस और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे हैं, और परिणामस्वरूप अंक भी लगातार बेहतर हो रहे हैं। लेकिन दूसरी तरफ एक सवाल लगातार सिर उठाता है—क्या सच में हम सीख रहे हैं, या सिर्फ अंकों का संग्रह कर रहे हैं?
यह विडंबना केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की दिशा पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। स्कूल से लेकर कॉलेज तक बच्चों को एक ऐसी दौड़ में शामिल कर दिया गया है, जहाँ लक्ष्य केवल अच्छे अंक लाना, उच्च रैंक हासिल करना और अधिक से अधिक प्रमाणपत्र जुटाना रह गया है। इस पूरी प्रक्रिया में “सीखना” कहीं पीछे छूट गया है। बच्चे यह समझने लगते हैं कि सफलता का मतलब है परीक्षा में सही उत्तर लिख देना, न कि उस ज्ञान को जीवन में लागू कर पाना।
इसी कारण आज हम ऐसे युवाओं को देखते हैं जो कागज पर बेहद सफल हैं, लेकिन वास्तविक जीवन की चुनौतियों के सामने असहज हो जाते हैं। वे जटिल प्रश्न हल कर सकते हैं, लेकिन सरल समस्याओं के व्यावहारिक समाधान में अटक जाते हैं। आत्मविश्वास की कमी, निर्णय लेने में झिझक, और नई परिस्थितियों में खुद को ढालने की कमजोरी—ये सब उस शिक्षा का परिणाम हैं जो “याद करने” पर अधिक और “समझने” पर कम आधारित है।
हमारी शिक्षा प्रणाली लंबे समय से रटने की संस्कृति पर टिकी रही है। बच्चों को यह सिखाया जाता है कि कौन-सा प्रश्न कैसे आएगा और उसका उत्तर किस तरह लिखना है। इस प्रक्रिया में उनकी जिज्ञासा धीरे-धीरे खत्म हो जाती है। वे सवाल पूछने से कतराने लगते हैं, क्योंकि उन्हें डर होता है कि कहीं वे “गलत” न साबित हो जाएँ। रचनात्मकता और स्वतंत्र सोच, जो किसी भी समाज के विकास के लिए जरूरी होती है, इस दबाव में दब जाती है।
जब यही बच्चे उच्च शिक्षा पूरी कर नौकरी की दुनिया में प्रवेश करते हैं, तब वास्तविकता सामने आती है। कंपनियाँ केवल डिग्री नहीं, बल्कि कौशल चाहती हैं—समस्या को समझने की क्षमता, टीम के साथ काम करने का हुनर, संवाद कौशल, और परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने की योग्यता। लेकिन शिक्षा व्यवस्था ने उन्हें इन सबके लिए तैयार ही नहीं किया होता। यही कारण है कि डिग्री बढ़ने के बावजूद रोजगार के अवसरों का लाभ उठाने में युवा पीछे रह जाते हैं। यह केवल बेरोजगारी का नहीं, बल्कि “स्किल गैप” का संकट है।
इस पूरी प्रक्रिया का एक और गंभीर पहलू है—मानसिक दबाव। आज के छात्र पर अपेक्षाओं का बोझ बहुत अधिक है। परिवार, समाज और प्रतिस्पर्धा—तीनों मिलकर उस पर निरंतर दबाव बनाते हैं कि वह हर हाल में अच्छा प्रदर्शन करे। लेकिन जब पढ़ाई का उद्देश्य स्पष्ट नहीं होता, तो यह दबाव धीरे-धीरे तनाव और भ्रम में बदल जाता है। बच्चे यह समझ ही नहीं पाते कि वे जो पढ़ रहे हैं, उसका उनके जीवन से क्या संबंध है।
असल में शिक्षा का उद्देश्य कभी केवल परीक्षा पास करना नहीं था। शिक्षा का अर्थ है व्यक्ति को जीवन के लिए तैयार करना—उसे सोचने, समझने और निर्णय लेने की क्षमता देना। यह उसे केवल जानकारी नहीं, बल्कि उस जानकारी का उपयोग करना सिखाती है। लेकिन जब शिक्षा केवल अंकों तक सीमित हो जाती है, तो वह अपने मूल उद्देश्य से भटक जाती है।
समस्या का समाधान भी इसी समझ में छिपा है। जब तक हम शिक्षा को केवल “परिणाम” के रूप में देखेंगे, तब तक यह समस्या बनी रहेगी। जरूरत है कि हम प्रक्रिया पर ध्यान दें—कैसे बच्चे सीख रहे हैं, क्या वे वास्तव में समझ रहे हैं, क्या वे अपने ज्ञान को लागू कर पा रहे हैं। पाठ्यक्रम को ऐसा बनाया जाना चाहिए जो बच्चों को सोचने और प्रयोग करने के लिए प्रेरित करे। परीक्षा प्रणाली को इस तरह बदला जाना चाहिए कि वह केवल याददाश्त नहीं, बल्कि समझ और अनुप्रयोग को परखे।
शिक्षकों की भूमिका भी इस बदलाव में बेहद महत्वपूर्ण है। उन्हें केवल पाठ पढ़ाने वाले नहीं, बल्कि मार्गदर्शक बनना होगा, जो बच्चों को सवाल पूछने, गलती करने और उससे सीखने के लिए प्रेरित करें। वहीं अभिभावकों को भी अपनी सोच बदलनी होगी। बच्चों की सफलता को केवल अंकों से नहीं, बल्कि उनके कौशल, आत्मविश्वास और समझ से आंकना होगा।
डिजिटल युग ने सीखने के नए रास्ते खोले हैं, लेकिन इनका सही उपयोग तभी संभव है जब हमारे पास सीखने की सही दृष्टि हो। केवल जानकारी तक पहुँच होना पर्याप्त नहीं है, उसे समझना और उपयोग करना ही असली शिक्षा है।
अंततः यही बात सबसे महत्वपूर्ण है कि नंबर यह बताते हैं कि आपने कितना याद किया, लेकिन ज्ञान और कौशल यह बताते हैं कि आप क्या कर सकते हैं। यदि हमारी शिक्षा प्रणाली इस अंतर को समझने में सफल हो जाती है, तो न केवल छात्रों का भविष्य बेहतर होगा, बल्कि समाज भी अधिक सक्षम और जागरूक बनेगा।
आज जरूरत है इस सवाल को गंभीरता से पूछने की—क्या हम सच में शिक्षित हो रहे हैं, या सिर्फ शिक्षित दिखने की कोशिश कर रहे हैं? क्योंकि जब तक इस सवाल का ईमानदार जवाब नहीं मिलेगा, तब तक पढ़ाई बढ़ती रहेगी, लेकिन स्किल नहीं बढ़ेगी।

डॉ. सत्यवान सौरभ

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