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राम-रहीम, मंडल कमंडल के फेरों से ऊपर उठना होगा श्रुति….. : अनायास

RKTV NEWS/आरा ( भोजपुर)07 मई। “अनायास” नाटक एवं कहानी संग्रह की तीसरी रचना है नाटक “नववर्ष एक संकल्प”।इस नाट्य रचना में लेखक ने एक पिता और पुत्री के बीच संवाद के रूप में राजनीतिक और सामाजिक स्थितियों की बीतते वर्ष से नए वर्ष में सुधार की कल्पना और कमियों को दृश्यांकित करने का प्रयास किया है।

नव वर्ष एक संकल्प(नाटक)

पिता-श्रुति बेटी, क्या कर रही हो ?

श्रुति-अभी आयी पिता जी। नया वर्ष तो तहलका मचाते आ धमका पिताजी देखते नहीं, चारों तरफ खुशियां ही खुशियां मनायी जा रही हैं। प्रशांत भैया ने मेरे और सुमन के नाम ये बधाई संदेश पत्र भेजा है।

पिता-चारों तरफ की तो बोली, पर अपनी भी तो कुछ कहो ।

श्रुति-मैंने भी जवाबी कार्ड सुमन के हाथों लेटर बाक्स में डालने को भेज दिया है। मेरा तो नये वर्ष में प्रशिक्षण शुरू होने वाला है। डाक निरीक्षक में प्रोन्नति की सूचना आज ही मिली है, पिताजी ।

पिता-तुम्हारे लोक सेवा आयोग की परीक्षा के परिणाम निकलने में कितनी देर की उम्मीद करें ?

श्रुति-जितनी भी देर हो, तब तक निरीक्षक का प्रशिक्षण पा जाने में हर्ज ही क्या है।

पिता- क्यों नहीं बेटी, दुख के कड़वे घूँटों को पीकर भी चेहरे पर हँसी तो विखेरनी ही पड़ेगी। कहाँ आई. ए. एस. के लिए मंसूरी जाने को सोच रही थी और कहाँ दरभंगा में सिमट गयी ।

बेटी- क्यों पिताजी, अभी भी बीते साल की दुखों को गिनाते ही रहोगे क्या ? मैंने तो आज भोर में एक सुखद सपना देखा है, पिताजी।

पिता- कौन-सा सपना देखा है तुमने ? सपना तो सपना ही होता है न। काश ! कभी सच हो पाता ।

श्रुति- देखा है, बिहार की सड़कें रबर जैसी ही नहीं किसी सिने तारिका के गालों से भी चिकनी एवं मुलायम होनेवाली है।

पिता- हाँ, हाँ जव प्रशिक्षण केन्द्र पहुँचने लगोगी तो वास्तविकता का पता जरूर लग जायेगा। बस एक बात का ख्याल रखना, किसी मिनी बस में बैठकर सफर न करना अन्यथा गाँधी सेतु से सीधे गंगा में प्रवेश मिल जायेगा ।

श्रुति- गंगा, गंगा मैया में ? हमने तो सुना है उसका जल अमृत तुल्य है और अंतिम समय सबको नसीब भी नहीं होता।

पिता – पर, तब वह अमृत तुल्य नहीं होगी पूरे ५०-६० जनो के खून की होगी खून की।

श्रुति- बड़ी बस और मिनी बस में आने-जाने से कुछ अंतर नहीं होता पिताजी, लोग तो कभी रेल में बैठे सफर कर रहे थे और पूरी की पूरी रेलगाड़ी ने ही बदलाघाट में जल समाधि ले ली। इन घटनाओं से क्या निराशावादी बने रहना ठीक होगा। कभी यह भी तो सोचा होता कैसे दुर्घटना से बचाने के लिए हवाई जहाज को धान के खेत में सुरक्षित उतार लिया गया ।

पिता- अपने सपनों के बारे में आगे भी तो कुछ बताओ, क्या-क्या संजो रखी हो ?

श्रुति-और देखा, पूरी शांति का बोलबाला होगा, आकाश में कबूतर छोड़े जायेंगे ।

पिता- देखते रहो जी भर कर सरासर झूठे सपनों को। बीते साल इस माह में क्या होता रहा, बस चारों ओर कर्पयू, दंगा, लूट-मार, अपहरण यही सब कुछ न ….. ? अयोध्या में ६ दिसम्बर ‘९२ को हलफनामों को दफन कर दिया गया और बाद में पूरे देश में मंदिर-मस्जिद वाले क्या खून की होली नहीं खेले । अगर इस तरह जहाँ खून की नदियाँ बहायी गयी, तुम्हें क्या लग रहा है पानी में रूह आफजा उड़ेल दिया गया है।

श्रुति- नहीं पिता जी, दंगे फसाद पर तो काफी पहले ही काबू पा लिया गया है। पंजाब में पाक घुसपैठियों को कब का रोक दिया गया है। अब इसे भी बेशक रोक दिया जायगा ।

पिता- ये शांति प्रयास भले हुए हों, पर समस्याओं का कोई अंत नहीं । क्या जम्मू के शरणार्थियों को अभी भी राहत शिविरों में नहीं रहना पड़ रहा है ?

श्रुति – परन्तु पिताजी, राहत एवं पुनर्वास का प्रबंध देखने पर तो लगता है जैसे उनके सामने मिश्री का पहाड़ रख दिया गया है।

पिता- अरे नहीं तो, वह तो प्रतिभूति घोटाले के चार हजार करोड़ रुपये का पहाड़ रहा होगा, उसी को पार करने के प्रयास में सिर्फ जे.पी. सी. क्या, सभी लगे हुए हैं। सूटकेसी संस्कृति का आविर्भाव भी हो गया है न ।

श्रुति-परन्तु इस मिश्री नुमा आर्थिक विकास के पहाड़ की रखवाली में तो सेवी और अन्वेषण ब्यूरो डंडे लेकर पहले से ही रखवाली कर रहे हैं। इनको पार करना तो जंगल में बाघ के सामने से बचकर निकल जाने जैसा है।

पिता-इन लड्डु पांडे, पेड़ा पांडे की बातों को छोड़ दो। हो सकता है तुमने सेना के जवानों को असम एवं बोडो मे पहरा देते देखा होगा। या नहीं तो हजरतबल की घेराबंदी को ही देखा होगा ।

श्रुति-सेवी एवं अन्वेषण व्यूरो से बचने के पश्चात् कितने छुट भैये मधुमक्खी के समान शेयर रानी को घेरे पंख डुलाते मिल जायेगे, फिर भी प्रेस वाले का रूप बनाकर मैं वहाँ गयी, तो देखते ही रानी बहुत कुपित हुई ।

पिता-कुपित क्यों हुई, क्या श्री देवी जैसी बिकनी पहने झरने में स्नान कर रही थी ?

श्रुति-नहीं पिताजी, वह तो दलाली, घुसखोरी के गाढ़े घोल में डुबकी मार रही थी। उसके डर से में भागी तो जरूर, पर देखा उस तरह के गाढ़े घोल चारों तरफ थे। लगा उस दल-दल में कहीं फँस न जाँऊ । वस मैंने एक लम्बी छलांग लगायी और लगी जनतंत्र को जगाने ।

पिता-क्यों विश्वास करूँ तेरे सपनों पर ? तेन्दुलकर एवं कपिल के शतक के बावजूद भी तो ९२ के क्रिकेट मैच में हार ही तो हाथ लगी ।। अब तो ९३ का हीरो कप सामने है। कहीं तुम्हारी छलांग भी वैसी ही न हो ।। क्यों नहीं शतक का छक्का लगता जो शताब्दी तक बना रहे ।

श्रुति-आपको तो कोई बात सुहाती ही नहीं है पिताजी, कहाँ मने जनतंत्र को जगाने के लिए छलांग लगा दी और कहाँ आप निराशावादी बने हैं। देखते नहीं अभी से सभी खिलाड़ी हीरो कप की तैयारी में लगे हैं। हम हैं, हीरो कप हमारा है।

पिता-तो क्या उसी तैयारी का नतीजा मोइनुलहक स्टेडियम, पटना मे देखने को मिला कि जिम्बाब्वे पटखनी दे गया लंका को?

श्रुति – क्रिकेट के लिए तो और सारे पीच बाकी है। मैं तो जनतंत्र को जगाने के लिए पीच पर डटी हूँ।

पिता-देखा है तुम्हारे जनतंत्र को, बोगस वोट और बक्सा पलट को देखा है फिर भी घोषणा-पत्र बहुत ही लुभावने एवं चिकनी चुपड़ी बातों से भरे हैं।

श्रुति-क्या देखा है ? यहाँ तो उम्मीदवार योग्यता पर जीतते हैं, चुनाव चिह्न भी महत्व वाला हो कोई जरूरी नहीं ? देखा नहीं पटना का कप प्लेट दिल्ली चला गया। पिताजी अब आगे पर्दाफास नहीं करें अन्यथा मुख्य चुनाव आयुक्त के पास रिपोर्ट फैक्स कर रख दूँगी।

पिता-बाप रे ! न, मैं कुछ भी न बोलूँगा। मुझे तो शेषनाग से भय लगता है, बहुत ही बेढंगे राशिवाले हैं।

श्रुति-डरने की कोई बात नहीं, कहिए तो उनकी गीली-मूर्ति आपके पास रख छोहूँ ।

पिता-जो भी चाहे तू रख छोड़ो, पहले शेषनाग अपनी फुफकार कम करें, तब तो ।

श्रुति-राज्यों के मिनी चुनाव ? आनेवाला साल तो, जनतंत्र की भाग्य रेखा खिंचनेवाला है।

पिता-देखना, बीच में धर्म-दंड न रख छोड़ना ।

पिता-पिता जी जरा मदद करें। मैं तो झूठे जनतंत्र के दलदल को हलवा समझकर उसमें डूबने ही वाली हूँ। जरा बाँह पकड़कर ऊपर तो खींचे। यहाँ तो निर्दलीयों का दलदल है।

श्रुति-लोग कहते हैं हलवा-बिरियानी तो हजरतबल में छुपे उग्रवादियों को मिल रही है।

पिता-नहीं पिताजी, उन्हें तो न्यायिक भोजन मिल रहा है, जो न्यूनतम कैलोरी दे सके, जबतक वे आत्म-समर्पण न कर दें।

पिता -फिर किये रहो घेराबंदी, देखना कहीं इतने में होवीन रफेल की नजर न लग जाय। सउदी अरब जैसे काबा में घुस जाने की शक्ति है भी क्या ?

श्रुति-नहीं पिता जी, पवित्र स्थल पर खून -खराबा होना तो उसूलों के खिलाफ है। उन्हें तो घेराबंदी से ही थका कर आत्म समर्पण करा दिया गया है, मात्र ३ दिन ही तो लगे।

पिता-तब तो वह हलवा नहीं रहा होगा बेटी, यू० पी० एस० सी० का प्रश्न पत्र रांची के कड़ाह में रहा होगा। बीते वर्ष के आगे ही तो वह कैसे परीक्षा के पहले ही सरककर परीक्षार्थियों को धन्य-धन्य कर रहा था। तुम भी क्या इसी तरह की परीक्षा में नहाकर ऑफीसर बनना चाहती हो ?

श्रुति-कैसे बन पाँऊगी पिताजी, देख नहीं रहे है मंडल और कमंडल आपस में टकराने पर तुले हैं। उनकी मुद्रा को तो देखिए। समाज को टुकड़े-टुकड़े अब होना ही पड़ेगा। कोई हिन्दुत्व की लकीरें खींच रहा है तो कोई अगड़े-पिछड़े की और कोई पिछड़ों के बीच भी अति पिछड़ों की रेखाखींच रहा है।

पिता-बेटी, अगर इसी तरह आपस में झगड़ा होते रहा तो धमाके के बाद मेमन बंधुओं को कौन पकड़ेगा ?

श्रुति -क्यों संजय दत्त से सुराग नहीं मिल पायेगा क्या ?

पिताअगर उन्हें चोली के पीछे और चुनरी के नीचे से फुर्सत हो तब न।
शायद देखती रहो ।

श्रुति – पिताजी, भागो, भागो, घर छोड़कर बाहर भागो । धरती कंपित हो रही है। भूकंप का झटका लाटूर तक ही नहीं रहेगा। हमलोग उपग्रह से ऊपर भाग चलें ।

पिता-पर तेरा ९३ का उपग्रह तो स्वयं समुद्र में गिरनेवाला है। बेटी तुम्हारा सपना कभी साकार नहीं हो सकता। वास्तविकता को तुम क्यों नहीं समझ पाती हो ? बीते वर्ष में चारों तरफ अनर्थ, अनिश्चितता, महँगाई, बेकारी, अपहरण, घोटाला, महामारी, विषाक्त वातावरण, कितना गिनाऊँ यानी जीना दुर्लभ बना रहा, फिर भी डंकल का डरावना कंकाल सामने खड़ा है।

श्रुति-नहीं पिताजी, मुद्रा स्फिति पर नियंत्रण है, विकास-दर ज्यादा नीचे नहीं है, हड़ताल और तालाबंदी पर अंकुश है, विदेशी मुद्रा का भंडार बढ़ा है और तो और चरवाहा विद्यालयों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी हुई है। हरिजन-आदिवासियों में सांस्कारिक परिवर्तन दिखायी पड़ने लगे हैं, उन्हें नहाया और बाल कटाया जा रहा है। सड़कों के किनारे रैन बसेरा बन गये हैं। प्रधानमंत्री की बातचीत चाँद पर ठहरे सतीश शर्मा से हो रही। पोखरण का परमाणु परीक्षण कर हमारे वैज्ञानिक देश का सम्मान बढ़ा रहे हैं।

पिता-और बिजली आपूर्ति, बाँध मरम्मत, सिंचाई सुविधा, इन सब की दुर्गति को कहना क्यों छोड़ रही हो। काबेरी जल विवाद, बाबा आमटे का अनशन, राजा का राजधानी त्याग, ये सब क्या बता रहें हैं। चित्तौड़गढ़ से मालपा की दूरी हफ्तों तक तय नहीं कर सके और कैलास-मानसरोवर के फंसे तीर्थयात्रियों को पा नहीं पाये । आलू-प्याज के आसमान छूते दाम, सरसों तेल में कटैया के जहर की मिलावट ।

श्रुति-बड़ी-बड़ी उपलब्धियों के बीच इन छोटी-छोटी घटनाओं की कीमत ही कितनी है ?

पिता-क्या पेप्सी कोला भी तुम्हारी उन्हीं बड़ी उपलब्धि में से एक होनेवाली है क्या ?

श्रुति-नहीं अब तो पूंजी निवेश का दरवाजा ही खोल दिया गया है।

पिता – तो फिर स्वदेशी अभियान का क्या होगा ? नमक बनाने का ठेका भी तो विदेशी कम्पनी कारगिल को दे दिया गया है, क्या गाँधी के नमक आन्दोलन को तिलांजलि दे दी गई है।

श्रुति-कैसी उहापोह की स्थिति है। पिताजी, तब क्या हम सब नये वर्ष में परिस्थितियों को बदल नहीं पायेंगे ?

पिता- अवश्य। हमें बीते वर्ष की घटनाओं से सबक लेकर, उनको बदलना पड़ेगा। राम-रहीम, मंडल कमंडल के फेरों से ऊपर उठना होगा। नये साल में भाईचारा, परस्पर सहयोग और एकता को बढ़ाना पड़ेगा। पर्यावरण की सुरक्षा तथा प्रौद्योगिकी का विकास करना होगा । कमजोर तबके को भरोसा दिलाना होगा । शैक्षणिक वातावरण को स्वच्छ बनाना होगा। सांस्कृतिक धरोहरों के होते क्षय को रोकना होगा। राजनीति का अपराधीकरण न होने पाये, इस पर ध्यान रखना होगा। अब्दुल कलाम को सलाम करना होगा। नोवेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन के कल्याणकारी अर्थशास्त्र को अपनाना होगा। हमें एक नया इतिहास रचने का संकल्प लेना होगा तव होगा नया वर्ष मंगलमय ।

डॉ कृष्ण दयाल सिंह
(लेखक वर्तमान में आरा के वरिष्ठपुरी में निवास करते है,संपर्क:9570805395)

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