
अभिमान हनन !
किस जीत की खुशी में, ये किसने बजाया डंका; क्या चरण पादुका से जीते, या जीती गयी थी लंका।
यह जीत कैसी, जब कोई साक्षी ही नहीं रहा; जीते हैं स्वर्ग नगरी को, बस हैं आप ही ने कहा।
यह तो युग-धर्म की नीति है, कोई लाचारी की नहीं; अत्याचार को ही मारो, अत्याचारी को नहीं।
लड़ाई नारी हर्त्ता से हुई थी, निकाली नारी की गयी थी; ऐसी जीत की खुशी में, कभी क्या यज्ञाग्नि भी जली थी।
आश्रम की नारी के लाल, कोई पालनों में न खेले थे; जंगल की गुफाओं में वो शेरों से ही खेले थे।
बाँध लिया घोड़ा को, मिलकर वहाँ दो भाई ने; घोड़े के प्रहरी बढ़ न सके, आगे शक्ति दो भाई के ।
अवधपुरी की सेना उमड़ी, हत प्रभ भुजा सबों की थी; बालक से हारे वीर सभी, आगे का भय सबों में था।
अनर्थ की आशंका से, सीता मर रही थी; दो बालकों के बाणों से,अभिमान मर रहा था।
लपककर लालों को रोकने, माँ का पदार्पण हुआ था; हैं पिता, वत्स, कह, सिन्दूर बीच में आयी थी।
इस तरह समर में, बाद सबको छोड़ा गया; छोड़े थे जो जीत जताने, साथ में घोड़ा गया।
जीत का यहाँ अभिमान ही गया, अभिमानी का दिल बदला, लड़ाई वह कैसी, अत्याचार गया, अत्याचारी नहीं बदला।

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की पैंतीसवीं रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)
