
भोपाल/मध्यप्रदेश ( मनोज कुमार प्रसाद)16 अप्रैल।“भारत-ऑस्ट्रेलिया साहित्य सेतु थिएटर ऑन डिमांड” के तत्वावधान में हिंदी के पुरोधा, साहित्य रत्न, कवि सम्राट, पंडित अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध जी के जन्म दिवस पर चतुर्थ आन लाइन अंतर्राष्ट्रीय साहित्य विमर्श एवं कवि सम्मेलन का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम के अध्यक्ष आदरणीय भगवान सिंह , उपाध्यक्ष डॉ रामसनेही लाल शर्मा यायावर रहे।
कार्यक्रम में “हरिऔध जी के परिवार से पौत्री आशा शर्मा, अनिल कुमार शर्मा एवं प्रपौत्री अपर्णा वत्स संयोजक के रूप में मंच पर उपस्थित रहे। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आचार्य संजीव वर्मा सलिल, मुख्य वक्ता विवेक अग्रवाल के साथ ही सुचर्चित साहित्यकार सुरेश पटवा ने भी अपने उद्बोधनों में अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध के साहित्य पर अपने विचार प्रस्तुत किए। संचालन अपर्णा वत्स ने किया। भगवान सिंह ने कहा, कि सृजन में आम जनता की भाषा का प्रयोग करना चाहिए। डॉक्टर रामसनेही लाल शर्मा यायावर ने कहा कि मुक्तक के जनक हरिऔध जी ही हैं। उन्होंने चौपदे भी लिखे हैं। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आचार्य संजीव वर्मा सलिल ने “हरिऔध” का तात्पर्य समझाते हुए कहा कि “अवध के विष्णु श्री राम” आचार्य जी ने कहा ,आज के साहित्यकार जो साहित्य रच रहे हैं, विचार करें, कि वह आगे की पीढ़ी के लिए उपयोगी है या नहीं। मुख्य वक्ता विवेक अग्रवाल ने कहा, हरिऔध की रचनाएंँ अप्रतिम हैं। उनके शब्दों का चयन भी बेजोड़ रहता था।विशिष्ट अतिथि रामकिशोर उपाध्याय ने कहा कि पंडित जी की साहित्यिक मशाल को उनका परिवार आगे बढ़ा रहा है। यह प्रशंसनीय है। उन्होंने हरिऔध जी की कालजयी कविता “एक बूंँद” का वाचन किया। कार्यक्रम की विशिष्ट अतिथि हिमांशु राय एच रावल ने इस कार्यक्रम को पूजन समारोह की संज्ञा दी। आयोजन सहायक पवन सेठी, अंगिरा (प्रपोत्री ) ईशाना वत्स रहीं। सेठी ने कहा,कि हरिऔध ने “प्रिय प्रवास”में राधा और श्रीकृष्ण के अलग ही रूप को दिखाने की कोशिश की है।उन्होंने “ज्योति कलश” रचना भी पढ़ी।सारस्वत अतिथि डॉ संगीता भारद्वाज “मैत्री” ने कहा कि पूरा वत्स परिवार अपने पूर्वजों की अनमोल साहित्यिक विरासत को न सिर्फ संँभाल रहा है, बल्कि पूरी लगन और निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रहा है। उन्होंने नव संवत्सर पर अपने दोहे प्रस्तुत किये। सुरेश पटवा ने कहा “प्रिय प्रवास” सिर्फ काव्य नहीं, एक अनुभूति है, जो हिंदी जगत के लिए बहुत बड़ी देन है।
वरिष्ठ साहित्यकार गोकुल सोनी जी ने देशभक्ति पर अपनी सुंदर कविता~ “वक्त आ गया निकलो घर से, लेकर आज तिरंगा।” पढ़ी। कवि प्रदीप श्रीवास्तव ने~ “हिंदी माथे की बिंदी, हम अपना फर्ज निभाते हैं। पढ़ा। विनय विक्रम ने “मन भ्रमर की मंजरी तुम। तार सप्तक गा रहा हूंँ” पढ़ा। मेलबॉर्न से जुड़े सुभाष ने कहा कि आज एक योद्धा का जन्मदिन है। उन्होंने पढ़ा “इंग्लिश आई शहर में होकर आज सवार।”
डॉ अलका अग्रवाल ने हरिऔध जी की पंक्तियांँ “नहीं बदलने देंगे हम, हरियाली को पतझड़ में ” प्रस्तुत की। कुसुम जी की पंक्तियांँ थीं, “देवनागरी लिपि है जिसकी।
उस हिंदी का है अभिनंदन।” नीलिमा रंजन ने हरिऔध की ही हिंदी भाषा शीर्षक से “पड़ने लगती पीयूष की सिर पर धारा।”
पंक्तियां पढीं।” मनोज गुप्ता ने अमावस की काली रात पर अपनी सुंदर पंक्तियांँ प्रस्तुत कीं “मैंने तुमको तम से प्रति क्षण दूर रखा।” सोनम झा ने हरिऔध जी को स्मरण करते हुए अपनी पंक्तियांँ “एक तिनका बहुत है तेरे लिए” पढ़ी। कवि वी के श्रीवास्तव ने कहा कि “हरिऔध जी का हर सृजन, हर रचना सर्वश्रेष्ठ है।” पुरुषोत्तम तिवारी साहित्यार्थी ने गीत “देह में है प्राण जब तक, द्वंद से लड़ता रहूंँगा” पढ़ा। जाने माने कवि कुंँवर बेचैन की बेटी भावना कुँअर जी ने अपनी प्रस्तुति दी,”अपने दिल से प्यार का पैगाम ही भेजा गया” एवं बेटे प्रगीत कुंँअर ने स्वरबद्ध अपनी पंक्तियांँ “न जाने क्या हुआ चेहरे में हर दिन। बदलता ही रहा शीशे में हर दिन” पढ़ा। नीलम भटनागर जी का कथन था कि “हिंदी हमारी पहचान है, हमारी आन बान शान है।” सरला वर्मा की पंक्तियांँ थी, “जो चक्षु चर्म न देख सके, वह कर्म तुम्हें दिखलाते हैं।” सुमन जैन जी ने अनेकता में एकता पर अपनी कविता प्रस्तुत की, “मैं तो मन की स्याही हूंँ।”
अंत में श्रीमती अंगिरा जो हरिऔध जी की बड़ी प्रपौत्री हैं ने, सभी का आभार व्यक्त किया। इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन में भोपाल, भारत एवं कई देशों से पैंतीस से अधिक रचनाकारों ने अपनी भावमयी प्रस्तुतियों के माध्यम से हरिऔध जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व का स्मरण किया। तथा पैंसठ से अधिक साहित्यकार पटल से जुड़े रहे।
