
चिर-निंद्रा!
सोते जागते जहाँ कहीं, प्रिये तुम्हें पाता था, सदा संग तुमको तो, अपने ही पाता था।
तुफानों के झंझावात में, तेरी बाँहों को पाता था,हर अंधेरी राहों में बस, जगमग प्रकाश तेरा पाता था ।
हर सुख-दुख में साथ रहेंगे, तेरा-मेरा ये वादा था, फिर चक्रावात बीच छोड़ हमें, क्यों, अपना बदला एकाएक इरादा था।
हमें जागने को कहकर के, क्यों चिर-निंद्रा में सोये तुम, और मुझे पतवार थमाकर, क्यों चिर-निंद्रा में सोये तुम ।
इतना संबल हमें तू देना प्रियवर, सजल नयन से पाँव पखारू प्रियवर, तेरे गुणो की गहराई में हरदम ही, प्रेम सुधा, बरसाते रहना प्रियवर, आशिषों के वरदहस्त से ढाँके रहना हे प्रियवर।
अमर रहो, चिर लिखित तुम्हारा यश हो, सबसे अनुपम सम रसता को तेरा ही बस यश हो।
और बुलाना हमको फिर-फिर, अपनी ही बल बाँहों में, मिलता रहे आशिष तुम्हारा, फिर नहीं रहे गम आहों में।

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की चौतीसवीं रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)
