बसंत !
क्यों आया बसंत, मदन में फिर से आग लगाया, कोमल कर का चाप कहाँ, दिन पर दिन बड़ा हो आया ।
आया नंगे अंगों को ही पहले-पहल निहारा, फिर थिरकन कोपल में डाला, लबलब रस भर डारा ।
टहनी से टहनी की दूरी तंग हुई, पिली चुनरी पहन गोरी-सा उगे पत्तियाँ जब घनी हुई, खेतों में सरसों मुस्काई ।
था किटकिटाता दाँत, ठंडा बुढ़ा चला गया, उसके श्वेत केश, मेरे हरी चुनरी पर अब नहीं आया ।
हिम खंड भी फेनिल हो आया, सुखे तनों में स्निगधता आयी, मंजर का उबटन पड़ा श्याम पर, हर कलि मुस्कायी ।
श्याम रहो पंखुड़ियों के भीतर, अली आलिंगन का स्वाद चखाओ, बीणा के झंकृत लहरों से मीठा, अपना धुन मेरे कानों में भर जाओ।
तभी चहकते पक्षी बोले, कोयल ने कूक सुनायी, और पपिहरा झुरमुट से, एक ही तान सुनाया; धनिया के पाँव हुए भारी, शरमायी झुकती पड़ी, फल लटक पड़े, वृक्षों के प्याले में रस उमड़ पड़े।
निगोड़े कौआ का मन ललचाया, प्याले में उसने ठोर लगाया, रस टघर पड़ा कुछ प्याले के दीवारों पर, और आम का दाग पड़ा तो पड़ा ही रह गया।
इन प्यालों में मधु भरने दो ऐ कागा, मत करो ठोर कोठील इस क्षण ऐ कागा।
कलि, पराग, मंजर, टिकोरा, पल्लव, फूल, टहनी, अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित, सुरभित सुगन्धी, मादकता, कसाव, मधु प्याला, बसंत आया इतने को अपने अंदर कर डाला।
कमर पर धरे टोकरी, बगीया में आती है जब गोरी, पवन पहुँच कलि के गन्ध, और मादकता को छुती है गोरी की।

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की तीसवीं रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)

