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पटना:पाँच दिवसीय किताब उत्सव का समापन।

RKTV NEWS/पटना(बिहार)08 अप्रैल।पटना में राजकमल प्रकाशन समूह द्वारा आयोजित ‘किताब उत्सव’ का समापन मंगलवार शाम उत्साहपूर्ण माहौल में हुआ। भारतीय नृत्य कला मंदिर में पिछले पाँच दिनों से जारी इस उत्सव में साहित्य, समाज और समकालीन मुद्दों पर केंद्रित विविध सत्रों ने पाठकों और साहित्यप्रेमियों को गहराई से जोड़ा। अंतिम दिन आयोजित कार्यक्रमों में पुस्तक लोकार्पण, संवाद और चर्चाओं के जरिए न केवल साहित्यिक विमर्श को नई दिशा मिली, बल्कि इतिहास, समाज और संस्कृति से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों पर भी विचार हुआ। उत्सव के समापन दिवस पर बड़ी संख्या में उपस्थित दर्शकों की सहभागिता ने यह स्पष्ट किया कि किताबों और विचारों के प्रति रुचि लगातार मजबूत हो रही है।
समापन सत्र में मशहूर कवि-गीतकार जावेद अख़्तर की किताब ‘सीपियाँ’ के सन्दर्भ में चर्चा हुई। इस किताब में जावेद अख़्तर ने कबीर, तुलसी, रहीम, वृंद सहित अनेक कवियों द्वारा रचित चुनिंदा दोहों की सरल भाषा में व्याख्या की है और उनके अर्थों को रोज़मर्रा के जीवन से जोड़ते हुए उदाहरणों के साथ समझाया है। सत्र के दौरान प्रभात सिंह के साथ बातचीत में उन्होंने कहा, दोहे हमें जीवन की गहराई समझाते हैं। जो दोहे आज से सैकड़ों साल पहले कहे गए हैं वो आज भी उतने ही प्रासंगिक है।
किताब में संकलित दोहों के चुनाव पर उन्होंने कहा कि यह उनकी हिम्मत नहीं है कि वो चुनाव कर सकें। लेकिन उन्हें यह एहसास हुआ कि जिन दोहों ने मुझे प्रभावित किया है वे आज की युवा पीढ़ी को भी ज़रूर प्रभावित करेंगे और उनकी समझ को बेहतर बना सकेंगे। यह किताब इसलिए लिखी गई है क्योंकि नई पीढ़ी तो हिन्दी ऐसे बोलती है जैसे हम पर एहसान कर रही हो, जो पीढ़ी हिन्दी सही से न बोल पाती हो उसके लिए दोहों को सरल बनाना ज़रूरी है।
कबीर पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि वो निडर रहे हैं। कबीर अगर आज होते तो वो ईश्वर को नहीं मानते। वे एथिस्ट (नास्तिक) होते। लेकिन कबीर के चाहने वालों ने उनको ही अपना भगवान बना लिया है। हमारी संस्कृति में हम जिसे नापसंद करते हैं उन्हें अपना देवता बना लेते हैं और अपनी ज़िन्दगी से अलग कर देते हैं। कबीर सारी ज़िन्दगी इससे लड़ते रहे। रहीम के बारे में उन्होंने कहा कि उनके दोहे आज भी प्रासंगिक है। वो कभी पुराने नहीं हुए हैं। हमारी भावनाओं की सरगम आज भी वही है। हमारी मूल भावनाओं में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है
धर्म पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया का सबसे धार्मिक आदमी भी एक तरह से नास्तिक होता है। हम अपने धर्म को मानते हुए बाकी धर्मों को नकार देते हैं। धर्मों में कई तरह के अंतर्द्वंद्व हैं। उन्होंने कहा कि अगर जो होता है वो ईश्वर की मर्ज़ी से होता है तो फ़िर पाप और पुण्य कैसा? इसका जवाब ढूंढना नामुमकिन है।
अपनी पर परवरिश पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि बचपन से उनके माता-पिता ने ईश्वर से दूर रखा है। जिससे उन्हें तर्कशील बनने का एक बहुत बड़ा रास्ता मिल गया। अपने बचपन से मैंने देखा कि घर में धर्म को नकारने का माहौल रहा है। बड़े होने पर मुझे खुद भी अपने भीतर बची हुई मान्यताओं से लड़ना पड़ा और आखिरकार खुद को कई बार समझा लेने के बाद उन्होंने पोर्क खाया। उन्होंने कहा कि मेरे परिवार में इतने लोग शायर, लेखक रहे हैं कि शुरू से ही किताबें पढ़ने का शौक लग गया। घर में ऐसा माहौल होने की वजह से मुझे 15-16 की उम्र में ही करीब एक हजार शेर याद थे। आगे उन्होंने कहा कि अच्छा लिखने के लिए पढ़ते रहना बहुत ज़रूरी है।
सिनेमा के पीछे छूट जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि एक पेशे के तौर उन्होंने काफ़ी काम कर लिया है। आजकल की परिस्थिति उनके अनुकूल नहीं है इसलिए भी वो फ़िल्मों से दूरी बना लेते हैं। 90 के दशक में फूहड़ता का दौर चल पड़ा इसलिए उन्होंने कई फिल्में छोड़ीं। आजकल के गानों में कोई गहराई नहीं रही। आजकल भी अच्छा लिखने वाले लोग हैं लेकिन उस तरह का माहौल नहीं है। आजकल रफ़्तार बढ़ी है लेकिन गहराई कम हो गई है।

‘रश्मिरथी’ के प्रकाशन को पूरे हुए 75 वर्ष

इससे पहले के सत्रों में हुए कार्यक्रम की शुरुआत दोपहर दो बजे रामधारी सिंह दिनकर के चर्चित खंडकाव्य ‘रश्मिरथी’ के प्रकाशन के 75 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित विशेष सत्र के साथ हुई। इस दौरान ‘किलकारी’ संस्था से जुड़े बच्चों ने रश्मिरथी के पहले और तीसरे सर्गों का पाठ किया। पाठकर्ताओं में निकू झा, सोनू कुमार, अतुल राय और नीति झा शामिल थे।

सुशील कुमार ने दी साइबर हाइजीन अपनाने की सलाह

दूसरे सत्र में आईपीएस अधिकारी सुशील कुमार की किताब ‘साइबर कथाएँ : डिजिटल सुरक्षा की राह’ विषय पर केंद्रित परिचर्चा हुई। रोहिण कुमार से बातचीत के क्रम में सुशील कुमार ने कहा कि ये किताब कई मायनों में ज़रूरत बन चुकी है। क्योंकि अब यह सिर्फ़ साइबर सिक्यॉरिटी का मामला नहीं है बल्कि एक सामाजिक मुद्दा बन चुका है।
किताब की प्रेरणा के सवाल पर उन्होंने कहा कि साइबर विभाग में काम करने के अपने अनुभवों से महसूस हुआ कि साइबर अपराधों के प्रति लोगों को जागरूक करना बहुत ज़रूरी है। इस किताब में साइबर अपराध और इससे बचने के तरीकों पर कहानियों के ज़रिए विस्तृत चर्चा की गई है। इसमें वैज्ञानिक पहलुओं के बजाय व्यावहारिक पहलुओं पर ज्यादा ध्यान दिया है।
उन्होंने कहा कि समय से पहले और उम्मीद से ज्यादा पैसों के लालच ने ऐसी घटनाओं को जन्म दिया है। इन्फ्लूएंसर बनने की होड़ ने एक ऐसा समाज तैयार किया है जहाँ लोग जल्दी अमीर बनना चाहते हैं। वर्तमान में साइबर अपराधियों द्वारा लोग हजारों तरीकों से ठगे जा रहे हैं। डिजिटल अरेस्ट और ठगी जैसे अपराध डर और लालच की वजह से पाँव पसार रहे हैं।
बिहार के 1000 से ज्यादा लोग लाओस और कंबोडिया जैसे देशों में साइबर गुलाम हैं जिन्हें नौकरी का झांसा देकर वहाँ ठगी का काम कराया जा रहा है।
आगे उन्होंने कहा कि सरकारी योजनाओं के तहत मिले पैसों की ठगी भी बड़े पैमानों पर हुई है और ये अपराधी ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं बल्कि गांव के बेरोजगार युवा थे। साइबर अपराध के लिए बिहार सरकार के हेल्पलाइन नंबर 1930 पर हर दिन लगभग 6000 शिकायतकर्ताओं के फोन आते हैं। उन्होंने श्रोताओं से साइबर हाइजीन अपनाने की सलाह दी और कहा कि जानकारी ही एकमात्र बचाव है।

उर्दू-हिन्दी के बीच बढ़ती दूरी से भाषाओं को हो रहा नुकसान

तीसरे सत्र में ‘बिहार में उर्दू अदब का सफ़र’ विषय पर अब्दुस समद से आसिफ़ सलीम ने बातचीत की। इसी दौरान मिर्ज़ा हादी रुस्वा की किताब ‘ज़ात-ए-शरीफ़’ का लोकार्पण किया गया।
किताबों की अहमियत पर बात करते हुए अब्दुस समद ने कहा कि किताबों की अहमियत कभी कम नहीं होती है। इंटरनेट के दौर में सोच का विकास नहीं हो पा रहा है और लोग किताबों से दूर होते जा रहे हैं। सूरत-ए-हाल कुछ ऐसे हैं कि लोग लिखने पढ़ने में दिलचस्पी कम करते जा रहे हैं।
फिक्शन पर बात करते हुए अब्दुस समद ने कहा कि फिक्शन इतिहास से आगे की चीज़ है। प्रेमचंद का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि उनके उपन्यास अपने ज़माने की झलक दिखती है। वैसे ही उपन्यास अपने समय की झलक दिखाते हैं क्योंकि आने वाली पीढ़ी इसी के जरिए अपने अतीत को देखती है।
तनक़ीद (आलोचना) पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि आजकल खेमाबंद तनक़ीद लिखी जा रही है। आजकल की तनक़ीद में वो मयार बाकी नहीं है। आजकल के लिखी जाने वाली चीज़ों से वो खासे मुतमईन नहीं है क्योंकि आजकल के युवा मशहूर होंने की हड़बड़ी में रहते हैं। उन्होंने कहा कि बिहार के शायरों का मुकाबला किसी दूसरे सूबे के शायरों से नहीं हो सकता। लेकिन हाल के कुछ सालों में उस स्तर में भी गिरावट आई है।
पटना में भी अब वो माहौल बाकी नहीं रहा है जहाँ उर्दू-हिन्दी के लोग आपस में बैठकर चर्चा कर सकें। इससे हमारी भाषाओं का ख़ासा नुकसान हो रहा है। हिन्दी और उर्दू एक-दूसरे से अलग नहीं है लेकिन इनके बीच दूरी बढ़ती जा रही है।

अली सरदार ज़ाफरी : शख़्सियत और कहानियाँ

अगले सत्र में ‘अली सरदार ज़ाफरी : शख़्सियत और कहानियाँ’ विषय पर सफ़दर इमाम कादरी ने वक्तव्य दिया। इस दौरान अली सरदार ज़ाफरी के कहानी-संग्रह ‘मंज़िल’ के पुनर्नवा संस्करण का लोकार्पण हुआ। सफ़दर इमाम कादरी ने कहा कि अली सरदार ज़ाफरी प्रगतिशील आंदोलन के पुरोधा रहे हैं। किताब के नाम पर अली सरदार ज़ाफरी के हवाले से उन्होंने कहा कि आने वाले इंकलाब के नाम उन्होंने ये किताब लिखी थी। 1938 में लिखी ये किताब समय के साथ कहीं खो गई लेकिन अब इस पर बात करनी लाज़मी है।
‘लखनऊ की पाँच रातें’ किताब पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि इससे उस वक्त के प्रगतिशील लेखकों के विकास को समझने में मदद मिलती है। उनकी किताबों में अलीगढ़ और लखनऊ के माहौल की झलक दिखती है। उन्होंने कहा, उर्दू कहानीकारों में अली सरदार ज़ाफरी का स्थान हमेशा ऊँचा रहेगा।

रवीन्द्र भारती की किताब ‘नेपाल : लट्ठापार की डायरी’ का लोकार्पण

पाँचवें सत्र में रवीन्द्र भारती की किताब ‘नेपाल : लट्ठापार की डायरी’ का लोकार्पण हुआ। इस दौरान धर्मेन्द्र सुशांत के साथ हुई बातचीत में उन्होंने कहा कि ये नेताओं की किताब नहीं बल्कि कार्यकर्ताओं की किताब है। वैसे कार्यकर्ता जिनका ज़िक्र इतिहास में कहीं नहीं है उन्हें यहाँ रेखांकित किया गया है। ये किस्सागोई के अंदाज़ में इतिहास लिखने की कोशिश है। इसमें उनका अपना कुछ नहीं बल्कि सौ फ़ीसदी ऐतिहासिक तथ्य मौजूद है।
रेणु जी पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि नेपाल की क्रांति में उनका योगदान अतुलनीय है। उन्होंने न सिर्फ़ कलम की ताक़त से प्रहार किया बल्कि सड़क पर आकर क्रांति में अपना अहम योगदान दिया। साथ ही बेनीपुरी जी ने भी एक अहम भूमिका निभाई है। ज़मीनी लड़ाई में उनकी अहम भूमिका रही है। जयप्रकाश नारायण और बीपी कोईराला पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि जेपी के बिना समाजवाद की क्रांति की कल्पना मुमकिन नहीं थी।
नेपाल की क्रांति में बिहार के समाजवादियों की भूमिका को रेखांकित करते हुए उन्होंने बताया कि बिहार के समाजवादी नेताओं का बहुत बड़ा योगदान रहा है। नेपाल और भारत के लोगों ने अपने-अपने देश की क्रांति में परस्पर सहयोग दिया है। इस किताब में कई ऐसे नाम हैं जो भुला दिए गए।

‘बुलबुल-ए-कश्मीर की दास्तान : हब्बा की खोज’ का लोकार्पण

छठे सत्र में गीताश्री की नई किताब ‘बुलबुल-ए-कश्मीर की दास्तान : हब्बा की खोज’ का लोकार्पण हुआ। इस दौरान धर्मेंद्र सुशांत और जयप्रकाश से बातचीत में गीताश्री ने कहा, हब्बा को लंबे समय तक काल्पनिक मानकर दरकिनार किया गया और इतिहास में उनका स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता, हालांकि फारसी शायरी में उनके संदर्भ मिलते हैं। उन्होंने बताया कि यह किताब उन स्त्रियों की खोज का हिस्सा है, जिन्हें इतिहास में दबा दिया गया। हब्बा को उन्होंने ‘कश्मीर की मीरा’ और रोमांटिसिज्म की पहली स्त्री-स्वर बताया। उन्होंने कहा कि स्त्रियों के सुख-दुख सार्वभौमिक होते हैं और उनका जाति या संप्रदाय से कोई संबंध नहीं होता। उन्होंने कश्मीरी लोककथाओं में हब्बा के बिहार आने के जिक्र का भी उल्लेख किया और कहा कि हब्बा की तलाश दरअसल कश्मीर की खोज भी है, जो मौजूदा समय में और अधिक चुनौतीपूर्ण हो गई है। साथ ही उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि बुजुर्ग पीढ़ी के खत्म होने के साथ स्मृतियों में सुरक्षित इतिहास भी धीरे-धीरे खो रहा है।
वहीं धर्मेंद्र सुशांत ने हब्बा के जीवन को त्रासदीपूर्ण बताया और कहा कि उनके बारे में ठोस ऐतिहासिक तथ्य बेहद सीमित हैं। उन्होंने हब्बा की कब्र को लेकर इतिहासकारों के बीच मौजूद मतभेदों का भी उल्लेख किया, जिसमें नालंदा सहित कई स्थानों पर दावे किए जाते हैं। उनके अनुसार यह किताब इतिहास और लोककथाओं के मिश्रण के रूप में हब्बा के जीवन को समझने का प्रयास है।
जयप्रकाश ने हब्बा से जुड़े विभिन्न लोक और ऐतिहासिक संदर्भों को सामने रखा। उन्होंने कहा कि हब्बा का संबंध राखड़ समुदाय से माना जाता है और उनकी कब्र को लेकर कश्मीर से लेकर बिहार तक अलग-अलग दावे किए जाते हैं। उन्हें कहा कि भले ही इतिहास में हब्बा का स्पष्ट उल्लेख न हो, लेकिन साहित्य, लोकगीतों और कश्मीरी जनजीवन में उनकी उपस्थिति आज भी जीवित और प्रभावशाली है।

‘देखने के तरीक़े’ किताब पर हुई चर्चा

सातवें सत्र में जॉन बर्जर की किताब ‘देखने के तरीक़े’ पर रंगकर्मी विनय कुमार और अनीश अंकुर ने वक्तव्य दिया। विनय कुमार ने कहा कि समय के साथ कला को देखने के तरीके में बहुत बदलाव हुए हैं। जिस समय की बात इस किताब में होती है हम आज उस समय से काफ़ी आगे आ चुके हैं। दुनिया में जिस तरह के बदलाव हुए हैं उसको देखते हुए यह कहा जा सकता है कि कला के मूल्यांकन के लिए यह किताब ज़रूरी पाठ है। पिछले तीन दशकों में कला का लोकतान्त्रिकरण हुआ है और ये बहुत अच्छा बदलाव है। अब रोज़मर्रा की चीजें और मुद्दे कला का विषय बन कर उभर रहे हैं।
अनीश अंकुर ने कहा कि यह किताब हर कला समीक्षक के लिए जरूरी है। ये किताब हमें देखना सिखाती है। रेनेसां काल के चित्रों के बारे में यह एक बेहतरीन किताब है। इस काल में पोट्रेट का युग पहली बार आया। विज्ञापन की भाषा के स्रोत भी इस किताब में मौजूद हैं। इस किताब ने ये स्थापित किया कि आज के विज्ञापन और 17वीं शताब्दी के चित्रों के बीच गहरा सम्बन्ध है। उन्होंने जॉन बर्जर को उद्धरित करते हुए कहा कि छवियों का अपना एजेंडा होता है। इसलिए विज्ञापनों में इनका इस्तेमाल होता है। विज्ञापन उपभोक्ताओं के मन में एक प्रकार की असंतुष्टि पैदा करते हैं। उपभोक्तावाद पूंजीवाद की देन है। पूंजीवाद एक अलग तरह की आजादी का अहसास कराता है लेकिन राजनैतिक चुनाव की आजादी छीनता है।

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