
इतिहास के पन्ने
माँ बतलाओ बिती अपनी, मुझको आप कहानी; कैसे बीता बचपन तेरा, कैसे बिती जवानी ।
माँ ने कहा यही कि, थी उसको कुछ लाचारी; चौसठ उपर छः सौ के बीच, बन बैठी थी बेचारी ।
सब कहते थे, मेरी प्यारी, मेरी प्यारी; मेरे पास रहो बस कहते, फिर करते वे मारा-मारी ।
एक आवारा इतने में, वन आ पहुँचा व्यापारी; लिए तराजू बन्दर वाला, शुरू किया वह पारी ।
धीरे-धीरे गपच गया वह, हिस्सा सबकी सारी; जकड़ दिया जंजीर पाँव में, मेरे लेकर भारी।
माँ सुबक सुबक कर रोती थी, हम रोते थे बारी-बारी; फिर भाई-बहना सब मिलकर, थे किये जंग को जारी।
चरखा और नमक को, हमने तब हथियारों में दारी; सत्य-अहिंसा के दालों से, किया था तोपों का बंटाधारी।
पार समुन्दर उसे भगाया, माँ की हुई उद्धारी; लगे खेलने माँ की गोदी, आयी अब बचपन की बारी।
इसी बीच एक हत्यारा आया, और बापू को गोली मारी, बिलख-बिलख कर हम रोये, धुन-धुन कर सिर मतारी।
सोच रही थी बिती घड़ियों को, मैं जीती या हारी; मुझको है संतान करोड़ों, कौन बनेगा पालन हारी।
मुझको है संतान करोड़ों, कौन बनेगा पालन हारी; थी पड़ी सोच में, बेटी जनता को, कौन बनावे अपनी नारी।
राय किया बिटियों से, यद्यपि दिल था दुःख से भारी, कैसा वह हो बोलो तेरा, रहो न अब तू कुँआरी ।
माँ तू एक थी लेकिन, छः सौ चौसठ थे तुम पर वारी; इसीलिए दुःख तूने झेला, यौवन बना था भारी-भारी।
एक पति ही हमें चाहिए सबको, यही राय है अबकी बारी; चौरासी कोटि हम बहनों का, ऐसी शादी कर दो न्यारी।

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की तेरहवीं रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)

