
पटना/बिहार (राकेश मंगल सिन्हा) 25 मार्च। वासंती नवरात्र के दौरान संपन्न होने वाला चैती छठ पारंपरिक रूप से उदीयमान सूर्य को अर्घ्य अर्पण के साथ संपन्न हो गया। रविवार चैत्र शुक्ल चतुर्थी तिथि को नहाय-खाय के साथ शुरू हुआ लोक आस्था का महापर्व छठ। नहाय- खाय के दिन छठव्रतियों ने शुद्धता से गंगा नदी सहित अन्य नदियों या घर पर नहा धोकर अरवा चावल, चने का दाल, लौकी की सब्जी आदि बनाकर भोजन किया। साथ ही अपने परिजनों, मित्रों एवं रिश्तेदारों को उसका प्रसाद खिलाया। सोमवार चैत्र शुक्ल पंचमी तिथि को पूरे दिन व्रत रहकर छठव्रतियों ने शाम मे गुङ का खीर और रोटी का प्रसाद छठ मैया को चढ़ाकर खरना का पूजा किया। छठव्रतियों ने इस प्रसाद को अपने परिजनों, मित्रों तथा रिश्तेदारों को भी खिलाया।

इसके बाद शुरू हुआ 36 घंटे का निर्जला उपवास। मंगलवार चैत्र शुक्ल षष्ठी तिथि को छठव्रत्तियों ने नदी, तालाब, पोखर अथवा छत पर पानी में खड़ा होकर सूप में ठेकुआ, विभिन्न प्रकार का फल, पंचमेवा, नारियल, घाघर नीबू, दीया आदि लेकर अस्ताचलगामी सूर्य को तथा बुधवार चैत्र शुक्ल सप्तमी तिथि को उदयीमान सूर्य को अर्घ्य दिया। और इसी के साथ संपन्न हुआ चार दिवसीय लोक आस्था का महापर्व छठ। छठव्रतियों के परिजनों, रिश्तेदारों और मित्रों ने जोशो- खरोश के साथ इस महापर्व में भाग लिया। वैसे तो छठ पर्व काफी कठिन पर्व माना जाता है। शुद्धता, पवित्रता, और सात्विकता के साथ मनाया जाने वाला यह पर्व निर्जला उपवास रहने के कारण काफी कठिन माना जाता है। चैत्र माह मे गर्मी के मौसम मे किये जाने वाले चैती छठ का महत्व कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता है। गर्मी के मौसम मे निर्जला उपवास रखना बहुत कठिन होता है। चैती छठ को ज्यादा कठिन माना जाता है। इसमे छठव्रतियों के मानसिक एवं शारीरिक स्थिति के साथ- साथ सात्विकता की कड़ी परीक्षा होती है।

