
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)19 मार्च।जगदेव नगर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह के दूसरे दिन प्रवचन करते हुए श्रीमत्सनातनशक्तिपीठाध्यक्ष आचार्य डॉ भारतभूषण जी महाराज ने कहा कि ऊपर भगवान का बल,पृथ्वी पर धर्म का बल,व्यवहार में शास्त्र का बल और इनका उपदेश करनेवाले सद्गुरु का आश्रय ही जीवन का असली संबल है।इनसे विरहित जीवन वास्तव में दीन-हीन और अंधकारमय होता है।चौबीस अवतारों की कथा कहते हुए उन्होंने कहा कि संसार के रक्षण और शिक्षण के लिए ही भगवान विविध अवतार लेते हैं।उन्होंने कहा कि जीवन में आनेवाले सभी संकट भगवान के यश संकीर्तन तथा उनके चरणकमलों के स्मरण से ही समाप्त हो जाते हैं।भगवान के आश्रित जीव को किसी संकट का दुष्प्रभाव बाधित नहीं कर पाता है।उन्होंने भागवत कथा का उपदेश कर भगवान वेदव्यास की खिन्नता दूर की।कुंती माता ने श्रीकृष्ण के बार-बार दर्शनों के लिए विपत्तियों का वरदान मांगा।पितामह भीष्म ने श्रीकृष्ण के श्रीमन्नारायण स्वरूप का दर्शन महाभारत युद्ध में भी किया और पांडवों को दानधर्म,राजधर्म, मोक्षधर्म,भगवद्धर्म,स्त्रीधर्म आदि का उपदेश करते हुए श्रीकृष्ण की शरणागति की महिमा का गान किया।
आचार्य ने कहा कि वेदों का प्रतिपाद्य धर्म और ब्रह्म है जिसका भागवत में यथार्थतः निरूपण हुआ है।उन्होंने कहा कि परीक्षित ने कलियुग को धर्म से अलग अधर्म के साथ असत्य, मद, आसक्ति,वैर और लोभ जो क्रमशः द्युत,मद्यपान,स्त्रीसंग,हिंसा और स्वर्ण आदि दुर्व्यसनों में रहते हैं,जोड़ दिया था।इससे घोर कलिकाल में भी धर्म और धार्मिक लोग सुरक्षित रहते हुए अपने कर्तव्य का आनन्दपूर्वक पालन कर सकते हैं।आचार्य ने शास्त्रोक्त धर्म के दृढ़तापूर्वक पालन पर बल देते हुए कहा कि लोक-परलोक में हमारे सुखों का यही एकमात्र आधार है।किसी भी परिस्थिति में स्वधर्म का त्याग नहीं करना चाहिए।
