गाँधी दर्शन
एक बार गाँधी जी आते, मैनचेस्टर में आग लगाते,सागर जल से लवण बनाते चरखा तो घर-घर कतवाते ।
धोती और लंगोटी रखते, इससे अधिक नहीं हम रखते; संग एक बकरी को रखते, उसके दूध में खुब नहाते ।
विश्व बैंक के कर्जे का, मुँहताज नहीं हम अबतक रहते; अपनी पूँजी, अपना हुनर, इससे ही बस काम चलाते ।
निज तृप्ति से, तृष्णा को, बस करके खाक मिटाते; हाथ-हाथ को काम दिलाते, मिट्टी में सोना उपजाते ।
बापू के वंशज अब तो बस, धरे हाथ पर हाथ खड़े हैं; अपने हाथ कटोरा लेकर, मुँह पश्चिम को किये खड़े हैं।
चरखा को कुँए में डाला, करघा को चुल्हें में डाला; धोती पर पतलून चढ़ा तो, भोजन को भी पड़े न लाला ।
किया लूंज संरचना अर्थ का, चारवाव का ढ़ोल बजाया; अपनी प्रतिभा को घुँघट दे, दूर सागर की सेज चढ़ाया ।
हल से हमने हाथ को खींचा, दारून दुःख ने पकड़ा पीछा; पीपल की छैया को छोड़ा, किया शीत-ताप नियंत्रित का पीछा ।
कम्प्यूटर, यंत्र मानव, फास्ट फूड पोलियेस्टर खादी, सबने डेरा डाला;
खेल समझकर लाया पहले, पर चक्रव्यूह में अर्थ का, मैं तो फँसा अकेल
छोड़ा दूध, मलाई छोड़ा, बोतल को अधरो से जोड़ा ।
अंधाधुंध मशीन मँगाकर अपने बाँह को अपने तोड़ा ।
सभा मंच पर अब तो केवल, तेरे दर्शन को जाम बना पीता हूँ;
पीकर वहीं उगल देता हूँ, फिर बड़े चाव से पेप्सी-कोला पीता हूँ।
हर ओर अँधेरा दिखता अब तो, तेरा दर्शन रहा कहाँ अब और नहीं बोलेंगे बापू तेरे वंशज से, तेरा दर्शन रहा कहाँ अब; अब ।

(उक्त कविता ख्यातिप्राप्त लेखक,कवि,व्यंग्यकार,समीक्षक, अनुवादक “डॉ कृष्ण दयाल सिंह”जो एक अवकाश प्राप्त डाक सेवा अधिकारी भी है, उनके साहित्य काल के शुरूआती दौर में 09 फरवरी 1998 को प्रकाशित की गई कविता संग्रह पुस्तक “यत्र-तत्र”से ली गई है और यह कवि की उक्त संग्रह की छठवीं रचना है। RKTV NEWS नित्य इनके संग्रहित पुस्तक से क्रमवार एक एक रचना प्रकाशित करेगी। इनकी कई रचनाएं विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और समाचार पत्रों में प्रकाशित होती रहती है साथ ही इनके दर्जनों पुस्तक भी प्रकाशित हो चुके है, वर्तमान में बिहार राज्य के भोजपुर जिला अंतर्गत आरा के वशिष्ठपुरी में निवास करते है। सुझाव और संपर्क हेतु: 9570805395)

