
आरा/भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)18 मार्च।जगदेव नगर में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह के प्रथम दिन प्रवचन करते हुए श्रीमत्सनातनशक्तिपीठाध्यक्ष आचार्य डॉ भारतभूषण जी महाराज ने कहा कि मानव जीवन कुसंग, कुमार्ग, कुचिंतन के विष से दग्ध होने के लिए नहीं मिला है बल्कि सत्संग, सदाचार और परोपकार के अमृत से सिंचित होने के लिए परमात्मा का दिया हुआ सर्वोत्तम उपहार है।उन्होंने कहा कि संस्कारों का क्षरण ही मृत्यु है। एक ही माता-पिता के अभिभावकत्व में पले-बढ़े गोकर्ण और धुंधुकारी संस्कारों के कारण सर्वथा भिन्न स्वभाव वाले हो गए। धुंधुकारी अपने कुसंग और कुमार्ग के कारण अधोगति को प्राप्त हुआ तो गोकर्ण अपने उच्च-उदात्त संस्कारों के कारण पूरे ग्रामवासियों को गोलोक धाम व नित्य भगवत्सान्निध्य प्रदान कराने वाले महापुरुष हुए। आचार्य ने कहा कि गुरु,ग्रंथ और गोविंद के सेवन में ही जीवन की असली सफलता सिद्ध होती है।उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत से भक्ति,ज्ञान और वैराग्य पुष्ट होते हैं तथा भगवत्प्राप्ति और प्रपत्ति सिद्ध होती है।आचार्य ने कहा कि कलिकाल में धर्म के नाम पर दंभ,द्वेष और पाखंड का बोलबाला बढ़ जाता है।ऐसे में स्वयं को सबसे छोटा और विश्व को भगवान का स्वरूप मानकर कलिपावनावतार गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की तरह उपासना करने से ही अपना और अन्यों का भी कल्याण संभव है।भगवान की भक्ति ही जीवन का परम धन है।महापुरुषों और पूर्वाचार्यों ने भक्ति की प्राप्ति के लिए ही कथासुधा का लोक में प्रचार किया है।कथा ही सत्संग है और कथा ही अमृत है।यह सुखस्वरूप परमात्मा को जीवमात्र के हृदय में प्रतिष्ठापित करने का सर्वोच्च अनुष्ठान है।सनकादि,नारदादि, व्यास-शुकादि परमर्षिगण इसी कथामृत के उपासक व उपदेष्टा हैं जिसके सेवनमात्र से ही सभी जीव निर्भय हो जाते हैं।
