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खजुराहो महोत्सव:भोजपुरी चित्रकार वंदना श्रीवास्तव की दो पुस्तकों का लोकार्पण।

खजुराहो/मध्यप्रदेश (मनोज कुमार प्रसाद)25 फरवरी।खजुराहो महोत्सव के दूसरे दिन आयोजित ‘कलावार्ता’ कार्यक्रम में एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक-कलात्मक क्षण दर्ज हुआ। प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव “परिचय दास” के व्याख्यान के उपरांत भोजपुरी की प्रतिष्ठित चित्रकार वंदना श्रीवास्तव की दो पुस्तकों— “कला का सामाजिक व्याकरण” और “भोजपुरी कला के बहाने” — का औपचारिक लोकार्पण किया गया। वंदना श्रीवास्तव संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की सीनियर फेलो हैं तथा दिल्ली सरकार की साहित्य कला परिषद की सदस्य तथा केंद्रीय विद्यालय, द्वारका ,नई दिल्ली के प्रबंधन समिति की सदस्य तथा “आम्रपाली’ पत्रिका की सलाहकार संपादक हैं ।
पुस्तक-लोकार्पण समारोह में मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति मंत्रालय की उस्ताद अलाउद्दीन खान संगीत एवं कला अकादमी के निदेशक प्रकाश सिंह ठाकुर, उपनिदेशक शेखर कराडकर, रजनी राव, शैलजा सुल्लेरे , प्रो. परिचय दास आदि मंचासीन रहे। अतिथियों ने सामूहिक रूप से पुस्तकों का विमोचन किया और लेखिका के सृजनात्मक अवदान की सराहना की।
इस अवसर पर लोकार्पणकर्ताओं ने कहा कि “कला का सामाजिक व्याकरण” केवल चित्रों की तकनीकी संरचना पर विचार नहीं करती, बल्कि कला की अंतर्निहित संवेदना, रूपबंध और सांस्कृतिक संदर्भों को भी खोलती है। वहीं “भोजपुरी कला के बहाने” क्षेत्रीय कला-चेतना को व्यापक भारतीय परिप्रेक्ष्य में रखकर देखने का प्रयास है।
यह पुस्तक भोजपुरी लोक-अनुभव, रंग-संवेदना और दृश्य-भाषा की विशिष्टता को आलोचनात्मक दृष्टि से प्रस्तुत करती है। वक्ताओं ने विशेष रूप से रेखांकित किया कि इन पुस्तकों का प्रकाशन कला आलोचना के क्षेत्र में एक सार्थक हस्तक्षेप है। आज जब दृश्य माध्यमों की भरमार है, तब गंभीर कला-चिंतन का अभाव अनुभव किया जाता है। ऐसे समय में वंदना श्रीवास्तव की ये कृतियाँ संवाद और विमर्श की नई संभावनाएँ खोलती हैं।
प्रकाश सिंह ठाकुर , निदेशक, संस्कृति मंत्रालय, मध्यप्रदेश शासन ने कहा कि क्षेत्रीय कला को समझने के लिए उसके सामाजिक और सांस्कृतिक आधार को पढ़ना आवश्यक है। उन्होंने वंदना श्रीवास्तव के कार्य को भोजपुरी कला-संवेदना की रचनात्मक अभिव्यक्ति बताया, जो परंपरा और आधुनिकता के बीच सेतु का कार्य करती है।
कार्यक्रम में उपस्थित कलाकारों, शोधार्थियों और कला-प्रेमियों ने पुस्तकों का स्वागत किया। खजुराहो की ऐतिहासिक सांस्कृतिक भूमि पर संपन्न यह लोकार्पण समारोह कला और साहित्य के पारस्परिक संबंध का सजीव उदाहरण बन गया।

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