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इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय में सात दिवसीय ‘पुरालिपि एवं पुरालेख’ कार्यशाला का भव्य समापन।

कुलपति प्रो. डॉ. लवली शर्मा ने प्रतिभागियों को बांटे प्रमाण-पत्र; डॉ. टी.एस. रविशंकर के मार्गदर्शन में विद्यार्थियों ने सीखी प्राचीन लिपि।

खैरागढ़/छत्तीसगढ़ (रवींद्र पांडेय) 23 फरवरी। पुरालिपि एवं पुरालेख अध्ययन विषय पर आयोजित सात दिवसीय कार्यशाला का कल समापन हो गया। प्राचीन अभिलेखविद्या की इस विशेष कार्यशाला का आयोजन इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक दरबार हॉल में किया गया। समापन अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में कुलपति प्रो. डॉ. लवली शर्मा उपस्थित रहीं। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. राजन यादव अधिष्ठाता कला संकाय ने की। विषय विशेषज्ञ के रूप में डॉ. टी.एस. रविशंकर (भूतपूर्व निदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, मैसूर) उपस्थित रहे।
समापन समारोह का शुभारंभ सुश्री सुष्मिता चौधरी के स्वागत उद्बोधन से हुआ। उन्होंने अतिथियों को देवी सरस्वती के समक्ष पुष्प अर्पित कर माल्यार्पण हेतु आमंत्रित किया जिससे कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत हुई। कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कुलपति प्रो. डॉ. लवली शर्मा ने इस कार्यशाला को विद्यार्थियों के ज्ञानवर्धन हेतु प्रेरक बताया। साथ ही उन्होंने विषय विशेषज्ञ डॉ. रविशंकर को उत्कृष्ट विशेषज्ञ बताते हुए उनकी सराहना की तथा भविष्य में भी ऐसे विद्वानों को विश्वविद्यालय में आमंत्रित करने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया।
प्रो. राजन यादव ने आचार्य दंडी के एक श्लोक का पाठ करते हुए कहा कि “शब्द” सूर्य के समान प्रकाशमान शक्ति है, जो समस्त विश्व को आलोकित करता है। उन्होंने कहा कि अभिलेखविद्या ऐसी विधा है जिसे असत्य सिद्ध नहीं किया जा सकता तथा आक्रमणकारियों के प्रयासों के बावजूद हमारा गौरवशाली इतिहास अक्षुण्ण बना हुआ है। विद्यार्थियों को इतिहास अध्ययन पर विशेष ध्यान देने का आग्रह करते हुए उन्होंने अपने वक्तव्य का समापन “गति ही जीवन है” के संदेश के साथ किया।
अपने संबोधन में विशेषज्ञ डॉ. रविशंकर ने कहा कि यह कार्यशाला केवल संपन्न नहीं हुई बल्कि सभी ने इसे एक उत्सव के रूप में मनाया। विद्यार्थियों की संगीतमय प्रस्तुति और स्नेहपूर्ण उपहारों ने उन्हें भावुक कर दिया। उन्होंने विश्वविद्यालय परिसर के शांत एवं सुंदर वातावरण की सराहना की तथा अपने प्रवास को सुखद बताया। विद्यार्थियों को संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि वे सीखी हुई विद्या का निरंतर अभ्यास करें और इस अमूल्य कला को कभी न छोड़ें।

प्रतिभागियों ने साझा किया अपना अनुभव

अतिथियों के उद्बोधन से पहले प्रतिभागियों को अपने अनुभव साझा करने के लिए आमंत्रित किया गया। शरद स्वर्णकार, देवहूति साहू, कृष्ण कुमार नेताम, रामेश्वरी, शिवांगी रावत, प्रखर चौरे, नैन्सी अग्रवाल, श्रुति, धरनी वर्मा एवं सोनल वसानी सहित अनेक विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों ने कार्यशाला को सुविचारित, अत्यंत ज्ञानवर्धक एवं प्रेरणादायी बताया। सभी ने डॉ. टी. एस. रविशंकर की निष्ठा, समर्पण और गहन विद्वत्ता की सराहना की। बी.एफ.ए. द्वितीय वर्ष के विद्यार्थियों ने सम्मान स्वरूप डॉ. रविशंकर को उपहार भेंट किए। समापन सत्र में प्रशांत साहरे ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि वे लंबे समय से इस विद्या को सीखने के इच्छुक थे जो डॉ. रविशंकर के मार्गदर्शन में संभव हो सका। डॉ. पूर्णिमा केलकर ने विदाई स्वरूप “आज जाने की जिद न करो” का संस्कृत रूप में मधुर गायन प्रस्तुत किया जिसने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। उन्होंने डॉ. रविशंकर की तुलना एक प्राचीन ऋषि से की एवं अभिलेखविद्या को शोध-प्रविधि से जोड़कर उसकी शैक्षणिक महत्ता स्पष्ट की।
कार्यक्रम के संयोजक डॉ. आशुतोष चौरे ने कहा कि प्रारंभ में उन्हें संदेह था कि कार्यशाला को अपेक्षित प्रतिसाद मिलेगा या नहीं किंतु विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता ने इसे अत्यंत सफल बना दिया। उन्होंने कहा कि डॉ. रविशंकर ने एक ऐसी खिड़की खोली जिसके माध्यम से सभी को अपने गौरवशाली इतिहास की झलक देखने का अवसर मिला। अंत में डॉ. आशुतोष चौरे ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए सभी सहयोगियों, प्रतिभागियों एवं आयोजकों का आभार व्यक्त किया। कुलपति डॉ. शर्मा के द्वारा प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र वितरित किया गया।

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