
आरा/भोजपुर (अतुल प्रकाश)21 फरवरी।बिहार की राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में एक ऐतिहासिक बहस चल रही है, जो हाल ही में बिहार सवर्ण आयोग की सिफारिशों के बाद शुरू हुई है। डॉ. महाचंद्र प्रसाद सिंह की अध्यक्षता में एक उच्च-स्तरीय समीक्षा बैठक में, आयोग ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के उत्थान के लिए कई क्रांतिकारी उपायों का प्रस्ताव किया है। इस 10,000 शब्दों के गहन जांच रिपोर्ट में, हम विश्लेषण करते हैं कि क्या गरीब सवर्णों को दलित-समकक्ष सुविधाएं प्रदान करना सामाजिक संतुलन की ओर एक कदम है या एक राजनीतिक रणनीति है।
सवर्ण आयोग की रिपोर्ट के मुख्य बिंदु
सवर्ण आबादी का लगभग 25% गरीबी में जीवन यापन कर रहा है, जिसमें हजारों लोग ₹10,000 प्रति माह से कम कमा रहे हैं।
भूमिहीन परिवारों को कम से कम 5 डेसीमल भूमि (बसगीत) प्रदान करने की मांग।
सरकारी नौकरियों में अधिकतम आयु सीमा को पुरुषों के लिए 40 वर्ष और महिलाओं के लिए 45 वर्ष तक बढ़ाने का प्रस्ताव।
ईडब्ल्यूएस प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए जिला मजिस्ट्रेटों को निर्देश।
गरीब सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए निःशुल्क कोचिंग और अलग छात्रावास की मांग।
बिहार की राजनीति पर प्रभाव
नीतीश-सुमित सरकार का यह कदम बिहार की पारंपरिक जाति-आधारित राजनीति को फिर से परिभाषित कर सकता है और भविष्य के चुनावों को प्रभावित कर सकता है।
