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रायपुर : महिला शक्ति और वनोपज का सफल संगम, हरिबोल स्व-सहायता समूह ने रचा आर्थिक सशक्तिकरण का उदाहरण।

बढ़ती मांग, मजबूत बाजारः स्थानीय से प्रदेश स्तर तक वनौषधियों की निरंतर आपूर्ति।

RKTV NEWS/रायपुर ( छत्तीसगढ़)06 फरवरी।ग्रामीण अंचलों में वनोपज पर आधारित आजीविका सदियों से महिलाओं के जीवन और आर्थिक संरचना का अभिन्न हिस्सा रही है। जंगलों से प्राप्त वनोषधि एवं अन्य वनोपज न केवल पारंपरिक ज्ञान का प्रतीक हैं, बल्कि आज के समय में महिला स्वावलंबन, स्वास्थ्य और सतत रोजगार का मजबूत आधार भी बन रहे हैं। जब संगठित प्रयास, प्रशिक्षण और बाजार से जुड़ाव मिलता है, तब यही वनोपज ग्रामीण महिलाओं के जीवन में आत्मनिर्भरता और सम्मान का नया अध्याय रचते हैं। इसी सोच को साकार करता हुआ एक सशक्त उदाहरण है कोरबा जिले के ग्राम डोंगानाला का हरिबोल स्व सहायता समूह है, वर्ष 2006-07 में यूरोपियन कमीशन परियोजना के अंतर्गत स्वीकृत इस पहल के माध्यम से गठित हरिबोल स्व सहायता समूह ने आज महिला सशक्तिकरण की एक सफल मिसाल कायम की है। 12 महिला सदस्यों से युक्त यह समूह वनौषधि प्रसंस्करण केंद्र, डोंगानाला का सफल संचालन कर रहा है, जहां कच्ची वनौषधियों का संग्रहण, वैज्ञानिक पद्धति से प्रसंस्करण एवं विपणन किया जाता है। समूह की महिलाएं स्वयं जंगलों से कच्ची वनौषधि एकत्र कर, निर्धारित घटक मात्रा के अनुसार प्रसंस्करण कार्य करती हैं।
प्रसंस्करित वनौषधियों की मांग स्थानीय स्तर के साथ-साथ प्रदेश स्तर पर भी निरंतर बनी हुई है। समूह द्वारा उत्पादित वनौषधियों का विक्रय एन.डब्ल्यू.एफ.पी. मार्ट बिलासपुर, रायपुर, दुर्ग, कांकेर, अंबिकापुर, जगदलपुर सहित संजीवनी केंद्र केवची (कटघोरा) एवं कोरबा में किया जा रहा है। इसके साथ ही प्रसंस्करण केंद्र में नियुक्त वैद्य द्वारा स्थानीय एवं आसपास के क्षेत्रों के 1500 से अधिक मरीजों का सफल उपचार किया जा चुका है। समूह की महिलाओं द्वारा हिंगवाष्टक चूर्ण, अजमोदादि चूर्ण, अश्वगंधादि चूर्ण, सितोपलादि चूर्ण, अविपत्तिकर चूर्ण, बिल्वादि चूर्ण, पुष्यानुग चूर्ण, त्रिफला चूर्ण, पंचसम चूर्ण, शतावरी चूर्ण, आमलकी चूर्ण, पायोकिल (दंतमंजन), सर्दी-खांसी नाशक चूर्ण, हर्बल कॉफी चूर्ण, महिला मित्र चूर्ण, हर्बल मधुमेह नाशक चूर्ण, हर्बल फेसपैक चूर्ण तथा हर्बल केशपाल चूर्ण का निर्माण किया जा रहा है।
आर्थिक दृष्टि से हरिबोल स्व सहायता समूह ने उल्लेखनीय प्रगति की है। वर्तमान में समूह द्वारा 20 लाख 52 हजार रुपये की वार्षिक आय अर्जित की जा रही है तथा प्रतिवर्ष लगभग 50 लाख रुपये की वनौषधियों का विक्रय किया जाता है। इससे प्रत्येक सदस्य को औसतन 1.71 लाख रुपये प्रति वर्ष की आमदनी प्राप्त हो रही है। बीते दो वर्षों में समूह का विक्रय एवं लाभ दोनों दोगुने हुए हैं, जहां पूर्व में वार्षिक लाभ 10.68 लाख रुपये था, जो वर्तमान में बढ़कर 20.52 लाख रुपये हो गया है।
वन मंडलाधिकारी कटघोरा ने बताया कि यह वनौषधि प्रसंस्करण केंद्र समूह से जुड़ी महिलाओं को स्थायी रोजगार, आत्मनिर्भरता और आर्थिक सुरक्षा प्रदान कर रहा है। महिलाएं अपनी आय से बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य उपचार, घरेलू आवश्यकताओं एवं त्यौहारों के खर्चों को सहजता से पूरा कर रही हैं। समूह की महिलाएं मासिक अंशदान के माध्यम से आपसी सहयोग, ऋण व्यवस्था और सामाजिक सहभागिता को भी मजबूत कर रही हैं।
हरिबोल स्व सहायता समूह की उपलब्धियों को राष्ट्रीय स्तर पर भी सराहा गया है। वर्ष 2008 में फिलिप्स बहादुरी पुरस्कार प्राप्त करने के साथ ही भारतीय जनजातीय सहकारी विपणन संघ (ट्राइफेड), भारत सरकार द्वारा वर्ष 2020-21 में वनधन विकास केंद्र, डोंगानाला को राष्ट्रीय स्तर पर अधिकतम प्रकार के वनोत्पाद निर्माण एवं विपणन हेतु प्रथम पुरस्कार तथा अधिकतम विक्रय हेतु द्वितीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया, केंद्रीय मंत्री अर्जुन मुंडा द्वारा प्रदान किया गया।
हरिबोल स्व सहायता समूह की यह सफलता इस बात का सशक्त प्रमाण है कि जब महिलाओं की पारंपरिक जानकारी को आधुनिक प्रसंस्करण और विपणन से जोड़ा जाता है, तब वनोपज न केवल आजीविका का साधन बनते हैं, बल्कि ग्रामीण विकास और महिला सशक्तिकरण की मजबूत नींव भी तैयार करते हैं।

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