
RKTV NEWS/बादल सरोज 07 नवंबर।1 नवम्बर को रामलीला मैदान में हुयी इंडिया ब्लॉक के कोई 20 दलों और लोकतंत्र हिमायती नागरिकों की साझी रैली का देश की राजनीति और जनता पर कितना असर हुआ है, इसकी फौरी नाप जोख करनी हो, तो सबसे कारगर पैमाना है सत्तासीनों की खीज, बौखलाहट और भड़भड़ाहट!! धक्का इतने जोर का लगा है कि किस-किस कोण से संभलें, किस कोने को संभालें, इसका सपड़ा ही नहीं बाँध पा रहे हैं। कभी उत्तर की हांकते हैं, तो कभी दक्षिण की बांचते हैं। उनकी स्थिति उस भीगी बिल्ली जैसी है, जो खिसियाई हुई है और खम्भा नोंच रही है।
एक नवम्बर की दिल्ली रैली की धमक दूर तक हुई है। देश के साथ-साथ दुनिया भर के मीडिया ने इसे जितनी प्रमुखता से लिया, उतनी ही प्रमुखता के साथ ज्ञानेश कुमार की वोट चोरी और उसके सरपरस्त नरेन्द्र मोदी की दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के साथ की जा रहे ठगी की खबरें दुनिया भर में पहुंची। बहुतेरे देशों की कुल जमा आबादी भी जितनी नहीं हैं, उससे कहीं ज्यादा – 13 करोड़ 37 लाख – मतदाताओं के नाम कथित विशेष गहन पुनरीक्षण में वोटर लिस्ट से उड़ाये जाने की हरकत जितनी हिन्दुस्तानियों को चौकाने वाली लगी, उतनी ही दुनिया को भी लगी। इसके लिए अपनाए गए छल, बल, धूर्त कौशल की खबरें भी उनके पास तक पहुंची।
रामलीला मैदान में हुए भारतीय राजनीति के इस इन्द्रधनुषी समावेश के खिलाफ शुरुआत रैली के होने के पहले ही कर दी गयीं। आरएसएस के व्यापारी प्रकोष्ठ के चंगू-मंगुओं की तरफ से त्यौहार के पहले होने वाले आन्दोलन प्रदर्शनों से व्यापार को होने वाले नुक्सान का कोहराम बरपाया गया। हद यह थी कि यह हल्ला ब्रिगेड उस कनाट प्लेस के व्यापारियों की थी, जिनकी दुकानों को जून, जुलाई और अभी अक्टूबर में खुद मोदी-शाह की दिल्ली पुलिस ने बंद करवा दिया था, ताकि आन्दोलनकारी युवा नाश्ते और खाने तक के लिए मोहताज हो जाएँ। व्यापारियों को होने वाले नुकसान की गप्पें भी बढ़चढ़ कर हांकी गयी। इसके 10 से 12 हजार करोड़ रुपये का होने का दावा किया गया, जब कि साल भर पहले दिल्ली की रोजाना की जीएसडीपी महज 3,300 करोड़ रुपये की थी और हर व्यापारी जानता है कि इस बीच व्यापार घटा ही है। स्यापा जिन बाजारों के बंद होने से हुए नुकसान का किया गया, उनमें से अधिकाँश रविवार को बंद रहते हैं। जो कुछ लाख लोग रैली के लिए दिल्ली आये थे, उनके द्वारा खरीदारी करने और इस जमावट के चलते फुटकर व्यवसाय के बढ़ने की खबरों के बावजूद भाजपा कुनबा व्यापार को लोकतंत्र के ऊपर रखने की जो नयी वर्तनी गढ़ रहा है, उसका निशाना कारोबार बढ़ाना नहीं, उसके बहाने जनता के प्रतिरोध पर अंकुश लगाना है।
रैली के उत्साह से डरी, खिसियानी बिल्ली ने दूसरी म्याऊँ अपने स्वाभाविक सुर – विभाजनकारी सुर – में की और उसे अचानक याद आया कि एक नवम्बर तो चौरासी के सिख नरसंहारी दंगों का दिन है। पंजाब में होने वाले चुनावों की निकटता के हिसाब से भी यह संयोग काम का लगा और खुद अमित शाह ने इसे लेकर कुछ इस तरह सवाल उठाना शुरू कर दिया, जैसे वे इस तरह के दंगों के मामले में एकदम स्वच्छ, धवल, शांति कपोत हों। गुजरात और बाकी सब यहाँ न भी लें, तो वे यह भी भूल गए कि दिल्ली में हुए सिखों के नरसंहार में सिर्फ कांग्रेस ही नहीं थी, संघ के लोग भी थे। उस जमाने में इनके चार-पांच बड़े नेताओं में से एक, ताउम्र संघ प्रचारक रहे नाना जी देशमुख ने तो इस नरसंहार को ‘न्यायोचित’ – जस्टीफ़ाइड – बताया था। उनके 8 नवम्बर 1984 को लिखे दस्तावेज ‘आत्म-मंथन के क्षण’ – मोमेंट्स ऑफ़ सोल सर्चिंग – में कहा गया है कि सिखों का नरसंहार असामाजिक तत्वों या सुनियोजित गिरोह का काम नहीं था, बल्कि यह इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हिंदुओं के भीतर उपजी नाराजगी और गुस्से का स्वाभाविक परिणाम था। इसमें खुद सिखों को ही जिम्मेदार ठहराने की हद तक जाकर और भी अनेक बातें कहीं गयी हैं। इस दस्तावेज को सबसे पहली बार 25 नवंबर, 1984 को जॉर्ज फर्नांडिस के सम्पादन में निकलने वाले हिंदी साप्ताहिक “प्रतिपक्ष” में ‘इंदिरा कांग्रेस-आरएसएस मिलीभगत’ के शीर्षक से छापा गया था।
चौरासी का सिख नरसंहार भारतीय इतिहास पर एक धब्बा है। इस पर बाकियों की माफियाँ आ चुकी हैं, किन्तु संघ-भाजपा ने नाना जी देशमुख की राय से न तब पल्ला झाड़ा था, न आज। माफ़ी की बजाय इतने भयानक विचार रखने वाले को भारत रत्न से और अलंकृत कर दिया। अब ऐसे पुरखों की बोई फसल पर इतराने वाले भाजपाई पंजाब चुनावों को देखते हुए सिखों के झूठे हमदर्द बनने का दिखावा कर रहे हैं। पाखंड की पराकाष्ठा यह है कि इसकी अगुआई उन्होंने जेफरी एप्सटीन जैसे पिशाच के हमजोली रहे हरदीप सिंह पुरी को सौंपी हुई है।
कुनबे ने रैली में हाजिरी न होने की गप्प उड़ाने और गोदी मीडिया से उसे दोहरवाने की तिकड़म से इसके फ्लॉप होने की धारणा बनाने की असफल कोशिश की : मगर दिल्ली ही नहीं, देश की जनता देख चुकी थी कि मैदान में पानी भरवाए जाने की शर्मनाक साजिश के बाद भी जितने लोग मैदान में थे, उतने ही उसके बाहर थे। लाखों लोगों का सैलाब गोदी चैनलों के इंकार से अनदेखा नहीं हो जाता। सारे दांव न चलते देख भाजपा ने ‘हमसे हमी को चुरा लो’ वाले फ़िल्मी गाने के अंदाज में “लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ” अभियान शुरू कर दिया। बात मजेदार है। जिसे वह दुनिया का सबसे ताकतवर नेता मानती है, उसके प्रधानमंत्रित्व में, जिसे पृथ्वी का सबसे बड़ा ‘स्वयंसेवी’ संगठन बताती है, उस राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रभुत्व और वर्चस्व वाली सरकार के होते हुए खुद सरकारी पार्टी लोकतंत्र के खतरे में होने और अराजकता स्थापित हो जाने का शोर मचाये : यह अक्खा दुनिया में पहले कभी नहीं देखा-सुना गया। मगर भाजपा अपनी मिसाल आप है – सो दुनिया को ऐसा भी करके दिखा दिया ।
एक नवंबर को दिल्ली में जनता की तानाकशी और छीछालेदर वाली पदयात्रा से इसकी शुरुआत हुई। इसी दिन कई शहरों में भी कार्यक्रम किये गए। अगले दिन खुद अमित शाह हैदराबाद में लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओं की पदयात्रा में हाथ उठाकर नारे लगाते नजर आये। पिच्चर अभी बाकी है। 4 नवंबर को चंडीगढ़ में “जख्म 84 दे” नाम से विशेष सिख सम्मेलन हुआ : यहीं हुआ। जहां सिख नहीं हैं, वहां सिखों से क्या काम? उत्तर प्रदेश में तीन दिनों में छह बड़ी पदयात्राओं का कार्यक्रम बना, इनमे जेपी नड्डा, शिवराज सिंह चौहान, नितिन नवीन, केशव प्रसाद मौर्य, ब्रजेश पाठक और योगी आदित्यनाथ हैं – सिक्ख नहीं हैं। बाकी राज्यों के लिए भी घोड़े खोल दिए गए हैं। कारकून काम पर लगा दिए गए हैं। भाजपा अध्यक्ष के दावों को माने, तो इस अभियान के तहत पार्टी कार्यकर्ता गांवों और घरों तक जाकर विपक्ष द्वारा लोकतंत्र पर खड़े किये जा रहे खतरे और ‘अराजकता’ का मुकाबला कर रहे हैं।
इधर प्रमाणों के साथ सिर्फ विपक्ष ही नहीं, मीडिया द्वारा भी उठाये जा रहे सवालों से देश भर में अराजकता व्याप्त हो जाने का हौआ खड़ा किया जा रहा है। उधर खुद अमित शाह की नाक के नीचे ऐन पुलिस कमिश्नर के दफ्तर में घुसकर एक सैकड़ा से ज्यादा पुलिस वाले एक एसीपी की अगुआई में प्रदर्शन कर रहे थे। इससे बड़ी अराजकता और क्या हो सकती है कि जो दिल्ली पुलिस जनता के प्रदर्शनों से निर्ममता से निबटने के लिए कुख्याति कमा रही है, उसी के वर्दीधारी स्वयं प्रदर्शन करने पर आमादा हो जाएँ। इस असाधारण और असामान्य घटना के क्या और कैसे में जाने से ज्यादा जरूरी है, इसके ‘क्यों’ को समझना। ऐसा नहीं है कि पुलिस ने पहली बार ऐसा किया हो, इसके पहले भी 60 और 70 के दशकों में पुलिस के जवान सड़कों पर उतरे हैं। मगर तब की और अब की वजहों में जो गुणात्मक अंतर है, वह विचारणीय है। पहले जब ऐसा हुआ, तो मुद्दे कम वेतन, अफसरों की बेगार और अत्याचार, असुरक्षित सेवा शर्तों के चलते बड़े अफसरों का जुल्म और अत्याचार हुआ करते थे। इस बार एसीपी ने जिन मांगों को सूत्रबद्ध करके रखा है, वे ड्यूटी के दौरान बर्ताब के मामले में निर्बाध छूट और किसी भी तरह की जिम्मेदारी या उत्तरदायित्व से लगभग अभयदान की मांग करती हैं।
यह सिंघमगीरी किसी बड़े माफिया या सरगना के खिलाफ नहीं दिखाई गयी। मामला एक छोटे से तबादले का था, जो किसी वकील पर हमले के बाद आपत्ति दर्ज कराने गए वकीलों को धमकाने के लिए कथित रूप से रिवाल्वर लहराने पर हुआ था। तबादला – जो अनुशासनात्मक कार्यवाही नहीं मानी जाती – भी स्वीकार न करने की यह हेंकड़ी जंतर मंतर पर कुछ पुलिस अफसरों द्वारा युवतियों, यहाँ तक कि महिला पत्रकारों तक के साथ कैमरों के सामने सरेआम जघन्य आचरण करने के बाद भी साफ़ बच जाने की ताजा घटनाओं से आई है। कील ठुकी लाठियां जेन-जी के युवाओं के ताजा खून का स्वाद चख चुकी हैं। अब उन्हें यही छूट हर जगह चाहिए। यह एक ज्यादा ही खतरनाक संकेत है : लोक की छाती पर पहले से ही खड़े तंत्र के हाथ में लाठी को छुट्टा छोड़ने की स्थिति किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार नहीं की जा सकती। अपनी ही पुलिस के एक हिस्से की इस कारगुजारी पर खुद को जूनियर सरदार मानने वाले गृह मंत्री का कोई बयान अभी तक देखने में नहीं आया। तानाशाह और फासिस्ट अमूमन वर्दियों के खिलाफ नहीं बोलते – नेकरिया पलटन तो कभी नहीं बोलती।
कुल मिलाकर यह कि रामलीला मैदान लोकतंत्र को सीमित, संकुचित और बाधित करने की जिन आशंकाओं के खिलाफ गूँज रहा था : मतदान के अधिकार से लेकर अभिव्यक्ति और जीवन जीने के अधिकार पर मंडराते खतरों और संविधान की ओर बढ़ते भेड़ियों की कदमचाल की बात कर रहा था : उन्हें असलियत बनाने की दिशा में सत्ता की सारी भुजाएं बघनखे पहन रही हैं। सरकार जंतर मंतर प्रतिबंधित करने के बाद रामलीला मैदान में पानी भरकर कीच बढ़ा रही थी। कनखजूरे जलूस सभाओं पर रोक के बहाने उपलब्ध करा रहे थे। न्यायपालिका ‘प्रोटेस्ट इकोनोमी’ के सिद्धांत गढ़ने के साथ-साथ जनता के ऊपर मुनाफे को रखने के फैसले तक सुना रही थी। सीजेआई की बेंच ने आन्दोलनकारियों को भी पक्षकार बनाने की सलाह दे डाली, तो जस्टिस जे. विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की पीठ ने फ्रांस की महारानी मैरी एंटोनेट याद दिला दी। इनके सामने जब याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि : “मी लॉर्ड, दिवाली और छठ के त्यौहारों के सीजन में हवाई जहाजों का किराया 700% तक बढ़ गया है। आज के समय में हवाई यात्रा एक जरूरी सेवा बन चुकी है, इसलिए किराए में इतनी बेतहाशा बढ़ोतरी संविधान के अनुच्छेद 14 में लिखे समानता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है।” तो जस्टिस जे. विक्रम नाथ का जवाब था : “हवाई यात्रा मत कीजिए।“ इसके बाद अगला केस सुनने आगे बढ़ गए ।
दिलचस्प बात यह है कि इसी व्यापक मुद्दे पर पहले सुनवाई करते हुए खुद इन्हीं जस्टिस विक्रम नाथ ने त्योहारों के समय यात्रियों के शोषण पर चिंता जताई थी और केंद्र सरकार व विभाग से जवाब मांगा था। उन्होंने तब अनियंत्रित किराए को लेकर कहा था कि “हम खुद भी इसके भुक्तभोगी हैं”। लेकिन इस बार जो कहा, वह ठीक उल्टा कहा। उनके इस बदले रुख को देखकर रामलीला मैदान की रैली की खबर सुनाने वाले उस एंकर की मीम याद आ गयी, जो पहले बुलेटिन में रैली में भारी भीड़ की बात करता है, दूसरी में रैली के फ्लॉप होने की!! इन दोनों खबरों के बीच असली सुख पेटीएम की घंटी देती है।
सार यह है कि हुक्मरानों के इरादे साफ़ हैं। जैसे-जैसे रंगाई-पुताई उतर रही है, वैसे-वैसे असलियत उभर रही है। जितना-जितना नख से शिख तक कांप रहे हैं, उतना-उतना दांत और नाखून पैने कर रहे हैं। उधर उनके इरादे साफ़ हैं, तो इधर जन के इरादे भी लगातार मजबूत भी हो रहे हैं, व्यापक भी : 1 नवम्बर को रामलीला मैदान में इन्ही इरादों की अनुगूंज हुई, जो आने वाले दिनों में और भी अधिक जोर से देश भर में प्रतिध्वनित होगी। इस दिन के मैदान का प्रतिनिधि संदेश उसमें दिए गए भाषण, उनमें सुनाये गए मुहावरों में नहीं है, उसके समावेश और उसमे शामिल अवाम के प्रोफाइल की चार विशिष्टताओं में है। ये भीड़ उनकी थी जो आये थे, लाये नहीं गए थे। ये नेताओं का हुजूम नहीं, मेहनती अवाम और सजग नागरिकों का जमाव था। ऐसा जमाव जिसमें समाज के सभी तबकों का जुड़ाव था और गौरतलब है कि इसका 90 से 95 फीसद हिस्सा उन हिंदी प्रदेशों से था, जिन्हें भारतीय राजनीति के ह्रदय की धड़कन माना जाता है, जिसके दिमाग को हर लेने की हरचंद साजिशें इस बीच की जाती रही हैं। इन सारी साजिशों से पार पा लेने के तेवरों के साथ वह आया था।
सबसे बढ़कर यह कि रामलीला मैदान में खड़े होकर यह सिर्फ इधर-उधर की बात नहीं कर रहा था, बल्कि सीधे राजनीति के कुरुक्षेत्र में शंखनाद कर रहा था। कुनबे के ख़ास वफादार पत्रकार प्रभु चावला ने 1 नवम्बर 26 की तुलना 25 जून 1975 की रैली से की है। उनका मंतव्य क्या था, यह वे जाने, मगर यह तुलना आशंकाओं और संभावनाओं दोनों की ताईद करती है । इक्यावन वर्ष पहले की सभा के बाद देश ने इमरजेंसी और उसके बाद आया लोकतांत्रिक स्फोट, दोनों देखे थे। इस बार आशंकाओं की तुलना में संभावनाएं ज्यादा हैं : इसीलिए सिंहासन पर बैठे कारपोरेट के हुजूरियों की घबराहट भी ज्यादा है।

