
आरा /भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)02 फरवरी। रविवार को स्थानीय चंदवा के सामुदायिक भवन में रविदास समाज की ओर से संत शिरोमणि गुरु रविदास की जयंती विधिवत पूजा – अर्चना कर आयोजित की गई।सर्वप्रथम धीरज कुमार राम और राहुल कुमार की अगुआई में रविदास जी की सामूहिक पूजा – अर्चना की गई और आरती उतारी गई। तदोपरांत देवी दयाल राम की अध्यक्षता में सभी भक्तजनों ने संत शिरोमणि गुरु रविदास के फोटोचित्र पर माल्यार्पण एवं पुष्पांजलि अर्पित की ! उनकी जय जयकारा हुआ। मन चंगा, तो कठौती में गंगा ! जात- पात पूछे ना कोई , हरि के भजे से हरि के होई! के नारे लगाए गए ! कई भक्तजनों द्वारा उनकी जीवनी ,व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाले गए। शिवनारायणी भजन गाया गया। देवी दयाल राम ने संत के दोहा – चौपाई को भजन के स्टाइल में यथा संत कचहरी अमिट गुण , वरण वरण सभ लोग ,सकल समाज के बंदगी ,जो जस लायक होय ! सन्त शिरोमणि गुरु रविदास जी का जन्म उतर प्रदेश के काशी – बनारस के निकट शिर गोवर्धनपुर गांव में सन 1450 ई. के फरवरी में माघ पूर्णिमा के दिन हुआ था। आज तक उनका नियत जन्म तिथि और वर्ष स्पष्ट नहीं हुआ। उनके पिताजी का नाम संतोखी दास उर्फ रघु और माता का नाम घुरबिनीया उर्फ कलसी देवी था। उनकी शिक्षा दीक्षा और दैनिक जीवन आध्यात्मिक था। उनके परम गुरु महाज्ञानी कबीर थे । उन्होंने समाज में जातीय और छुआछूत के भेद – भाव,धर्मांधता, अंधविश्वास ,पाखंड को मिटाने के लिए वैचारिक संघर्ष किया था। वे मानवतावादी और समतामूलक समाज के निर्माण करना चाहते थे! उनकी सोच थी कि जन्म और कर्म से कोई उच्च और नीच जाति नहीं होती है। कर्म से केवल जाति का वर्गीकरण होता है ,छुआछूत का भेद -भाव नहीं। उन्होंने अपने जीवन काल के दौरान सत्य और कर्म का पालन किया।वे कच्चे चमड़े के जूते- चप्पल के निर्माण और मरम्मत करते और बिक्री करते थे। वे बिक्री के आधे रुपए – पैसे को दीन – दुखियों की सेवा में खर्च कर देते थे। वे दोहा – चौपाई , भजन – कीर्तन के महान मौखिक ज्ञाता थे। उनका जीवन सादा और उच्च विचारका था। सभी को संत शिरोमणि गुरु रविदास जी से प्रेरणा लेकर अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहिए!सभा का संचालन राहुल राम और धीरज कुमार राम ने किया । सभा में दीपू राम , कुंवर दयाल राम , विशाल कुमार , नीरज कुमार , राजेंद्र राम ,पंकज कुमार ,काशी राम , रवि राम वगैरह और महिलाएं ,बच्चे – बच्चियां उपस्थित थे।
