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भोपाल:स्टेट बैंक साहित्य एवं कला परिषद भोपाल के तत्वावधान में सुरेश पटवा की तीन किताबों का लोकार्पण।

भोपाल/ मध्यप्रदेश (मनोज कुमार प्रसाद)27 दिसंबर। शुक्रवार को स्टेट बैंक साहित्य एवं कला परिषद भोपाल के तत्वाधान में दुष्यंत संग्रहालय में गोकुल सोनी की अध्यक्षता, डॉक्टर मोहन तिवारी आनंद के मुख्य आतिथ्य और डॉक्टर राजेश श्रीवास्तव के सारस्वत आतिथ्य में सुरेश पटवा की “हिंदी सिनेमा का स्वर्णयुग (कालजयी कलाकारों की दास्तान), सरोज लता सोनी की “साथ कहाँ तक निभाओगे” और डॉक्टर रेणु श्रीवास्तव की “बुंदेली गीता” का लोकार्पण संपन्न हुआ। संगीता भरद्वाज के सरस्वती वंदना एवं अरुण गुप्ता के स्वागत उद्बोधन पश्चात विद्वान पत्रकार लेखक विनोद नागर ने जेजेएनएफ सिनेमा का स्वर्ण युग सीरीज की दूसरी किताब कालजयी कलाकारों की दास्तान की समीक्षा प्रस्तुत करते हुए इसे एक शोध परक किताब बताया। उन्होंने कहा कि सुरेश पटवा की हिंदी सिनेमा के स्वर्णयुग सीरीज में तीन किताबें क्रमशः स्वर्णयुग के निर्माता – निर्देशक, कालजयी कलाकारों की दास्तान और स्वर्णयुग की स्वर लहरियां नाम से प्रकाशित हुई हैं।
साधना शुक्ला ने सरोज लता सोनी की पुस्तक “साथ कहाँ तक निभाओगे” और डॉक्टर मोहन तिवारी आनंद ने डॉक्टर रेणु श्रीवास्तव की “बुंदेली गीता” पर समीक्षात्मक टिप्पणी प्रस्तुत कीं। तीनों लेखकों ने पुस्तक के अंश पढ़े और रचनाकर्म पर प्रकाश डाला।
सुरेश पटवा ने बताया कि हिंदी सिनेमा ने हिंदी भाषा के प्रचार प्रसार में जो भूमिका निभाई है। उसी से प्रेरित होकर उन्होंने हिंदी सिनेमा के स्वर्ण युग पर तीन किताबें लिखी हैं। विनोद नागर ने हिंदी सिनेमा पर लोकार्पित किताब पर समीक्षात्मक टिप्पणी करते हुए कहा कि सिनेमा का एक शास्त्रीय स्वरूप भी है जिसमें सामाजिक सरोकार सन्निहित है। यह केवल मनोरंजन का साधन भर नहीं है। इसे इसके कलात्मक स्वरूप में भी देखा जाना चाहिए।
सरोज लता सोनी ने लेखकीय वक्तव्य में कहा कि उनका काव्य संग्रह सामाजिक समरसता तथा राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत है। यह कृति देश के सैनिकों को समर्पित है।
साधना शुक्ला ने “साथ कहाँ तक निभाओगे” की समीक्षा में कहा कि एक उत्तम कृति के लिए लेखिका को बधाई। उन्होंने अपने भावों को भारत की अस्मिता और आदर्श को नए स्वरूप में प्रस्तुत किया है। उन्होंने बुंदेली गीता रूप में स्थानीय बोली में अनोखी पुस्तक लिखी है। जो बुंदेलखंड में निश्चय ही बहुत लोकप्रिय होगी।
डॉक्टर रेणु श्रीवास्तव ने अपनी बात बुंदेली बोली में रखते हुए कहा कि भक्ति साहित्य पर लिखते समय भगवान राम को बुंदेली बोली में लिखा है और अब भगवान कृष्ण को बुंदेली बोली में प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इस तरह यह किताब अस्तित्व में आई है।
इस अवसर पर अध्यक्ष की आसंदी से बोलते हुए गोकुल सोनी ने कहा कि तीनों कृतियाँ सामयिक और सामाजिक रूप से उपयोगी हैं। साथ कहाँ तक निभाओगे कविता में करुणा दया और संवेदना का समुचित समावेश है। बुंदेली गीता स्थानीय बोली में अनोखी किताब है। हिंदी सिनेमा का स्वर्ण युग लोक जीवन को साहित्य से जोड़कर किस्से कहानियों के माध्यम से सिनेमा का इतिहास लिखने का उत्तम प्रयास है।
डॉक्टर मोहन तिवारी आनंद ने बुंदेली गीता और अन्य कृतियों की सराहना करते हुए उत्कृष्ट सृजन निरूपित किया। उन्होंने गीता को बुंदेली में लिख कर एक नया आयाम स्थापित किया है।
डॉक्टर राजेश श्रीवास्तव ने “बुंदेली गीता और साथ कहाँ तक निभाओगे” और हिंदू सिनेमा के स्वर्ण युग पर बात करते हुए कहा कि ये सभी अपने आप में अनोखी कृतियाँ हैं। बुंदेली गीता पर अलग से चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने जयंत भारद्वाज की कलात्मक अभिरुचियों को रेखांकित करते हुए उनसे मिमिक्री पेश करने का आग्रह किया। जिसे भारद्वाज ने बखूबी निभाया। कार्यक्रम का सरस संचालन जयंत भारद्वाज ने किया। स्वागत उद्बोधन अरुण गुप्ता ने और आभार प्रदर्शन यशवंत गोरे ने किया।

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