वर्षों से बिना नाम के बुनती रहीं महिलाएँ आज बनीं GI अधिकृत बुनकर, अब योजनाओं का लाभ लेकर इतिहास रचने को तैयार।
घर की चारपाई से ग्लोबल मार्केट तक: जब प्रशासन ने देखा छुपा हुआ हुनर—तो बदलने की ठानी।
“हम बनाते हैं, पहचान कोई और ले जाता है” — DM की पहल ने दिया बागपत की महिला बुनकरों को न्याय।
एक प्रशासनिक फैसले से शुरू हुआ पुनर्जागरण, मेहनत की रोशनी अब कागज़ पर दर्ज, धागे से बुना आत्मसम्मान।
उम्र भर बुनाई कर भी पहचान नहीं मिली… आज मिला सम्मान और प्रशासन का साथ।
घर–गाँव में छिपी कला को मिला राष्ट्रीय दर्जा, अपने हुनर को नाम देने की लड़ाई जीतीं बागपत की महिलाएँ।
RKTV NEWS/बागपत(उत्तर प्रदेश)07 दिसंबर।जनपद में हैंडलूम उद्योग और पारंपरिक बुनकर संस्कृति को नई पहचान दिलाने की दिशा में जिलाधिकारी अस्मिता लाल ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। शनिवार को खेकड़ा तहसील दिवस के अवसर पर आयोजित विशेष शिविर में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी 70 महिला बुनकरों के बुनकर कार्ड बनवाए गए और जीआई ऑथराइज्ड यूजर पंजीकरण की प्रक्रिया पूर्ण की गई। इस कदम से महिलाओं को आधिकारिक बुनकर की पहचान मिली है और बागपत के हैंडलूम उत्पाद को GI टैग दिलाने की दिशा में मजबूत आधार तैयार हुआ है।
भारत दुनियाभर में 95 प्रतिशत हाथ से बुने कपड़े बनाता है जिसमें 72 प्रतिशत योगदान महिलाएं करती हैं। ये सभी महिला बुनकर वर्षों से अपने घरों में कपड़ा बुनती रही हैं, डिजाइन तैयार करती हैं और धागे का पूरा काम संभालती हैं, लेकिन उनके नाम की कोई आधिकारिक पहचान नहीं थी। बाजार में उनके बनाए उत्पाद किसी और नाम से बिक जाते थे, जबकि मेहनत उनकी होती थी। एक महिला ने कहा, “हम बनाते हैं, मगर हमारा नाम कोई नहीं लेता। हम कलाकार नहीं, बस सस्ते लेबर-मजदूर कहलाते हैं।” इस स्थिति का आकलन कर ही जिलाधिकारी ने स्पष्ट कहा कि यदि कला और मेहनत उनकी है तो पहचान भी उन्हीं की होनी चाहिए। इसी सोच के साथ आज का यह शिविर आयोजित किया गया।
बुनकर कार्ड मिलने से महिलाओं की पहचान अब बाजार तक पहुंचेगी और हथकरघा विभाग की योजनाओं—धागे पर छूट, प्रशिक्षण, लोन, मार्केटिंग सहायता आदि—का लाभ उन्हें सीधे मिलेगा। वहीं मौके पर ही बुनकरों का पीएम जीवन ज्योति बीमा योजना, पीएम सुरक्षा बीमा योजना, हथकरघा बुनकर विद्युत सब्सिडी योजना आदि में पंजीकरण हेतु जानकारी दी गई। महिलाओं ने बताया कि पहली बार उन्हें महसूस हुआ है कि उनका कौशल केवल घरेलू काम नहीं, बल्कि एक सम्मानित पारंपरिक कला है जिसे देश–दुनिया में पहचान मिल सकती है। प्रशासन की इस पहल ने उन्हें आत्मविश्वास और सम्मान दोनों दिया है।
शिविर में कई बुज़ुर्ग महिलाएँ भी मौजूद थीं जो दशकों से बुनाई करती आई हैं। पंजीकरण के समय एक बुज़ुर्ग महिला ने अपने हाथ से बुना दुपट्टा जिलाधिकारी को दिखाते हुए भावुक होकर कहा, “मेरे हाथ कांपते हैं, लेकिन धागा अभी भी मेरा साथ देता है। आज पहली बार लग रहा है कि मेरी कला कहीं दर्ज होगी।” जिलाधिकारी ने मुस्कुराकर कहा, “आपका हुनर बागपत की पहचान बनेगा।” इस संवाद ने शिविर में मौजूद सभी महिलाओं को गर्व और प्रेरणा से भर दिया।
जिलाधिकारी ने इस पूरी पहल को “महिला सम्मान, परंपरा संरक्षण और आर्थिक आत्मनिर्भरता” के संयुक्त मॉडल के रूप में विकसित किया है। बुनकर कार्ड से पहचान मिली, जीआई ऑथराइज़्ड यूजर बनने से कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित हुई और भविष्य में GI टैग मिलने से बागपत हैंडलूम के प्रीमियम बाजारों तक पहुंचने की राह तैयार हुई। यह तीन-स्तरीय मॉडल महिलाओं को दीर्घकाल में एक बड़े आर्थिक परिवर्तन से जोड़ने की क्षमता रखता है।
GI पंजीकरण प्रक्रिया सरल लेकिन महत्वपूर्ण है। इसके लिए फॉर्म GI-3A भरकर मात्र 10 रुपये का शुल्क जमा किया जाता है। आवेदन के साथ यह प्रमाण देना होता है कि उत्पादक संबंधित क्षेत्र में पारंपरिक उत्पाद का निर्माण करता है। यह आवेदन चेन्नई स्थित GI रजिस्ट्री को भेजा जाता है और पंजीकरण 10 वर्षों के लिए मान्य रहता है। प्रशासन ने बताया कि आज किए गए सभी आवेदन निर्धारित राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैयार किए गए हैं।
बागपत प्रशासन इससे पहले जिले के गुड़, रटौल आम और होम फर्निशिंग को GI टैग दिला चुका है। इन उत्पादों को यह पहचान मिलने के बाद उनकी बाजार में मांग बढ़ी है, नकली उत्पादों की रोकथाम संभव हुई है और स्थानीय किसानों व कारीगरों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। खासकर रटौल आम की अंतरराष्ट्रीय मांग ने जिले की कृषि अर्थव्यवस्था को नई मजबूती दी है। अब बागपत की बालूशाही, छुआरे के लड्डू और हैंडलूम को GI टैग दिलाने की दिशा में प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ रही है।
GI टैग मिलने से बागपत हैंडलूम की ब्रांडिंग और मजबूत होगी। स्थानीय स्तर पर यह उत्पाद लंबे समय से पहचाना जाता है, लेकिन GI टैग के बाद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इसे अतिरिक्त विश्वसनीयता मिलेगी। इससे बुनकरों को बेहतर कीमत प्राप्त होगी, नकली उत्पादों पर रोक लगेगी और गुणवत्ता व डिजाइन की विशिष्टता संरक्षित रहेगी। बागपत हैंडलूम की बुनाई, धागे और रंग संयोजन की शैली इसे अन्य क्षेत्रों से अलग बनाती है, जिसे GI टैग कानूनी सुरक्षा और वैश्विक पहचान देगा।
जिला प्रशासन हैंडलूम क्षेत्र को क्लस्टर मॉडल में विकसित करने पर भी काम कर रहा है। इसके तहत विभिन्न ब्लॉकों में बुनकर समूहों को संगठित किया जा रहा है ताकि उन्हें डिजाइन सहायता, गुणवत्ता परीक्षण, धागे की आपूर्ति और मार्केटिंग जैसी सुविधाएँ एक स्थान पर उपलब्ध हों। इससे उत्पादन क्षमता बढ़ेगी और उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार होगा। बागपत में बुनाई का काम पीढ़ियों से चलता आया है और यह सैकड़ों परिवारों की आजीविका का आधार है। यह कदम इस परंपरा को संरक्षित रखने और आधुनिक बाजार से जोड़ने में मदद करेगा।
इस प्रक्रिया से स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को विशेष लाभ मिलेगा। अब वे केवल पारंपरिक मजदूर नहीं, बल्कि GI Registered User के रूप में अधिकृत उत्पादक होंगी। इससे उनके उत्पादों की बाजार विश्वसनीयता बढ़ेगी और आय में सीधी वृद्धि होगी। प्रशासन का मानना है कि यह पहल आने वाले वर्षों में ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक शक्ति बढ़ाने और स्थानीय उद्योग को मजबूत करने में निर्णायक भूमिका निभाएगी।
आने वाले समय में और भी पारंपरिक उत्पादों की पहचान की जाएगी और उन्हें GI टैग प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा, जिससे जिले की सांस्कृतिक और आर्थिक विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिलेगी। यह पहल बताती है कि यदि स्थानीय कला और कौशल को सही नीति और संवेदनशील प्रशासनिक नेतृत्व मिले, तो वह न केवल संरक्षित रह सकता है बल्कि नई आर्थिक शक्ति के रूप में उभर भी सकता है। बागपत की बुनकर महिलाएँ अब इसी नई यात्रा पर आगे बढ़ रही हैं, जहाँ परंपरा सम्मान में बदल रही है और हुनर पहचान बन रहा है।
इस दौरान हथकरघा एवं वस्त्रोद्योग विभाग के पावरलूम निरीक्षक हसीन अहमद भी मौजूद रहे।

