
आरा/भोजपुर ( डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)03 दिसंबर।मोक्षदा एकादशी श्रीमद्भगवद्गीता जयंती पर श्रीसनातन शक्तिपीठ संस्थानम् एवं सनातन-सुरसरि सेवा न्यास द्वारा बड़ी मठिया में आयोजित श्रीमद्भगवद्गीता पाठ तथा विद्वद्गोष्ठी में वक्ताओं ने गीता के सार्वभौम संदेश पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम की अध्यक्षता महंत श्रीरामकिंकर दास जी महाराज ने की। विषय-प्रवर्तन करते हुए संस्थान के अध्यक्ष प्रख्यात भागवत प्रवक्ता आचार्य डॉ भारतभूषण पाण्डेय ने कहा कि महाभारत के भीष्म पर्व में श्रीमद्भगवद्गीता का उपदेश भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया है। महाभारत के रणांगण में दोनों सेनाओं के मध्य में रथ पर विराजमान अर्जुन ने स्वजनों को युद्ध का अभिलाषी देखा। उन्हें विषाद हुआ।भला स्वजनों को मारकर कैसे कोई सुखी हो सकता है! भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि स्वजनों और स्वधर्म में स्वधर्म का पालन ही श्रेयस्कर है। आचार्य ने कहा कि अर्जुन को वर्णसंकरता की चिंता है जबकि भगवान श्रीकृष्ण को कर्मसंकरता की भी चिंता है। उन्होंने कहा कि संपूर्ण उपनिषदों का अमृत श्रीमद्भगवद्गीता है जिसका सार्वभौम और सार्वकालिक महत्व तथा उपयोग है। उद्घाटन भाषण करते हुए हिंदी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष सीनेटर प्रो डॉ बलिराज ठाकुर ने कहा कि गीता मानव जीवन का पाथेय है।यह समाज जीवन के हर पहलू को सुव्यवस्थित करने तथा हर विषाद को हरण करने का सबसे बड़ा विज्ञान है। मुख्य वक्ता डॉ गौरीशंकर तिवारी ने गीता के कुल अठारह अध्यायों का सार बतलाते हुए ज्ञान,कर्म और भक्ति के साधनों का वर्णन किया तथा योगारूढ़ होने का आह्वान किया। मुख्य अतिथि प्रो डॉ नन्दजी दूबे ने कर्मयोग की प्रधानता को रेखांकित करते हुए समाज में शास्त्रोक्त कर्म के पालन पर बल दिया।प्रो डॉ पुष्पा द्विवेदी ने भक्ति और शरणागति को जीवन का मूलमंत्र बताया। अध्यक्षीय उद्बोधन में महंत श्रीरामकिंकर दास जी महाराज ने कहा कि गीता माता की तरह सभी प्राणियों का पोषण करती हैं और मनुष्यों के लिए परम अवलंब हैं।सभी आचार्यों ने मुक्तकंठ से गीता माता की प्रशंसा की है। संचालन सचिव सत्येन्द्र नारायण सिंह, स्वागत भाषण रामप्रकाश पाण्डेय और धन्यवाद ज्ञापन महंत स्वामी अयोध्यानाथ दास जी महाराज ने किया। इस अवसर पर वरीय अधिवक्ता इंद्रदेव पांडेय, विश्वनाथ दूबे, महेंद्र पांडेय, जनार्दन मिश्र, शशिकांत तिवारी, राजेन्द्र राम, ब्रजकिशोर पांडेय, अशोक कुमार, निलेश मिश्र,विनय ओझा, मदनमोहन आदि प्रमुख लोगों ने गीता का पूजन-अर्चन किया।
