शिवाप्पा के रूप में सूर्य प्रकाश ने जीता सबका दिल
खैरागढ़/छग (रवींद्र पांडेय) 10 फरवरी। इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय के नवीन प्रेक्षागृह (परिसर-2) में कल आयोजित ‘छात्र रंग महोत्सव’ के दौरान नाट्य विभाग की नवीनतम प्रस्तुति ने दर्शकों का दिल जीत लिया। सुप्रसिद्ध नाटककार विजय तेंदुलकर द्वारा लिखित नाटक ‘बेबी’ का मंचन किया गया, जिसने अपनी प्रभावशाली प्रस्तुति से सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए। इस नाटक का सफल निर्देशन और परिकल्पना नाट्य विभाग के डॉ. प्रमोद कुमार पांडेय द्वारा की गई। उनके निर्देशन में कलाकारों ने पात्रों को जीवंत कर दिया, जिससे नाटक की गंभीरता और संवेदनाएं दर्शकों तक सीधे पहुंचीं।
महोत्सव के दौरान इस प्रस्तुति को लेकर दर्शकों में भारी उत्साह देखा गया। आलम यह था कि प्रेक्षागृह की क्षमता से अधिक दर्शकों की भीड़ उमड़ी। नाटक के हर दृश्य पर दर्शकों की प्रतिक्रिया सराहनीय रही। नाटक के समापन पर पूरा प्रेक्षागृह तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। दर्शकों ने खड़े होकर (स्टैंडिंग ओवेशन) कलाकारों और निर्देशक का अभिवादन किया। उपस्थित विशेषज्ञों और कला प्रेमियों के अनुसार, यह प्रस्तुति विश्वविद्यालय के नाट्य इतिहास में एक ‘मील का पत्थर’ साबित हुई है।
इस प्रस्तुति का मुख्य आकर्षण सूर्य प्रकाश रहे, जिन्होंने ‘शिवाप्पा’ जैसे अत्यंत कठिन और नकारात्मक चरित्र को अपनी जीवंत कला से मंच पर उतार दिया। अपनी सधी हुई संवाद अदायगी, सशक्त शारीरिक भाषा और प्रभावशाली उपस्थिति से उन्होंने न केवल दर्शकों को सम्मोहित किया, बल्कि उनके भीतर एक खौफ भी पैदा कर दिया। उनके इस जादुई प्रदर्शन ने पूरी रंगशाला को एक अद्वितीय ऊर्जा से भर दिया।
दिव्या राई ने ‘बेबी’ के किरदार में फूंकी जा
शीर्षक पात्र ‘बेबी’ की भूमिका में दिव्या राई ने अपने सशक्त अभिनय का परिचय दिया। उन्होंने एक शोषित स्त्री की व्यथा और मासूमियत को इतनी मार्मिकता से पर्दे पर उतारा कि दर्शक अंत तक भावुक नजर आए। दिव्या ने न केवल इस किरदार को निभाया, बल्कि इसे जिया, जिससे वे दर्शकों पर अपनी एक गहरी छाप छोड़ने में सफल रहीं। बेबी के भाई ‘राघव’ के रूप में दीपेश कहार ने एक बेबस भाई की पीड़ा को बखूबी उभारा। उनकी संवाद अदायगी और हाव-भाव में वह लाचारी स्पष्ट दिखी, जो कहानी की मांग थी। वहीं, पप्पू कुमार प्रकाश ने ‘कर्वे’ के चुनौतीपूर्ण चरित्र को पूरी परिपक्वता के साथ निभाया। उनके सधे हुए अभिनय ने नाटक की गंभीरता को और बढ़ा दिया। पूरी प्रस्तुति के दौरान सभी कलाकारों के बीच एक बेहतरीन सामंजस्य देखने को मिला। कहानी के उतार-चढ़ाव को कलाकारों ने अपनी कला से इस तरह पिरोया कि दर्शक पूरी तरह कहानी से जुड़े रहे।
तकनीक, संगीत और निर्देशन के संगम से जीवंत हुए विजय तेंदुलकर के शब्द
नाटक को तकनीकी रूप से भव्य बनाने में अयान रजा की प्रकाश व्यवस्था का विशेष योगदान रहा, जिसने दृश्यों की गंभीरता को द्विगुणित कर दिया। अनुराग प्रकाश पंडा द्वारा निर्मित सेट डिजाइन ने नाटक के परिवेश को यथार्थवादी बनाया, जबकि तकनीकी सहायक के रूप में मनमोहन ने पर्दे के पीछे से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नाट्य विभाग की इस प्रस्तुति ने ‘छात्र रंग महोत्सव’ की गरिमा को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है। डॉ. प्रमोद कुमार पांडेय के संगीत और निर्देशन ने विजय तेंदुलकर के शब्दों को जिस प्रकार मंच पर पिरोया, उसकी सराहना पूरे विश्वविद्यालय परिसर में होती रही।

