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छठ और मानव सभ्यता की पर्यावरणीय स्मृति।

परिचय दास

RKTV NEWS/परिचय दास ,27 अक्टूबर।छठ केवल एक पारंपरिक पर्व नहीं है, वह मनुष्य और प्रकृति के बीच संवाद की वह अद्भुत भाषा है जिसमें श्रद्धा, अनुशासन और सौन्दर्य तीनों एक साथ उपस्थित हैं। आधुनिक युग की तेजी, तनाव और विस्मृति के बीच यह पर्व हमें धीमे चलना, ठहरना और अपने भीतर के सूर्य से मिलना सिखाता है। आज जब विज्ञान ने सूर्य की ऊर्जा को गणना और प्रयोगशाला के सूत्रों में बाँध लिया है तब भी लोक उसे प्रकाश का देवता मानकर पूजता है। यही वह विरोधाभास है जो आधुनिकता के बीच आस्था को जीवित रखता है।
समकालीन पश्चिमी चिंतन ने प्रकृति से मनुष्य के संबंध को तकनीकी और उपयोगितावादी रूप में देखा है। औद्योगिक युग के बाद से मनुष्य ने सूर्य को ऊर्जा स्रोत के रूप में पहचाना, परंतु भोजपुरिया लोक ने उसे आत्मा के रूप में जाना। पश्चिम में जब सौर ऊर्जा को ‘सस्टेनेबल एनर्जी’ कहा गया, तब बिहार-पूर्वांचल की स्त्रियां सदियों से सूर्य को अपने शरीर और आत्मा के संतुलन का आधार मानकर अर्घ्य दे रही थीं। विज्ञान और लोकविश्वास यहाँ किसी संघर्ष में नहीं बल्कि एक गहरे सम्मिलन में हैं।
छठ की प्रार्थना में जो निस्तब्धता है, वह आधुनिक ध्यान की सबसे सघन अवस्था है। जल में खड़ी स्त्रियाँ केवल सूर्य को नहीं देखतीं, वे अपने भीतर के कंपन को सुनती हैं। यह एक गहरा मनोवैज्ञानिक क्षण होता है, जहाँ शरीर, मन और प्रकृति एक दूसरे में विलीन हो जाते हैं। पश्चिम के मनोवैज्ञानिक कार्ल युंग ने कहा था कि हर संस्कृति के भीतर सामूहिक अवचेतन की एक साझा छवि होती है। सूर्य उसकी सबसे पुरानी, सबसे दीप्तिमान आकृति है। छठ के सूर्य अर्घ्य में वही आद्य प्रतीक जीवित होता है—वह मनुष्य के भीतर के प्रकाश का बिम्ब है।
जब कार्तिक की शाम में घाटों पर डूबते सूर्य की लालिमा फैलती है, तब लगता है जैसे प्रकृति और मनुष्य के बीच की सीमाएँ मिट गई हैं। इस दृश्य में किसी भी प्रकार की भव्यता नहीं होती, फिर भी यह सबसे विराट अनुभव है। हजारों स्त्रियाँ जल में खड़ी होकर उस क्षण में जैसे एक सामूहिक ध्यान साध रही होती हैं। यह अनुभव आधुनिक मनोविज्ञान की ‘कलेक्टिव माइंडफुलनेस’ की तरह है—एक सामूहिक शांति, जिसमें हर व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत व्यथा छोड़कर एक व्यापक चेतना में विलीन हो जाता है।
आधुनिक समाज में जहाँ व्यक्ति निरंतर विभाजित होता जा रहा है—समय से, समुदाय से, और अपने ही शरीर से—छठ उसे फिर से जोड़ता है। पश्चिम के दार्शनिक हाइडेगर ने कहा था कि मनुष्य का अस्तित्व ‘Being-in-the-world’ है—अर्थात् मनुष्य का होना केवल अपने भीतर नहीं बल्कि संसार के साथ है। छठ इसी ‘साथ होने’ का उत्सव है। जल में खड़ा मनुष्य जब सूर्य को देखता है, तो वह अपने अस्तित्व की सीमाओं से बाहर निकलकर ब्रह्मांड के साथ एक हो जाता है। यह किसी धर्म का नहीं, बल्कि अस्तित्व का अनुभव है।
समकालीन विज्ञान ने सिद्ध किया है कि सूर्योपासना केवल आध्यात्मिक नहीं, शारीरिक रूप से भी उपयोगी है। सूर्य की किरणों से शरीर में विटामिन ~D बनता है, जिससे मनोविकृति, अवसाद और थकान में राहत मिलती है। छठ के उपवास और ध्यान के दौरान जो अनुशासन है, वह शरीर के विषहरण और मन की स्थिरता का कारण बनता है। इस दृष्टि से छठ एक ‘साइको-सोमैटिक हीलिंग’ की प्रक्रिया है—जहाँ मन और शरीर दोनों की शुद्धि एक साथ होती है।
पश्चिमी सभ्यता ने जब जीवन को भोग और उपभोग में बाँट दिया तब छठ ने संयम और सौन्दर्य के बीच एक मध्यम मार्ग प्रस्तुत किया। यह परब न तो तपस्या मात्र है, न उत्सव मात्र। इसमें त्याग और उल्लास दोनों साथ चलते हैं और यही समकालीन मनुष्य की सबसे बड़ी ज़रूरत है—एक ऐसा संतुलन जिसमें न अतिशय त्याग हो, न अतिशय उपभोग। छठ के चार दिनों में जो साधना होती है, वह आधुनिक जीवन की भागदौड़ में खोई हुई आत्मा को फिर से केंद्रित कर देती है।
आज के विश्व में पर्यावरण की चर्चा केवल नीति या शोध का विषय है जबकि छठ उसे जीवन के अभ्यास में बदल देता है। जल की पवित्रता, सूर्य की आराधना, वायु और मिट्टी की सफ़ाई—ये सब पारिस्थितिक चेतना के प्रतीक हैं। आधुनिक पर्यावरण दर्शन कहता है कि पृथ्वी केवल संसाधन नहीं, एक जीवित इकाई है। छठ इस दर्शन को बिना किसी ग्रंथ या शिक्षा के अपने आचरण में जीता है। यही इसे आधुनिक पारिस्थितिक चिंतन से भी अधिक प्रासंगिक बनाता है।
जब भारतीय प्रवासी परिवार लंदन, न्यूयॉर्क या टोक्यो में नदी किनारे छठ मनाते हैं तब वह केवल एक परंपरा नहीं निभा रहे होते—वे आधुनिक वैश्विकता को अपनी लोक-चेतना से रंग रहे होते हैं। यह वह क्षण है जब परंपरा सीमाओं को पार करती है और समकालीन अर्थ ग्रहण करती है। पश्चिम के समाज में जहाँ आस्था और विज्ञान के बीच विभाजन गहरा है, वहीं छठ दोनों को जोड़ने का अद्भुत माध्यम बनता है। यह परब बताता है कि आधुनिकता और अध्यात्म विरोधी नहीं, पूरक हो सकते हैं।
पश्चिमी सौन्दर्यशास्त्र में कला का लक्ष्य ‘सब्लाइम’ यानी उदात्त अनुभव प्राप्त करना है—वह क्षण जब मनुष्य किसी महान और असीम के सामने स्वयं को तुच्छ महसूस करता है। छठ का सौन्दर्य भी वैसा ही है। घाटों पर हजारों दीपों का एक साथ जलना, सूर्य की लालिमा में झिलमिलाता जल और मौन में गूँजता लोकगीत—यह सब मिलकर एक ‘सब्लाइम’ दृश्य रचते हैं, जहाँ सौन्दर्य केवल आँखों से नहीं, आत्मा से देखा जाता है।
छठ में स्त्री का स्वर सबसे प्रमुख है। वह इस परंपरा की वाहक भी है और इसका केन्द्र भी। आधुनिक नारी विमर्श की दृष्टि से यह स्त्री किसी दबाव में पूजा नहीं करती बल्कि अपनी शक्ति और अनुशासन से एक सृजनात्मक कर्म करती है। उसकी साधना, उसकी भक्ति—दोनों उसकी आत्मनिर्भरता के रूपक हैं। यह वही स्त्री है जो सूर्य को अपने श्रम और समर्पण से संतुलित करती है। पश्चिम की नारी-चेतना जहाँ स्वतंत्रता की भाषा में आत्म-सत्ता खोजती है, वहीं छठ की स्त्री संयम में स्वतंत्रता पाती है। वह किसी के लिए नहीं, स्वयं के संतुलन के लिए जल में उतरती है।
समकाल में जब धर्म के अर्थ संकीर्ण हो गए हैं तब छठ पर्व एक ऐसा धर्म रचता है जो किसी संप्रदाय, किसी मध्यस्थता से बंधा नहीं। यहाँ कोई पुरोहित नहीं, कोई मंदिर नहीं—सिर्फ मनुष्य, सूर्य और जल। यह धर्म का लोकशास्त्रीय रूप है, जहाँ हर व्यक्ति खुद अपनी साधना का पुजारी है। यह आधुनिक समाज के लोकतांत्रिक आदर्श के सबसे समीप है, जहाँ समानता, समर्पण और सौन्दर्य तीनों एक साथ उपस्थित हैं।
छठ का सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि वह अपने भीतर समय को स्थिर कर देता है। चाहे गाँव का तालाब हो या शहर की छत, सूर्य एक ही तरह से उगता है, जल एक ही तरह से झिलमिलाता है। इस स्थिरता में ही उसकी आधुनिकता छिपी है—एक ऐसी परंपरा जो परिवर्तन से डरती नहीं, बल्कि उसे आत्मसात करती है।
आधुनिक दर्शन के अनुसार, मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह अर्थ की तलाश में भटकता है। छठ उसे एक अर्थ नहीं, एक अनुभव देता है—ऐसा अनुभव जो मनुष्य को स्वयं से और ब्रह्मांड से जोड़ देता है। सूर्य की किरणें जल पर पड़ती हैं, जल उसकी छवि को धरती तक पहुँचाता है और धरती उसकी गर्मी को जीवन में बदल देती है। यह त्रिकोण उस ब्रह्मांडीय एकता का बिम्ब है, जिसे आज का विज्ञान ‘इकोलॉजिकल सिस्टम’ कहता है और जिसे लोक संस्कृति ‘छठ मइया’ कहती है।
जब अंतिम अर्घ्य के बाद स्त्रियाँ सूर्य की ओर मुख करके हाथ जोड़ती हैं तो वह क्षण केवल पूजा का नहीं, आत्म-स्वीकृति का होता है। वह कहती नहीं पर उनकी दृष्टि में यह अर्थ होता है—कि मैं और प्रकृति अलग नहीं। मैं उसी की संतति हूँ, उसी की धारा में प्रवाहित हूँ। यही छठ का रहस्य है—आधुनिकता के बीच एक ऐसी शांति जो विज्ञान से भी गहरी है और धर्म से भी व्यापक।
इस प्रकार छठ आधुनिक युग की सबसे ललित कविता है—जिसमें श्रद्धा तर्क से मिलती है, आस्था अनुशासन में ढलती है और मनुष्य सूर्य के प्रकाश में स्वयं को पहचान लेता है। यह पर्व स्मृति और चेतना, देह और आत्मा, लोक और विश्व के बीच वह सेतु है जो मनुष्य को एक बार फिर पृथ्वी से जोड़ देता है। जब घाट पर अंतिम दीपक जलता है, तो वह केवल मिट्टी की लौ नहीं होती—वह उस भीतर के सूर्य की झिलमिलाहट होती है जो हर युग में, हर मनुष्य में, फिर से जन्म लेती है।

(लेखक ,नव नालंदा महाविहार विश्वविद्यालय, नालंदा में प्रोफेसर है,संपर्क:मोबाइल~ 996826923,ई मेल parichaydass@rediffmail.com)

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