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बागपत:कम पानी, कम लागत और ज्यादा मुनाफा: जिलाधिकारी की पहल पर बागपत में चिया “सुपरफूड” की बुआई शुरू।

प्रशासन की पहल पर लगी वैज्ञानिक खेती की पाठशाला: पद्मश्री भारत भूषण त्यागी से किसानों ने जाना चिया बीज का महत्व।

बागपत की मिट्टी में चिया का बीज बोकर समृद्ध बनेंगे किसान, पर्यावरण और समाज दोनों को मिलेगा लाभ।

RKTV NEWS/बागपत(उत्तर प्रदेश)30 सितंबर।कम पानी, कम लागत और दोगुना मुनाफा… सुनने में सपना लगता है, लेकिन बागपत में यह सपना चिया बीज की खेती से साकार होने जा रहा है। अब जिलाधिकारी अस्मिता लाल की पहल पर बाजार में 800 रुपये किलो तक बिकने वाला चिया बीज अब बागपत के खेतों में पनपेगा, किसानों की आय और लोगों का स्वास्थ्य दोनों बढ़ाएगा।
आत्मा योजना के अंतर्गत खेकड़ा पाठशाला रोड स्थित बागपत नेचुरल फॉर्म में चिया बीज की खेती का प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें प्रशिक्षक के रूप में पद्मश्री सम्मानित भारत भूषण त्यागी उपस्थित रहे। इस अवसर पर जिलाधिकारी ने स्वयं चिया बीजों की बुआई कर कार्यक्रम की शुरुआत की। किसानों ने उत्साहपूर्वक बुआई देखी और वैज्ञानिक तरीके से खेती की जानकारी प्राप्त की।
प्रशिक्षण में पद्मश्री सम्मानित भारत भूषण त्यागी ने उन्नत बीज चयन, वैज्ञानिक पद्धति से बुवाई, उचित खाद एवं सिंचाई प्रबंधन और कीट नियंत्रण के उपायों पर विस्तार से जानकारी दी। किसानों को यह बताया गया कि चिया की खेती केवल तीन माह में तैयार हो जाती है और इसमें अधिक पानी, कीटनाशकों या उर्वरकों की आवश्यकता नहीं होती। यही कारण है कि यह फसल कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली साबित हो सकती है।
चिया बीज को सुपरफूड कहा जाता है। इसमें ओमेगा-3 फैटी एसिड, फाइबर, प्रोटीन, कैल्शियम और एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। यह हृदय स्वास्थ्य सुधारने, पाचन तंत्र मजबूत बनाने, हड्डियों को ताकत देने, रक्त शर्करा नियंत्रित करने और वजन घटाने में सहायक है। आज की स्वास्थ्य-जागरूक युवा पीढ़ी ऐसे पोषक उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ा रही है। यही कारण है कि चिया बीज की कीमत वर्तमान में 300 से 800 रुपये प्रति किलो तक पहुँच चुकी है और निर्यात की संभावनाएँ भी बहुत प्रबल हैं।
किसानों के लिए यह खेती इसलिए भी लाभकारी है क्योंकि इसमें कम पानी की आवश्यकता होती है, यह फसल जलवायु के अनुकूल है और बाजार में इसकी लगातार बढ़ती मांग है। इस फसल को अपनाने से किसानों की आमदनी बढ़ेगी और वे स्वयं भी स्वास्थ्यवर्धक उत्पादों का लाभ उठा सकेंगे। इसके अलावा, चिया की खेती पर्यावरण के लिए भी सकारात्मक है क्योंकि इसमें रासायनिक कीटनाशकों और उर्वरकों का कम प्रयोग होता है, जिससे मिट्टी और जल प्रदूषण में कमी आती है।
बुआई के लिए आवश्यक शर्तों पर भी विस्तार से प्रकाश डाला गया। किसानों को बताया गया कि चिया की खेती के लिए 20 से 30 डिग्री सेल्सियस तापमान और हल्की भुरभुरी मिट्टी सबसे उपयुक्त है, जिसमें पानी न रुके। बुवाई का सही समय अक्टूबर-नवंबर है और प्रति हेक्टेयर चार से पांच किलो बीज की आवश्यकता होती है। किसान इसे छिटकवां या लाइन में बुवाई कर सकते हैं।
इन्हें हमेशा पानी में भिगोकर ही खाना चाहिए। दही, स्मूदी, दलिया या सलाद में मिलाकर इसका सेवन करना सबसे उपयुक्त माना जाता है। केवल एक चम्मच चिया बीज भी दिनभर के लिए शरीर को पर्याप्त ऊर्जा प्रदान कर सकता है।
जिलाधिकारी अस्मिता लाल ने किसानों से अपील की कि वे कम से कम अपने खेतों के एक हिस्से में चिया बीज की खेती जरूर करें। उन्होंने कहा कि कृषि विभाग और वैज्ञानिक किसानों को हर संभव मार्गदर्शन देंगे। यह पहल न केवल किसानों की आय बढ़ाने में मदद करेगी बल्कि समाज में स्वास्थ्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने का भी मार्ग प्रशस्त करेगी।
यह पहल सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। चिया बीज उत्पादन से किसानों की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ होगी और उनके परिवारों का जीवनस्तर बेहतर होगा। साथ ही उपभोक्ताओं को स्वास्थ्यवर्धक विकल्प मिलेगा, जिससे मोटापा और पुरानी बीमारियों का जोखिम घटेगा। पर्यावरणीय दृष्टि से भी यह फसल टिकाऊ खेती की दिशा में बड़ा कदम है, क्योंकि इसमें कम पानी की आवश्यकता और रसायनों का सीमित प्रयोग होता है।
कार्यक्रम के अंत में यह संदेश दिया गया कि हमें पारंपरिक सोच से आगे बढ़कर नई संभावनाओं की ओर देखना होगा। यदि किसान थोड़ी मेहनत और सही जानकारी के साथ आगे बढ़ें तो चिया बीज की खेती उनके जीवन में क्रांति ला सकती है। जैसा कि जिलाधिकारी ने कहा—“नई सोच, नई खेती — चिया के साथ आगे बढ़ें।”
इस अवसर पर एसडीएम खेकड़ा निकेत वर्मा, कृषि उपनिदेशक विभाति चतुर्वेदी , सहायक आयुक्त सहकारिता इंदू सिंह ,जिला उद्यान अधिकारी निधि सिंह, जिला कृषि अधिकारी बाल गोविंद यादव ,प्रगतिशील किसान कृष्ण पाल सिंह, कृषि विभाग के अधिकारीगण सहित आदि उपस्थित रहे।

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