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भोजपुर:धान की खेती को मत्स्य पालन,वानिकी के साथ जोड़ने की पद्धति इकोलॉजिकल बैलेंस का उत्कृष्ट उदाहरण : डा प्रबुद्ध कुमार मिश्रा

आरा/भोजपुर ( डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)30 सितंबर।27 सितंबर को महाराजा कॉलेज के स्नातकोत्तर भूगोल विभाग द्वारा प्रो. एस.के. सिन्हा स्मृति ऑनलाइन व्याख्यान श्रृंखला के अठारहवें संस्करण का सफल आयोजन किया गया। इस बार इस व्याख्यान का विषय था – “प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन में स्थानीय (इंडिजीनस) ज्ञान प्रणाली का उपयोग”। यह ऑनलाइन आयोजन छात्रों, शोधार्थियों और विभिन्न महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों के शिक्षकों की उल्लेखनीय भागीदारी के साथ संपन्न हुआ।
मुख्य वक्ता के रूप में नेशनल एसोसिएशन ऑफ जियोग्राफर्स, इंडिया (NAGI) के संयुक्त सचिव डॉ. प्रबुद्ध कुमार मिश्रा ( शिवाजी कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय ) ने अपने विचार प्रस्तुत किए। कार्यक्रम के आरम्भ में विभागाध्यक्ष, स्नातकोत्तर भूगोल विभाग तथा इस वेबिनार के संयोजक प्रो. संजय कुमार द्वारा मुख्य वक्ता का स्वागत किया गया और विषय का संक्षिप्त परिचय कराया गया।
अपने व्याख्यान की शुरुआत में डॉ. मिश्रा ने स्थानीय ज्ञान प्रणाली (IKS) के बहुआयामी महत्व को रेखांकित किया, विशेषकर वर्तमान पर्यावरणीय और विकासात्मक चुनौतियों के संदर्भ में बताया कि स्थानीय परंपरागत ज्ञान जैव विविधता संरक्षण, मिट्टी व जल प्रबंधन, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएं, खाद्य सुरक्षा, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक एकजुटता को प्रोत्साहित करता है। उन्होंने सामुदायिक आधारित संरक्षण के कई उदाहरण प्रस्तुत किए। उत्तराखंड में समुदाय आधारित वानिकी प्रबंधन स्थानीय लोगों को प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण हेतु सशक्त बनाता है। सिक्किम और हिमाचल प्रदेश में कुछ जलस्रोत व वनों को पवित्र स्थल मानकर संरक्षित किया गया है। अरुणाचल प्रदेश के अपातानी जनजाति की धान की खेती को मत्स्य पालन एवं वानिकी के साथ जोड़ने की पद्धति को भी उन्होंने इकोलॉजिकल बैलेंस और पोषण सुरक्षा का उत्कृष्ट उदाहरण बताया।
डॉ. मिश्रा ने यह स्पष्ट किया कि परंपरागत रीतियाँ अक्सर धार्मिक रीति-रिवाजों एवं सांस्कृतिक प्रथाओं से जुड़ी होती हैं, जो लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण और स्थानीय पौधों की खेती को बढ़ावा देती हैं।
अपने शोध निष्कर्षों को साझा करते हुए डॉ. मिश्रा ने बताया कि विशेषकर पहाड़ी और सीमांत क्षेत्रों के किसान भूमि संरक्षण के लिए पारंपरिक उपायों पर निर्भर करते हैं। यद्यपि ये पद्धतियाँ प्रभावशाली हैं, किंतु आर्थिक संसाधनों की कमी इनके समग्र प्रयोग में बाधक बनती है। उन्होंने इन मॉडलों को नीति-निर्माण में प्राथमिकता देने और अन्य हिमालयी क्षेत्रों में दोहराने की आवश्यकता पर बल दिया।
इस व्याख्यान में वी.के.एस.यू. एवं अन्य संस्थानों से कई गणमान्य शिक्षकों की उपस्थिति रही, जिनमें डॉ. फौजिया रहमान, डॉ. सदफ़, डॉ. प्रदीप कुमार राय, (वी.के.एस.यू.) डॉ. इंदुबाला श्रीवास्तव ( मगध विश्वविद्यालय )तथा डॉ. हीना सिन्हा ( दिल्ली विश्वविद्यालय ) प्रमुख रहीं।
प्राचार्या प्रो. कनक लता कुमारी ने स्नातकोत्तर भूगोल विभाग के अध्यक्ष तथा इस वेबिनार के संयोजक प्रो. संजय कुमार को वेबिनार के आयोजन के लिए साधुवाद दिया तथा इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि -“इस प्रकार के शैक्षणिक मंच पारंपरिक ज्ञान को समकालीन समस्याओं से जोड़ते हैं और विद्यार्थियों को पाठ्यपुस्तकों से आगे सोचने के लिए प्रेरित करते हैं।” विभागाध्यक्ष एवं कार्यक्रम संयोजक प्रो. संजय कुमार ने कहा कि – “स्थानीय ज्ञान प्रणाली केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, टिकाऊ और क्षेत्रीय समाधान की कुंजी है। यह व्याख्यान विद्यार्थियों के लिए एक गहन दृष्टिकोण लेकर आया है।” समापन टिप्पणी डॉ. द्विपिका शेखर. सिंह (आयोजन सचिव) ने दी, और डॉ. अरबिंद कुमार सिंह (तकनीकी सहयोग) ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया।

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