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भोजपुर:पंडित वज्रभूषण मिश्र”आक्रांत” की 96 वीं जयंती पर “भावांजलि”स्मृति ग्रन्थ का किया गया विमोचन।

आरा /भोजपुर (डॉ दिनेश प्रसाद सिन्हा)27 सितंबर। शुक्रवार को अपराह्न 2.00 बजे होटल ग्रांड, आरा (भोजपुर) में मारुति संस्कृत शोध संस्थान, प्रकाशपुरी, आरा (भोजपुर), के बैनर तले पं० व्रजभूषण मिश्र ‘आक्रान्त’ की 96वीं जयन्ती पर शशि रंजन मिश्र ‘सत्यकाम’ के संपादन में सर्वभाषा ट्रस्ट, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित पण्डितवरेण्य व्रजभूषण मिश्र ‘आक्रांत’ विरचित अव्यवसायिक संस्कृत-हिन्दी-साहित्य संग्रह “भावाजंलि” स्मृतिग्रंथ का विमोचन कार्यक्रम पं० ‘आक्रांत’ के परिजनों यथा मुक्तिनाथ मिश्र, अरविन्द मिश्र, एवं विनीत मिश्र द्वारा आयोजित किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो० महेश सिंह, पूर्व विभागाध्यक्ष, भूगोल विभाग, हर प्रसाद दास जैन कॉलेज, आरा द्वारा की गई।मुख्य अतिथि प्रो० नंद जी दूबे, पूर्व विभागाध्यक्ष, हिन्दी विभाग, वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा (भोजपुर), विशिष्ट अतिथि प्रो० गौरीशंकर तिवारी, सुरेन्द्र सिंह, एवं रामेश्वर मिश्र थे। कार्यक्रम का संचालन कृष्ण गोपाल मिश्र द्वारा किया गया।
कार्यक्रम का शुभारम्भ अध्यक्ष एवं समस्त अतिथि द्वारा दीप प्रज्वलन के पश्चात हनुमंत चित्र एवं स्मृति शेष पं० ‘आक्रांत’ के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित करते हुए किया गया। तत्पश्चात् पूर्णिमा पाण्डेय, सहायक शिक्षिका, श्री जैन बाला विश्राम, आरा द्वारा ‘आक्रांत’ जी रचित ग्रंथ ‘अर्घ्य’ से हनुमदष्टकम् शीर्षक काव्य नमामि वायुनन्दनम्’ का सस्वर पाठ किया गया, कालिन्दी भारद्वाज, सहायक शिक्षिका, संस्कृत, श्री जैन बाला विश्राम, आरा एवं कल्पना भारद्वाज, सहायक शिक्षिका, उच्च माध्यमिक विद्यालय, कुसुम्हा, उदवंतनगर द्वारा स्वागत गान के माध्यम से आगत अतिथियों का स्वागत किया गया, तदुपरांत संयोजक /आयोजक अरविन्द मिश्र, एवं शशि रंजन मिश्र द्वारा मंचासीन समस्त अतिथियों को माल्यार्पण करते हुए अंग वस्त्र द्वारा सम्मानित करते हुए संबंधित स्मृति ग्रंथ को विमोचित किया गया ।
विमोचनोपरान्त प्रथम वक्ता के रूप में रामेश्वर मिश्र द्वारा शिष्यानुभूति अर्पित करते हुए ‘आक्रांत’ जी के पवना मध्य विद्यालय की यात्रा से प्रारंभ कर बेलाउर उच्च विद्यालय, वीरमपुर उच्च विद्यालय होते हुए जैन स्कूल की यात्रा का मार्मिक वृतांत प्रस्तुत करते हुए बताया गया वे एकमात्र शिक्षक थे जहां छात्र अपना नामांकन उस विद्यालय में कराना चाहते थे जहां वे पदस्थापित रहते, द्वितीय वक्ता के रूप में सुरेन्द्र सिंह द्वारा ‘आक्रांत’ जी द्वारा संपादित पत्रिका का ज़िक्र करते हुए पत्रिका के संचालन पर प्रकाश डालते हुए कहा गया कि उस पत्रिका की कुछ अंक आज भी उनके पास धरोहर के रूप में संरक्षित हैं, तृतीय वक्ता के रूप में राजेन्द्र पाठक, पत्रकार, बिहार संस्कृत शिक्षा बोर्ड, बिहार द्वारा अपना उद्गार व्यक्त करते हुए बताया गया कि ‘आक्रांत’जी द्वारा रचित “मारुति संस्कृत अनुवाद सुधा” ने समस्त नवाचार चुनौतियों को खुद में समेट रखा था, संस्कृत को संस्कृत के आक्रांताओं से बचाने के लिए नयी पीढ़ी को आक्रांत बनना पड़ेगा, चतुर्थ वक्ता के रूप में राजीव नयन, पूर्व प्रधानाध्यापक, हर प्रसाद दास जैन स्कूल, आरा एवं स्वतंत्र आंग्ल पत्रकार अपना उद्गार व्यक्त करते हुए साठ के दशक से पारिवारिक घटनाओं से परिचय कराते हुए बताया गया कि स्मृति शेष ‘आक्रांत’ जी के प्रयासों के फलस्वरूप ही रक्षाबंधन के दिन के संस्कृत दिवस के रूप में अवकाश की घोषणा की स्वीकृति प्रदान की गई, पंचम वक्ता के रूप में दीपक वर्द्धन, विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग, वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा द्वारा अपना उद्गार व्यक्त करते हुए वो ऋषि परंपरा के वाहक के रूप में स्वयं में एक ऋषि थे, षष्ठ वक्ता के रूप में श्री पुष्प राज सिंह, अधिवक्ता, उच्चतम न्यायालय, नई दिल्ली द्वारा वर्ष 1999 से स्मृति शेष ‘आक्रांत’ जी के सम्पर्क में आये शिष्यानुभूति को प्रस्तुत करते हुए संस्कृत भाषा की महत्ता पर प्रकाश डाला।, सप्तम वक्ता के रूप में गौरी शंकर तिवारी द्वारा अपने संस्मरण को प्रस्तुत किया गया तत्पश्चात् पूर्णिमा पाण्डेय, सहायक शिक्षिका, श्री जैन बाला विश्राम, आरा द्वारा पुनः स्वरचित कविता “जय मृदुल मनोहर तेजपुजं, पवना के हे विद्वत महान” का सस्वर पाठ किया गया ।
मुख्य अतिथि नंद जी दूबे द्वारा उगार व्यक्त करते हुए स्मृति शेष ‘आक्रांत’ जी द्वारा संस्कृत भाषा के उत्थान के लिए किए गए समस्त कार्य राष्ट्र निर्माण का ही परिचायक था, अपने अध्यक्षीय उदार व्यक्त करते हुए प्रो० महेश सिंह जी द्वारा उपरोक्त आयोजन के लिए परिजनों की भूरी-भूरी प्रशंसा की गई साथ ही निवेदन किया गया कि हम रहें ना रहें पर 100वीं जयन्ती भी निश्चित रूप से मनाने का सलाह दिया गया, अध्यक्षीय भाषण के उपरांत शशि रंजन मिश्र द्वारा धन्यवाद अर्पित किया गया।

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