जनमानस में पर्यावरणीय चेतना बढ़ाने पर बल।

बाढ़ की समस्या पर प्राधिकरण ने आयोजित किया सेमिनार।
RKTV NEWS/पटना(बिहार)19 सितंबर।‘‘माॅनसून के दौरान पूर्वानुमान और वर्षापात से जुड़े डेटा (आंकड़े) और स्टैटिस्टिक्स (सांख्यिकी) चाहे कितने सटीक और सही हों, उनका कोई मायने नहीं, अगर इसका लाभ प्रदेश की जनता को नहीं मिल रहा है। आंकड़ों का महत्व है, अकादमिक बहस अपनी जगह ठीक है, लेकिन इसका फलाफल क्या है, क्या इससे आम लोगों को राहत मिल पा रही है? इस पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है।‘‘ उक्त बातें बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के माननीय उपाध्यक्ष डाॅ. उदय कांत ने 19 सितंबर को यहां प्राधिकरण सभागार में ‘‘बिहार राज्य में बाढ़ की समस्या एवं समाधान‘‘ विषय पर आयोजित सेमिनार में कही।
इस अवसर पर प्राधिकरण के सदस्य पारस नाथ राय, कौशल किशोर मिश्र, (ई.) नरेंद्र कुमार सिंह एवं प्रकाश कुमार की गरिमामयी उपस्थिति रही। प्राधिकरण के सचिव मो. वारिस खान, भा.प्र.से. ने विषय प्रवेश कराया। समारोह का संचालन प्राधिकरण के परियोजना पदाधिकारी डाॅ. अजीत कुमार सिंह ने किया। धन्यवाद ज्ञापन विशेष कार्य पदाधिकारी मो. मोइज उद्दीन ने किया। जाने-माने पर्यावरणविद्, नदी प्रबंधन विशेषज्ञ, तकनीकी शिक्षण संस्थानों के प्राध्यापक, जल संसाधन सहित अन्य विभागों के अभियंता, बिहार मौसम सेवा केंद्र के वैज्ञानिक, यूनिसेफ व अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं के पदाधिकारियों/प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इसरो की संस्था स्पेस एप्लीकेशन सेंटर, अहमदाबाद और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ साइंसेज, बेंगलुरू के वैज्ञानिक भी इस सेमिनार में ऑनलाइन जुड़े।
डाॅ. उदय कांत ने कहा कि पूर्वानुमान में अगले एक या दो दिनों में कितनी मिमी वर्षा होगी, यह जानकारी देना सही है। लेकिन इसके साथ ही हमें यह भी बताना चाहिए कि इसकी वजह से कितने इलाके डूब सकते हैं। इसके बाद ही वहां रहनेवाले लोगों को सुरक्षित आश्रय स्थल तक पहुंचाया जा सकेगा। प्राधिकरण उपाध्यक्ष ने सेमिनार में मौजूद शिक्षाविद् और अध्ययनवेत्ताओं से आग्रह किया कि उन्हें इस बात पर भी शोध करना चाहिए कि नदियों के मार्ग में कहां-कहां रुकावटें खड़ी की गई हैं? हम नई संरचना खड़ी कर रहे हैं, तो उसका दुष्प्रभाव क्या पड़ रहा है, इसका अध्ययन आवश्यक है।
डाॅ. उदय कांत ने सुझाव दिया कि देश की अग्रणी तकनीकी संस्थानों के साथ मिलकर एक टीम कार्य करे, जो बाढ़ एवं गाद प्रबंधन हेतु गणितीय मॉडल विकसित करे। इसके क्रियान्वयन हेतु राज्य सरकार को अनुशंसा की जाएगी। इसरो, आई.आई.एससी., एन.आई.टी., बिहार मौसम सेवा केंद्र इस पर संयुक्त रूप से कार्य करे।
उपाध्यक्ष ने कहा कि बिहार डीआरआर रोडमैप में दिए गए सहनशील आत्मनिर्भर गांव (रिजिलिएंट विलेज) को लक्ष्य बनाकर कार्य करने की जरूरत है। साथ ही हमें अपने पारंपरिक ज्ञान को बाढ़ प्रबंधन हेतु उपयोग में लाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जनमानस में पर्यावरणीय चेतना को बढ़ाने एवं जन-जागरूकता हेतु सामाजिक संस्थाओं को भी साथ लेना होगा। तकनीकी नवाचारों का उपयोग बाढ़ प्रबंधन में किया जाना चाहिए।
बिहार की नदियों पर वर्षों गहन शोध-अध्ययन करने वाले बाढ़ मुक्ति अभियान के संयोजक डॉ. दिनेश कुमार मिश्र ने अपने संबोधन में बाढ़ की समस्या के स्थाई हल के लिए गंभीरता से प्रयास करने पर बल दिया। उन्होंने नदियों में जमा होने वाली गाद और अवैज्ञानिक ढंग से निर्मित तटबंधों को इसके लिए जिम्मेवार ठहराया। नदी आकृति विज्ञान और बाढ़ प्रबंधन पर एन.आई.टी., पटना के प्रो. (डॉ.) रामाकर झा, नदी के ऊपरी भूभाग में वर्षा की स्थिति पूर्वानुमान पर बिहार मौसम सेवा केंद्र के निदेशक डॉ. सी. एन. प्रभु एवं जल संसाधन विभाग के पूर्व मुख्य अभियंता रबीन्द्र कुमार शंकर ने बिहार की नदियों में गाद प्रबंधन विषय पर प्रस्तुतियों के माध्यम से अपनी बात रखी।
सेमिनार के अंत में बाढ़ की समस्या के स्थायी निदान के लिए एक परामर्शदातृ समिति गठित की गई। इसमें पर्यावरणविद् पंकज मालवीय, यूनिसेफ के राजीव कुमार एवं विभिन्न स्वयंसेवी संस्थाओं से रमेश प्रसाद सिंह, जितेन्द्र और मानसी को सदस्य बनाया गया है।

