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कर्म निरंतर करते जाना!

रचनाकार:सुरेंद्र सिंह ‘अंशु’

कर्म निरंतर करते जाना!

कर्म निरंतर करते जाना
फल की इच्छा ना करना।
सुख दुख दोनों तीर मधे
जीवन दरिया बहते रहना।।
लाभ हानि ये तत्व क्षणिक हैं
बिन इनके जीवन कैसा।
सत्य स्वरूपम् तन मन से
संबंध बने इनका कैसा।।
मन क्लेश जमे, वैभव उपजे
एक आसक्ति के फेरे में।
स्वार्थ उठाता सिर है अपना
भोग भाव के डेरे में।।
‘मैं’ और ‘मेरा’ एक लहर है
स्वत्व भावना की जननी।
मन को बेड़ी बॉंध रही
कहां गई वह बैतरणी।।
कर्म योग वह तत्व यहां
आशक्ति को जो मार सके।
कर्म करो फल मिलना ही है
ईश्वर के दरबार सखे।।
जो नाशे संतुलन तुम्हारे
चलत सफल मग अग जग के।
सफल मनुज का जीवन है
जब रोक सको तो रोक उसे।।
परमाणु से पर्वत तक
वह चेत अचेतन हर सत्ता।
देख निरत हैं सकल कर्म में
कर्म कहो किस हेतु बंटा।।
सबका यत्न मुक्ति है पाना
इस जग के संग्राम सखे।
अनुचित भी उचित बन जाता
मन कपाट शुभकाम लखे।।
जीवन में बाधा विघ्न अड़े
इस जगत जाल के मेले में।
शमन करे पुरुषार्थ मनन का
विविध कर्म के खेले में।।
खोज करो मत मुक्ति की
निज मन के बाहर रेले में।
करने को बस कर्म करो
यह धर्म सजा तन ढेले में।।
मधुसूदन मुखारबिन्द से
यह गीता की वाणी है।
रमन करत इस मर्त्यलोक में
वह ही सच्चा प्राणी है।

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