
आरा/भोजपुर ( शशि मिश्रा)14 सितंबर।आज हिंदी दिवस का आयोजन प्रायः औपचारिक कार्यक्रमों तक सीमित रह जाता है—कभी निबंध प्रतियोगिता, कभी गोष्ठी, तो कहीं औपचारिक भाषण। किंतु यदि हम गहराई से विचार करें तो हिंदी दिवस मात्र उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर है। यह अवसर है यह सोचने का कि हिंदी, जिसे हम गर्व से अपनी राजभाषा कहते हैं, क्या वास्तव में हमारे जीवन और कार्य-प्रणाली में उसी गरिमा के साथ प्रतिष्ठित है?
14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा का दर्जा प्रदान किया। यह निर्णय मात्र भाषाई औपचारिकता नहीं था, बल्कि स्वतंत्र भारत की सांस्कृतिक अस्मिता को सुरक्षित रखने का संकल्प था। किंतु सात दशकों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह प्रश्न आज भी प्रासंगिक है कि क्या हिंदी अपने वास्तविक स्वरूप में राष्ट्र की कार्य-भाषा बन सकी है?
आज की वास्तविकता यह है कि हिंदी का प्रयोग साहित्य, पत्रकारिता, सिनेमा और जनसंचार में तो बढ़ा है, किंतु प्रशासन, न्यायालय और विज्ञान-तकनीक के क्षेत्र में इसका स्थान अपेक्षाकृत सीमित है। हमारे विद्यालयों और महाविद्यालयों में अंग्रेज़ी माध्यम को श्रेष्ठ समझा जाता है, जबकि हिंदी को प्रायः दूसरी पंक्ति की भाषा माना जाता है। यह मानसिकता हमें आत्मविश्लेषण के लिए बाध्य करती है।
हिंदी दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि यदि हम अपनी मातृभाषा की उपेक्षा करेंगे, तो हम अपनी जड़ों और सांस्कृतिक आत्मा से कट जाएँगे। विदेशी भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है, किंतु हिंदी की उपेक्षा आत्महीनता का प्रतीक है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि मातृभाषा में शिक्षा, अनुसंधान और प्रशासन को बढ़ावा देना ही वास्तविक स्वतंत्रता का प्रतीक है।
अतः हिंदी दिवस केवल एक वार्षिक उत्सव न होकर, आत्मचिंतन का ऐसा अवसर होना चाहिए, जब हम यह संकल्प लें कि हिंदी को जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उचित स्थान देंगे। यह दिवस हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र की भाषा का सम्मान करना ही राष्ट्र की आत्मा का सम्मान करना है।
